Wednesday, December 29, 2010

कुछ न मिलेगा इस दुनियां से......

कुछ न मिलेगा इस दुनियां से
समय व्यर्थ ही खो जायेगा.

छल-प्रपंच से भरे विश्व में
मानव तू कुछ न पायेगा,
भौतिकता का अंत नहीं है
कौन तुझे ये बतलायेगा.
कुछ न मिलेगा इस दुनियां से
समय व्यर्थ ही खो जायेगा.

माया की इस मरूभूमि में
मोह संग क्यों दौड़ लगाता,
तृष्णा की तृप्ति से पहले
तू अनंत में खो जायेगा .
कुछ न मिलेगा इस दुनियां से
समय व्यर्थ ही खो जायेगा.

तृष्णा ही तृष्णा इस जग में ,
कहीं शांति का क्या तू पायेगा
सुषमा की इस भरी सभा से
दूर कभी क्या हो पायेगा ?
कुछ न मिलेगा इस दुनियां से
समय व्यर्थ ही खो जायेगा.

ऐसा बीता हर-पल,हर-क्षण
नहीं समझ पाया तेरा मन ,
सुख-सागर में लिप्त हुआ जो
किसको फिर वह समझाएगा .
कुछ न मिलेगा इस दुनियां से
समय व्यर्थ ही खो जायेगा.

तुमनें सोचा होगा पहले
दुनियां में सुख ही सुख होगा,
भ्रामकता के गहन तिमिर में
असमय ही तू खो जायेगा.
कुछ न मिलेगा इस दुनियां से
समय व्यर्थ ही खो जायेगा.

सत्य समय की डोर न थामे,
समय सत्य की बांह पकड़ता,
एक समय ऐसा आएगा ,
मिटटी में तू मिल जायेगा.
कुछ न मिलेगा इस दुनियां से
समय व्यर्थ ही खो जायेगा.

तोड़ ले नाता भौतिकता से
उससे नेह लगा ले मानव
समय कहीं अनजान डगर
मंजिल बनकर मिल जायेगा.
कुछ न मिलेगा इस दुनियां से
समय व्यर्थ ही खो जायेगा

(वर्ष 1979 में लिखी थी)
www.ghonsla.blogspot.com पर देखें.

Saturday, December 25, 2010

क्यों नहीं जा पाते तुम....

मैं पूछती हूँ
क्यों नहीं जा पाते तुम
हमारे तन के पार?
क्यों नहीं लाँघ पाते
रीति-रिवाजों से से नियंत्रित
परम्पराओं की देहरी
जहाँ तिरता है जीवन-मूल्य
पानी पर तेल सा
जीवन-मृत्यु के बीच
सृजन के धागों से बंधकर
झूलते हैं सारे रिश्ते
आजादी की अनदेखी कर

क्यों नहीं देख पाते उसकी आँखों में
छलकता प्यार,उमड़ती करुणा
अपने और औरों के लिए.
तन के माध्यम से ही तो होता है
ये सारा व्यापार ,
अनगिन भावों का निरंतर संचार.


क्यों नहीं रख पाते याद
उसका व्रत,उपवास,
मुसीबत की घड़ी में
जागना सारी-सारी रात
तुम्हारे भले के लिए
मां,बहन और पत्नी बनकर.

क्यों नहीं देखते जननी को
प्रकृति सा लेटा अपने आस-पास
अलग-अलग रूप और परिधान में.
क्यों नहीं खोलते मन का नाजुक द्वार
जहाँ तन में लहराता है
बहन का प्यार राखी बनकर
माँ का दुलार
कौशल्या बनकर,यशोदा बनकर ,
तुम मचलते हो बनकर
राम और श्याम.

इसी में बसी है राम की सीता ,
सावित्री सत्यवान की.
पाषाणी अहिल्या
नहीं है केवल एक तन
जिसे किसी ने धोखा दिया
किसी ने किया प्रताड़ित .
वह जूझती रही प्रश्नों के द्वंद्व से
टूटा ह्रदय लिए,
बिखरे अरमानों के साथ.
करती रही एक ऐसे शरीर में वास
जो समझ नहीं पाया
अपना अपराध
आजतक.

ये तो आज भी है एक पहेली
क्यों कोई बन जाता है युधिष्ठिर ,
लगा देता है द्रौपदी का शरीर
अपने हर दाव पर?
क्यों दु:शाशन ठहाके लगता है
अपने कृत्य पर?
क्यों आज भी मौन हैं पितामह?
क्यों ली जाती है अग्नि परीक्षा
इस देह की बार-बार लगातार?
क्यों आज भी जन्म लेते हैं
परमहंस और गाँधी जैसे लोग
हमारे बीच .
एक पाशविक वृति का वाहक बनकर ,
दूसरा मानवता का उपासक बनकर?

राजा रवि वर्मा की तसवीरें बोलती हैं
बाहर का सच ,
खींचती हैं अपनी ओर
आकर्षण की डोर ले,
हुसैन की तस्वीरें देती है
भावनाओं को हवा,
पाती हैं तन पर न्योछावर
हजारों मीठे बोल.
कोई कहाँ झांकता है पोर्ट्रेट के भीतर
जहाँ धड़कता है एक कोमल ह्रदय,
पलती है जीवन को दिशा देनेवाली सोच.

यह सत्य है अकाट्य
कोई धरा को नहीं समेट सकता है
अपनी बाँहों में,
पर, एक छोटा सा स्नेहपाश
कर सकता है धरती-आकाश एक.

शरीर नहीं है कोई सड़क
चलने के लिए,
है एक किताब जीवन की
पढ़ने के लिए.
एक घर
जिसके दरवाजे खुले रहते हैं
सदा
शरण देने के लिए.
प्यार के सागर की लहरों पर
अठखेलियाँ करती एक नाव है यह
हमेशा बढ़ती हुई
किनारे की ओर.

इसलिए, आओ
आगे बढ़ो
पूरी संवेदना से निभाओ इसका साथ.
यहीं मिल जायेगी तुम्हे पूरी धरती,
पूरा आकाश,
आँखों में उम्मीद का सूरज.

पढो अपना मन
कि पढ़ पाओ उसका मन,
जाकर खड़े हो जाओ उसके पास
सुन पाओगे
उसके भीतर की आवाज
इच्छाओं के पार से आती हुई .

उसका शरीर है सूरज
चक्कर लगाते है जिसके चारो ओर
हजारों सम्बन्ध
अलग-अलग कक्षाओं में रहकर.
सदा रहती है वह
उन्हें सीने से लगाये
प्रोटान बनकर.

Tuesday, December 21, 2010

न जाने क्यों?

एक दिन
तुमने ही तो कहा था
सज-धज कर रहो
अच्छी लगती हो,
मन को भाती हो.

लेकिन
जब-जब मैं
सज-सवंर कर निकली
तुमने रोक दिया था
मुझे बाहर जाने से
न जाने क्यों?

तुमने ही कहा था
छोटे रखने को बाल,
आई-ब्रो बनवाने को.
शायद तुम्हें अच्छा लगता था
ये सब..........
अगले दिन जब खुले सिर
निकली घर से बाहर
तुमने रख दिया
साडी का आँचल
मेरे माथे पर
न जाने क्यों?

तुमने ही बड़े शौक से
खरीदा था मेरे लिए
टाप और जींस
पहनाया भी था मुझे
हुलसकर
लेकिन इसे पहनकर
मेरे बाहर जाने पर
हमेशा ऐतराज रहा तुम्हें
न जाने क्यों?

तुमने ही जिद करके
सिखाया था
मुझे गाड़ी चलाना
बड़े चाव से,
बनवाया था मेरा ड्राइविंग लाइसेंस,
तुम्ही ने कहा था एक दिन,
"आज गाडी तुम चलाओ.
मैं बैठूँगा तुम्हारी बगल में".
रियर-व्यू मिरर में देखा था मैंने
तुम्हारे चेहरे का बदलता रंग,
बदरंग होता हुआ
जब लोगों ने देखा था मुझे
न जाने क्यों ?

पति की चाहत
पुरुष की सोच का अंतर
उभर आया था
तुम्हारे चेहरे पर
शिकन बनकर .
तुम्हारी इच्छा थी मुझे सजाने की,
पर, नहीं जुटा पाए साहस
मेरे सौन्दर्य,
मेरी इच्छाओं को
मन के आईने के पार
देख पाने का,
न जाने क्यों?

जब-जब मैं
तुम्हारे सपनों को जीती
हकीकत के धरातल पर गिरकर
चूर-चूर हो जाते थे तुम्हारे सपने
अपने अहम् में तुम जीते रहे
सदा पुरुष बनकर
न जाने क्यों?

तुम्हारे अहम् के साथ
बढ़ता रहा.......
तुम्हारे भीतर का खारापन
तुम जीते रहे
संगी से इतर
रश्मो-रिवाज में बंधकर
पुरुष और परंपरा बनकर
न जाने क्यों?

Tuesday, December 14, 2010

मानदंड

बदला तो बस समय
समय के साथ
चीजें होती गई प्यारी,
रिश्ते होते गए भारी.
बादलों के भी बदल गए
हाव-भाव,
प्रकृति में भी आये
ढेरों बदलाव.

पर,
सूरज ,चाँद,सितारों की तरह
नहीं बदले आप,
नहीं बदला
जीवन के प्रति आपका नजरिया
नहीं बदला
सबके लिए आपका स्नेह,
सबके लिए प्यार
रिश्तों के प्रति आपका लगाव,
क्षितिज तक दिखता है
जिसका विस्तार आज भी,
गहराई लगती है समंदर सी.

आपसे ही उगता था
सूरज हमारी उम्मीदों का,
आपकी उंगलियाँ ही देती थी
दिशाएं हमारे जीवन को,
आपका साहस,आपका धैर्य था
हमारा संबल.

अभाव के बादल
उमड़ते-घुमड़ते रहे
गरजते रहे,बरसते रहे
कई-कई दिन,कई-कई रात
मुसलाधार
लगातार.

फ़िरभी,
नहीं तोड़ पाए
विश्वास पर टिका
आपका फौलादी मनोबल.
नहीं डिगा पाए आपको
आपके अपनाये रास्ते से,
नहीं तोड़ पाए रिश्तों का घेरा
जो आपने डाल रखा था
अपने चारो ओर
क्योंकि
आपने कभी नहीं तोला इन्हें
उस तराजू में
जो झुक रहा था दूसरी ओर.

बन गए मानदंड
हमारे लिए
जिसके सहारे पढ़ पाए थे हम,
मूल्यों के उतर-चढ़ाव,
कर पाए थे
बदलाव का मूल्यांकन.
आपके अपनाये मूल्यों में
तौल पाए थे
स्वयं को,
औरों को उस तराजू में.
लगा कितने छोटे हो गए हैं हम.

अगर आप बदल जाते
तो शायद हम बन जाते
ऐसा सोचते थे हम.

पर,
आपको कहाँ था स्वीकार
रोटी का आप पर हावी हो जाना.
भले ही कुरते पर क्यों न लगे हों
सैकड़ो पैबंद,
पर नहीं था आपको स्वीकार
चरित्र के कोरेपन पर कोई दाग.

आप दर्पण थे
व्यवहार में सदाचार के,
अपने आदर्शों के,अपने विचार के
जो आज भी ध्रुवतारा बनकर
हमें भटकाव से बचाता है .

हमने सोचा था
यदि आप बदल जाते
तो शायद हमारे दिन फिर जाते ,
संवर जाता हमारा आनेवाला कल.

लेकिन आज
जब किनारे खड़ा
समंदर को देखता हूँ
तो लगता है
तब सावन जरूर आता,
पर हमारे आँखों का पानी ले जाता.
हम कभी नहीं जान पाते
हमनें क्या खोया,
हमनें क्या पाया.

(परम आदरणीय बाबूजी को सादर समर्पित जो जीवन-भर अपने अपनाये गए मूल्यों को बचाने में लगे रहे)

Sunday, December 5, 2010

तारीखों में बसे चेहरे

आज
धीरे-धीरे ही सही
मगर निश्चित रूप से ,
ग़ुम हो रही हैं तारीखें,
ग़ुम हो रहे है
तारीखों में बसे चेहरे
जो हुआ करते थे खास.


अब तारीखों से
याद नहीं आते
गाँधी और नेहरू,
तारीखों से याद आता है
भयानक मंजर.


जब-जब याद आता है
9/11 और 26/11,
याद आता है
वर्ल्ड ट्रेड सेंटर,भारतीय संसद,
होटल ताज और शिवाजी टर्मीनस,
ऐसे ही और कई अनगिन नाम .


अब नहीं याद आएँगी तारीखें
नहीं उभर पाएगा जेहन में
उसमें बसा कोई नाम,
कोई चेहरा,
बस होंगे दिन और रात.


शायद ही अब बन पाए
2 अक्टूबर ,14 नवम्बर
जैसी तारीखें ,
जिसमें आज भी बसे हैं
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ,
बच्चों के चाचा नेहरु।

तारीखों के आते ही
जो उभर आते हैं
मन में
त्योहारों की तरह.

इसके पीछे होता है
ढेर सारा समर्पण,
ढेर सारा प्यार
मानवता के प्रति।

आज हर तारीख में
जबरन घुसाए जा रहे हैं
मदर्स-डे,फादर्स-डे,वैलेंटाइन-डे
जैसी संज्ञाएँ
जिसमें नहीं होती तस्वीरें
समाज और जीवन को
दिशा देनेवालों की,
जीवन की रह में
उंगली थमाने वाले
मां की,बाबूजी की,
अपनों की।

बस एक ढेर होता है ,
अपने से लगते
पराये चेहरों का
शहीदों का,नेताओं का,
जनता और जवानों का।

पहले
अपने कर्म,
सामाजिक सरोकारों से
जाना जाता था चेहरा
जो होता था
आम चेहरों से अलग.

आज तो सारे कर्म,
सारे धर्म
एक जैसे
इसलिए चेहरे भी एक जैसे,
आपस में मिलते-जुलते से।

ऐसे में कहाँ मिलेगा
एक अदद चेहरा
भीड़ का होकर भी
जो हो
भीड़ से अलग.

Wednesday, December 1, 2010

काश ! सुन पाते ....

काश!
एकबार हम
तुलसी,सूर और कबीर
जैसे हो पाते,
मौन रहकर सुन पाते
अपने भीतर अनगूंज गूँज
अनहद नाद की.

किसी के होने का अनुभव
अपने भीतर कर
उसमें अपना विश्वास जगा पाते.
निकल आते बाहर
मंदिर-मस्जिद,गिरजा और गुरुद्वारों से,
इन सबको अपने दिल में बसाकर
जला लेते
सम्मान से सम्मान का दीप,
अनुभवों के खेत में
विश्वास की फसल
फिर से उगा पाते,
अपने आत्म-विश्वास को
आस्था में बदल पाते .

दोहराते
रामचरित का दृष्टान्त
बार-बार,कई-कई बार,
अपने घर महाभारत नहीं दोहराते.

मोती बन पिरोये जाते एक सूत्र में
तो शायद आज
यूँ न बिखरते दाना-दाना
अलग-अलग,
अलग-थलग न पड़ जाते.

अब समय आ गया है
उम्मीद की बंजर जमीन पर
विश्वास की फसल उगाने का,
घृणा के कैक्टस को काट गिराने का.

समय आ गया है
यह समझने और समझाने का
हमने ही बांटे हैं
धरती और आकाश,
हमने ही बांटे है
खेत और खलिहान
कुछ अधिक पाने की चाह में.

Friday, November 26, 2010

अंगूठा

अंगूठा
नहीं होता
सिर्फ अंगूठा
अंगूठा होता है पहचान
अलग-अलग इंसानों का ।
अंगूठा होता है हस्ताक्षर
गरीबों का, मजबूरों का
मजदूरों और किसानों का ,
जो होते तो सुघड़ हैं
पर,
रह जाते हैं अनपढ़ ।
क्योंकि नहीं पकड़ाई गई होती
उन अंगूठों को कलम।

अंगूठे में होता है समर्पण,
भरा होता है विश्वास ,
इसमें होती निष्ठा है
और होती है ताकत
कर्मफल तोड़ने की।
.
अंगूठा से ही बनाता है कोई देश,
इससे ही तय होती है
उसके उत्थान की दिशा
क्योंकि यही होता है
उसके श्रम का आधार,
ज्ञान का सूत्रधार.

अंगूठा होता है एकलव्य,
अंगूठा होता है अर्जुन,
पर,उन द्रोनाचार्यों का क्या करें
जो मांग लेते हैं अंगूठा ही दान
यदि दिखती है उसमें जान.

अंगूठा होता है
कर्मठ किसान,
लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पित
हमारा अन्नदाता,हमारा भगवान
जब तक नहीं लगाया होता है अंगूठा
कोरे कागज पर साहूकार के
और बन जाता है
अपने ही खेतों में मजदूर
रखकर गिरवी अपना खेत,
अपना जीवन, अपने सपने,अपना सम्मान,
इस बात से अनजान कि उधारी खाद और बीज
उगलेंगे सोने जैसी फसल
या बाटेंगे बदहाली और मौत.

अंगूठा तो अंग्रेजों ने भी लगवाया था
हमारे पूर्वजों से,
बनाकर गुलाम
पहुचाया था अपनी माटी से दूर
लेकिन उन अंगूठों ने ही लिखी
अपनी आजादी की इबारत एक दिन,
हो गए सदियों की गुलामी से मुक्त
बनाकर अपना नया देश।

Monday, November 22, 2010

अब प्रश्न तो उठेगा....

किस गरल की बात करतें है,शिव,
उस गरल की
समुद्र-मंथन के बाद
जिसका किया था आपने पान
सिर्फ एकबार
विश्व बचाने को,
कहलाये
कालजयी मृत्युंजय .

हम सृष्टि के सूत्र-धार
स्नेह और प्यार से
सींचते रहे जीवन निरंतर
चलाते रहे जीवन-चक्र,
मृत्युपर्यंत बचाते रहे
प्रकृति का अस्तित्व.

बदले में क्या मिला?
अवहेलना और उत्पीड़न का अंतहीन दौर,
बंद रखे गए हमारे लिए बाहर के द्वार,
करने के लिए घर का चौखट पार
करना पड़ा हमें एक लम्बा इंतजार .

पुरुष और प्रकृति को था
हमारा मौन समर्थन,समर्पण
फिर भी पीते रहे हैं सदियों से
जहर ज़माने का
बिना उफ़ किये
अकारण
त्रेता में
सीता और अहिल्या बनकर ,
द्वापर में द्रौपदी बनकर.
झेलते रहे अपहरण,
चीरहरण का दंश.

फिर भी हमें नहीं मिला शिवत्व,
नहीं मिला हमारे नारीत्व को मान,
हम सिर झुकाए ढोते रहे
समाज का छद्म सम्मान,
जीते रहे ये सोचकर
कभी तो मिलेगा हमें भी
आप जैसा सम्मान .

Friday, November 19, 2010

अजनबी हो तुम

अपने ही शहर में
अजनबी हो तुम,
तुम्हारी बातें ,
तुम्हारे दिन,
तुम्हारी रातें .

क्योंकि
सफलता की चाह में
निकल गए हो
बहुत आगे,
फंस गए हो
प्रतिस्पर्धा के जाल में,
हो गए हो अपनों से दूर
स्वयं को भूलकर .

कैद होकर रह गए हो
अपने ही बनाये
घरोंदे में,
छूट गया है
खुला आसमान,
चाँद-सितारों का साथ
जबसे तुम्हें
अपनी रौशनी का
भरोसा हो गया है .

तभी तो
सब हैं तुम्हारे साथ,
तुम्हारे आस-पास
बस तुम खो गए हो,
तुम्हारा वजूद खो गया है
चाहत की भीड़ में.

समय आ गया है
करो खुद ही
खुद की तलाश
रिश्तों को ढूँढ़ो
अपने आस-पास.


बना लो उसे
अपनी चाहत,
कट जायेगा
जीवन का सफ़र
आराम से .

Sunday, November 14, 2010

देखता रहता हूँ मैं........

मैं
निश्चल
निःशब्द
अकेला खड़ा
देखता रहता हूँ
उसे
और
वह
होकर
निर्विकार
शब्दों के खोल में
डालता रहता है
बोल
खट्टे-मीठे
भाव भरे,
हँसते-खिलखिलाते से,

एकाग्रमन
रचता रहता है
अपना संसार,
अपनी धरती,
अपना आकाश,
अपने सूरज,चाँद,सितारे
विश्वामित्र की तरह.


मैं
एक किनारे
स्थिर खड़ा
देखता रहता हूँ
सृजन का अद्भुत खेल,
शब्दों में समाये
ऊँचे-ऊँचे पहाड़,
झर-झर झरते झरने,
कल-कल बहती नदिया,
उनसे निःसृत होता संगीत.

देखता हूँ
भावों को
शब्दों के घरोंदों में
लुका-छिपी का खेल
खेलते हुए,
अपने आगे-पीछे
दौड़ लगाते ,
उधम मचाते हुए
चुपचाप
बस एक माध्यम बनकर
क्योंकि मैं
दुनियांदारी में उलझा,
भौतिकता के भंवर में
डूबता-उतराता
एक अदना सा इन्सान जो हूँ .

पर,
उसे
इससे क्या ?
मेरी परेशानियों से परे
वह
चुपचाप
मेरे प्रवाहमान भावों को
शब्दों में पिरोता रहता है,
बुनता रहता है
सृजन जाल .

मैं तो बस देखता रहता हूँ,
देखता रहता हूँ
रचनाकार का
निरंतर जारी खेल

Saturday, November 13, 2010

जब तय नहीं थी मंजिलें

जब तय नहीं थी
मंजिलें,
नहीं बन पाया था
कोई लक्ष्य.

चाहे दिन हो या रात
हाथ नहीं आता था
आसमान
चाँद,सितारे भी चलते थे
मेरे आगे-आगे.

बहुत भरमाता था सूरज,
कई-कई रास्ते दिखाकर
छोड़ जाता था
एक अनजाने,अनचाहे
चौराहे पर.

आज
जब तय हो गई है
मंजिलें,
बन गई है
भटकाव से दूरी.

दिखता है आसमां
क्षितिज पर
धरती से मिलता हुआ,
दिखती है नदी,
सागर में गोते लगाती हुई ,
नहाती हुई .

उग रहा है
सोने जैसा सूरज
उम्मीदों भरा
पूरब में.

मैं छू लूँगा उसे
एक दिन
ये विश्वास जगाता है,
मुझे मेरी मंजिल सा
नजर आता है.

आज वह भी
मेरे साथ-साथ चलता है,

Friday, November 12, 2010

कभी देखा है.....

कभी देखा है
पक्षियों को
करते हुए परवाज
बिलकुल उन्मुक्त,
बिलकुल स्वछन्द
पर,रखे हुए नजर
अपने घोंसलों पर
जिससे मिलता है उन्हें
ऊँचाइयों को छूने का
निर्द्वंद्व हौसला.

कभी देखा है
उन्हें पंख फैलाये,
झुण्ड के झुण्ड
अपनों के संग
आखिरी प्रहर
सूरज के करीब से
गुजरकर
क्षितिज के पार जाते हुए,
नीले आसमान की
ऊँचाइयों में
ग़ुम हो जाते हुए .

कभी देखा है
उन्हें जल में
करते किलोल
फडफडाकर अपने पंख
औरों के संग,
भूलकर सारे अवसाद .

कभी देखी है
सागर दीवानी
नदिया
उसकी आतुरता,
उसका बेचैन पानी,
जिसके हर मौज पर
लिखी है
मिलन की कहानी,
पहाड़ों से उतरकर भी
रहती है जिसकी नजर
ऊंचे पहाड़ों पर.

मैं भी चाहती हूँ
किसी में समा जाना,
उसे अपना बना जाना,
होकर उम्मीदों पर सवार
ढूँढती हूँ संबंधों की धार
ताकि सब के साथ
बहती जाऊं निर्बाध
दोनो किनारा साथ लिए .

परन्तु ,
मैं तो समंदर हूँ,
मुझे तो सबको
अपने में समाना है,
अपना बनाना है
उनका ही होकर
रह जाना है......

Wednesday, November 10, 2010

खेत

खेत
जो कभी देते थे
अन्न , जीवन.
होते थे
संयुक्त परिवार का
आधार,
हमारी पहचान
आज स्वयं ही
लहूलुहान है

अब तो
देने से अधिक
लेने लगे हैं
जीवन
क्योंकि
छोटे-छोटे टुकड़ों में
बंटने लगे हैं खेत .

इन टुकडों के साथ ही
टूटने लगे हैं रिश्ते ,
बँटने लगे हैं दिल,
बदलने लगा है
आपसी व्यवहार.

खेतों से होकर गुजरनेवाले रास्ते
जो कभी ले जाते गाँव ,
मिलाते थे अपनों से
अब मुड़ने लगे हैं
शहर की ओर.

हर फसल से
जुड़े होते थे त्यौहार,
शादी-ब्याह के मौके पर
जुटा करता था
समूचा परिवार,
भूले-बिछड़ों से
हुआ करती थी
मुलाकात.

अब तो खेतों में
खड़ी है
टीस की फसल
लहलहाती सी
जिसके बीज को
अपनों ने बोया हैं,

हम आज भी
नहीं समझ पाए है
हमने क्या पाया,
हमने क्या खोया है.

अब तो खेत बन गए हैं
हमारा धुंधला दर्पण
जहाँ देखकर भी हम
अपनी बर्बादी को
कहाँ देख पाए हैं.

Monday, November 8, 2010

प्रेम-धार बहने दो

1
प्रेम-धार बहने दो

प्रेम यज्ञ आज करो
औरों को प्यार करो
सारे रार रहने दो
प्रेम-धार बहने दो.

रिश्तों का सार बनो
सबके साथ-साथ चलो
मन के तार जुड़ने दो
प्रेम-धार बहने दो.

मन में रखो आस तुम
अपनों में विश्वास तुम
स्वयं को आगे बढ़ने दो
प्रेम-धार बहने दो.

हाथों को थाम लो
सबसे स्वयं से को बांध लो
इस क्रम को चलने दो
प्रेम-धार बहने दो.

2

दूसरा अंतर्मन

तुम्हारा अंतर्मन
नागफनी का घना वन है,
तेरे काँटों की चुभन लिए मैं
एक दूसरा अंतर्मन .

तुम्हारी आँखों का शिकारीपन,
मेरे आँखों से झलकता डर,
मेरा अकेलापन.

आखिर किस रिश्ते से जुड़े हैं
हम : मैं और तुम?
कभी फुर्सत मिले तो बताना.


3

बावरी

कैसी बावरी थी मैं
तू सामने था
और मै
तुझे ढूंढ़ रही थी
अपने मन के वीराने में.

Friday, October 29, 2010

बिटिया

जबसे
मेरी गोद में
आई थी
नन्ही सी जान,
उसी में जा बसे थे
मेरे प्राण.

झांकती थी
मेरी आँखें
उसकी आँखों में
जहाँ तैर रहे थे सपने
मेरे बचपन के,
उसके नैन-नक्श में
देखती थी
अपना शैशव.

यह था
ईश्वर का अमूल्य
वरदान
मेरे लिए.
नहीं हो रहा था
विश्वास
मेरी गोद में
लेटी थी सृष्टि
अपनी पूर्णता के साथ .

कांपते हाथों से
सहलाये थे मैंने
उसके कोमल गात
उसके मखमली बाल,
लग रहा था छू रही हूँ
जैसे पंखुड़ियाँ गुलाब की,
हो रहा था एक अजीब सा
सिहरन-भरा अहसास .

उसके आने से
और आसमानी हो गया था
मेरे मन का आकाश,
निकल आया था पूरा चाँद
अपनी चाँदनी के साथ
चारो ओर फैला था
अद्भुत प्रकाश।

पहली बार मैं
अपने सपनों को
सहला रही थी
उसकी ऊँगली पकड़ ,
लग रहा था मानों
मैं ही लेटी हूँ
अपनी गोद में .

Thursday, October 28, 2010

दर्द का कोई चेहरा नहीं होता

दर्द
होता है
ईश्वर की तरह
निराकार ,
पर,नहीं होता है
निराधार .

यह भी होता है
सर्वव्यापी
उसी की तरह,
होते हैं इसके भी
कई-कई रूप.

नहीं होता इसका
अलग-अलग रंग,
बस चोट होती है
अलग-अलग
दिखी-अनदिखी सी.

दर्द का
कोई चेहरा नहीं होता,
हर चेहरे पर
उभर आता है ये दर्द
आइना बनकर.

आंसू और मुस्कान में
छुपा रहता है.
वेदना-अंतर्वेदना में
बंटा रहता है
ये दर्द
सृजन का सार बनकर,
रिश्तों का आधार बनकर.

Friday, October 15, 2010

एक दिन की आजादी

देकर एक दिन की आजादी
अपनी होशियारी पर इतराते हो,
करके धर्म के ठेकेदारों से सांठ-गांठ
अपनी-अपनी दुकानें चलाते हो,
दिन में तो दिखते हो अलग-अलग
रात को मयखाना साथ जाते हो।

सहारा लेते हो
भेद-भाव की राजनीति का ,
मंदिर-मस्जिद को
बताते हो अलग-अलग
राग और द्वेष की जहरीली
फसल उगाते हो,
अपनों को अपनों से लड़ाते हो ।

मौका पाते ही
बदल लेते हो अपनी चाल
ओढ़ लेते हो भेंड की खाल
स्वयं को हमारा
मसीहा बताते हो,
जनप्रतिनिधि कहलाते हो.

देकर हमें एक दिन की आजादी
सालो-साल तुम सब एक होकर
हमारी गुलामी का जश्न मनाते हो,
खून-पसीने की हमारी कमाई पर
खुलकर करते हो मौज
समझकर हमें बेवकूफ
हमारी भलमनसाहत का
मजाक उड़ाते हो.

अकड़ तो ऐसे दिखाते हो
जैसे तुम हो साहूकार,
हम तेरे कर्जदार
हम जनता नहीं है,
तुम हमारे प्रतिनिधि नहीं,
तुम तो कर रहे हो
हम पर अहसान,
मजबूरी में उठा रहे हो
हमारा भार.

डूबे रहते हो
भ्रष्टाचार में आकंठ
शर्मो-हया को छोड़कर
देश और देश की छवी का
खुलकर बजाते हो बैंड
होकर निडर, निःशंक,
जीतकर जो आते हो.

क्या सोचते हो ?
हम समझते नहीं हैं
तुम्हारी दोहरी चाल.
नहीं रहता हमें याद
हाथ जोड़कर
हर एक के आगे
तुम्हारा गिड़-गिडाना,
भरी दोपहरी में
गली-गली घूमना
बड़े-बूढों के तलवे सहलाना.

तुम्हारी नस-नस से
वाकिफ है हम ,
तुम्हारी हर फितरत है
हमारी निगाहों में
क्योंकि नदी तो वही है
जिसमें हम भी रहते हैं
तुम भी रहते हो .

हम तो बस
तुम्हें समझने का,
संभलने का
दे रहे हैं एक मौका ,
तलाश रहे हैं
एक अदद चेहरा
जो खो गया है
तुम जैसों की भीड़ में.

Tuesday, October 12, 2010

बेटियां नहीं अब बोझ.....

धीरे-धीरे ही सही
बदल रही है सोच,
सोच की दिशा
हो रही है उत्तरायण,
बहने लगी है
परिवर्तन की बयार .

होती रही होगी
बिटिया कभी बोझ,
झुकाती रही होगी माथा
अपने माँ-बाप का
क्योंकि
उसे मिला होगा
कुंठित,संकुचित,
झूठी प्रतिष्टा का पैरोकार
सहमा हुआ समाज,
जो नहीं लांघने देता था देहरी
पीहर हो या ससुराल.

अब लोग
बेटियों को
नहीं मानते बोझ,
पूर्व-जन्म का पाप.
नहीं कहते हैं
उसे पराया धन .

अब तो
मां-बाप मांगने लगे है
ईश्वर से वरदान ,
झोली में देना
बिटिया ही दान.

पूछने लगे हैं
खुद से ही सवाल:
ऐसा क्या किया है बेटे ने
जो बिटिया ने नहीं किया,
फिर भी,
क्यों नहीं मिल रही.
उसे पहचान ?

आज
वह भी
कमा रही है नाम,
बढ़ रही है आगे
कंधे-से-कंधे मिलाकर,
बढ़ा रही है
जननी,
जन्म-भूमि का मान.

अब नहीं चाहिए
उसे वैशाखी
समाज की ,
बस चाहिए
एक कंधा
स्नेह- भरा
मां का हो या बाप का







Sunday, October 10, 2010

काश ! दर्पण मुझमें समा जाता.....

काश !
मैं दर्पण में
और
दर्पण
मुझमें
समा जाता,
चला जाता
मेरे जेहन के पार।

मेरे भीतर का मैं
उससे दो-चार हो पाता
और देख पाता
अपने भीतर की
कश्मकश,
निरंतर जारी
द्वंद को पढ़ पाता
भले-बुरे का भेद
समझ पाता
खुद को इन्सान
बना पाता।


देख पाता
किसी के लिए घृणा,
किसी के लिए प्यार,
कहीं श्रद्धा से नत मस्तक,
कही विश्वास की झलक,
आत्मविश्वास की पकड़,
कहीं नास्तिक मन की अकड़
उस दर्पण में।

ढूंढ पाता
उसके पीछे का राज
अपने भीतर,
कर पाता
उसमें सुधार.
कारणों के जाल से
बाहर निकल,
अपनों से भरा,
अपनेपन से भरा
एक सुंदर सा संसार
बसा पाता
तो दर्पण का मुझमें,
मेरा दर्पण में समाना
सार्थक हो जाता।

ऐ दाता !

ऐ दाता !
कभी इतना मत देना
जो दामन में न समाये,
इतना भी मत देना की
मेरी झोली
खाली रह जाये.
बस इतना-भर देना
कोई मायूस न जाये
मेरे घर से,
मैं तेरे दर से।

देना ही है तो देना
एक टुकड़ा जमीन
मेरे बाहर,मेरे भीतर ,
उपजाऊ सी,
साथ में देना
थोड़े से बादल,
देना एक अच्छी सी बरसात,
एक बहती नदी देना
साथ में देना
थोड़ी सी हरियाली,
जिससे आये
खुशहाली चारो ओर।

मुझे देना
थोड़ा सा दर्द,
दर्द का अहसास
ताकि
मैं औरों का दर्द
समझ पाऊं,
बाँट सकूँ
गमजदा लोगों के गम.
मेरे मन को
देना वो नमी
जो रहने दे
मेरे आँखों में पानी
जो रिश्तों को
तर कर जाये
भर जाये
जीवन में उमंग ।

जी लेने दो मुझे
ख़ुशी-ख़ुशी
उन रिश्तों के साथ
पल-दो-पल
जिन्हें बड़ी मुश्किल से
जोड़ पाया हूँ,
पी लेने दो
अपनेपन से उपजा
आनंद-रस
एकबार.

मत छोड़ना
मुझे कभी अकेला,
मेरे हर कर्म में देना
मेरा साथ,
बनाये रखना
अपना आशीष,
धरे रहना सदा
मेरे सिर पर
अपना हाथ .

Friday, October 8, 2010

उसका दर्पण

नहीं निहारती
अब वो
अपने-आपको,
अपने रूप,
अपने श्रृंगार को
आईने में
बार-बार,
दिन में
कई-कई बार
जबसे
चाँद सी बिटिया आई है
उसके घर।

बस निहारती रहती है
उसका फूल सा
गुलाबी चेहरा
क्योंकि अब
वही हो गया है
दर्पण उसका ।

Monday, October 4, 2010

जन्म-दिन

कल
तुम्हारा .
जन्मदिन है,
बहुत खुश था मैं
यह सोचकर।


सोचा था
तुम्हारी मम्मी के साथ

जाऊंगा बाजार
बर्थ-डे-केक लाऊंगा,

साथ ही लाऊंगा
ढेरों गिफ्ट
पूरे घर को सजाऊंगा

तुम्हारे लिए।


पर,
मेरी विवशता तो देखो

बाजार तो गया,
मगर,

न बर्थ-डे केक

ले पाया,

न ही गिफ्ट
तुम्हारे लिए.
क्योंकि जेब में
उतना पैसा नहीं था,
नया-नया मकान
जो बनाया था.

इसलिए ले आया था
कुछ पेस्ट्री,
कटा-कटाया केक
कह लो,
तुमसे ही कटवाया था
उसे
एक बार फिर
तुम्हारा मन बहलाने को ,

क्या करता मैं?

दुनियांदारी के भंवर में

जो फंसा था ,
जीवन मेरे लिए
"नीरस विवशता" के सिवा

कुछ और नहीं रह गया था ।

सच कहूँ तो मेरा शरीर
दायित्व से दबा था ,

और मन दबा था
वादा पूरा न कर पाने के
बोझ तले.

लेकिन जनता हूँ
ये दिन भी निकल जायेंगे
और दिन की तरह,
निकल आएगा सूरज
बादलों की ओट से ।

एक दिन

Sunday, September 26, 2010

पगली दीदी

मेरी
दीदी थी वो,
सीधी-सादी,
अच्छी थी वो।
अग्रसोची थी
मेधावी थी वो।

सोच बड़ी थी उनकी,
ऊंची थी
उनके सपनों की उडान।
दृढ-निश्चयी थी,
लगनशील थी,
थी उद्यमिता से भरपूर ।

चेहरे पर उनके सदा
विराजती थी
मृदु-मुस्कान।
घरवाले कहते थे
घर की इज्जत,
घर का मान थी वो.

करना चाहती थी
अपने डैनों पर भरोसा ,
अपने पंखो पर हो सवार
उड़ना चाहती थी उन्मुक्त,
छू लेना चाहती थी
नीली ऊंचाइयां
आसमान की.

बनना चाहती थी
स्वयं अपना नियंता
गढ़ना चाहती थी
अपने लिए
नए प्रतिमान,
जीना चाहती थी
मर्जी का जीवन,
खुद चुनना चाहती थी
अपना जीवन साथी.

खुलकर जीना चाहती थी
अपना वर्तमान,
पक्षियों की तरह
करना चाहती थी परवाज,
रिश्तों के दायरे को
ले जाना चाहती थी
रुढियों के पार.

पर,
समाज के ठेकेदारों,
संस्कृति के पहरेदारों को
रास नहीं आया
उनका सपना
उनका उत्साह.
सह नहीं पाए
अपना संसार बनाने,
बसाने की
उनकी चाहत.
पिंजरे के पंछी सा
जो पाला था उसे.

एक दिन
अपनों ने ही
क़तर दिए
उनके पर,
फ़ेंक दिया बाहर
वो बेबस सी
देखती रहीं,
चाहकर भी
नहीं उगा पाई
नए पंख,
डैनो के सहारे
घिसटती रही,
घिसटते-घिसटते ही
एक दिन
दम तोड़ गई
पिंजरे से बाहर।

(घटना जो मेरे सामने से गुजरती रही साल-दर-साल और आज भी गुजर रही है किसी-न किसी रूप में मेरी नजरों के सामने से.मैं एक मूक साक्षी सा खड़ा हूँ एक किनारे.)

अब और नहीं...

आजतक जो हुआ
उसे भूल जाना
एक डरावना
अतीत समझकर।

बनना ही होगा
तो बनना रांझे की हीर,
बनकर शीरी
खोज लेना अपना फरहाद
जो रहेगा सदा तेरे साथ
तेरा हमदम,
हम-कदम बनकर।

चाहकर भी
नहीं करना स्वीकार
दोहरा वनवास,
अपहरण का दंश,
अंत में धरती की गोद।
नहीं करना स्वीकार
उर्मिला की तरह
थोपा गया एकाकीपन
चाहे कारण क्यों न हों
कितने भी उद्दात,
नहीं बनना कान्हे की राधा
जो विरह का योग बने,
बस तस्वीरों में रह जाये साथ,
अब नहीं चढ़ना
चौपड़ के दाव पर,
नहीं करना स्वीकार
औरों के कारण
अज्ञातवास ,

चौखट के पीछे
मत काट लेना
अपना सारा जीवन,
मत करना
सिर झुकाकर स्वीकार
दूसरा वनवास
ये सोचकर की तू नारी है,
सोच में बदलाव
तेरी जिम्मेवारी है.
आज भी अगर
ऐसा नहीं हुआ तो
नहीं लिख पाओगी
जीवन की नई कहानी,
नहीं सूखेगा कभी
तेरे आँखों का पानी.

आगे बढ़ो और गढ़ लो
एक नई परिभाषा
प्यार की, रिश्तों की.
अर्पित करो स्वयं को
संबंधों पर
ताकि "समर्पण" का अर्थ
बदल जाये,
विस्तृत हो जाये
संबंधों का आयाम.
मत करो उत्सर्ग
बे सिर-पैर की परम्पराओं में बंधकर.
तुम्हारे मान में ही है
सबका मान,
तुम्हारे सम्मान पर ही टिका है
औरों का सम्मान.

Saturday, September 25, 2010

ये क्या किया

ये तुमने क्या किया ?
ईश्वर को अपनी मर्जी का
गुलाम बना दिया,
जहाँ से चाहा उठा दिया,
जहाँ चाहा बिठा दिया
कभी मंदिर तो कभी मस्जिद में डाला
कभी ईसा तो कभी गुरु नानक में ढाला।

तुमने ही पाला, तुमने ही पोसा
तुमने ही तोडा,तुमने ही जोड़ा
पर,नहीं मिटा पाए मन से हमारे
राम-रहीम,कृष्ण-करीम,
ना ही उनके आदर्श,
न ही तोड़ पाए
उनके बनाये रास्ते

तोड़ पाए तो बस
कोई मंदिर,कोई मस्जिद
किसी का बुत,किसी का घर,
कोई कसर नहीं छोड़ी
तोड़ने में आस्था की कमर,
अपना अलग आदर्श बनाकर ।

तुम जानते हो
आज जो अयोध्या में बैठा है
वो राम नहीं है,.
जो वृन्दावन में बैठा है
वो घनश्याम नहीं है.
ये तो कब के समां गए हैं
हमारे मन में
घर कर गए हैं
जन-जन में।

तुम जानते थे
ये जो मंदिरों और मस्जिदों में बैठे हैं
कभी कुछ कहते नहीं हैं
बस सुनते हैं जो हम सुनाते हैं
इसी का फायदा तुमने उठाया,
ला खड़ा किया
भाई को भाई के सामने,
दोस्त को दुश्मन बना
चलाते रहे अपनी दुकान।

अपनी हरकतों से बाज नहीं आये
अपनी पहचान बनाने,
बचाने के चक्कर में ,
तोड़ते गए,टूटते गए,
आपस में बंटते रहे,
बांटते रहे अपना ईष्ट,
कभी सोचा नहीं
आखिर क्या होगा इसका हश्र ?

गर औरों को मिला पाते
तो इन्सां हो जाते.
घृणा को घर करने दिया
तुमने अपने मन में,
प्यार की फसल नहीं उगा पाए,
सहिष्णुता,एकता,
भाई-चारा और समभाव का पाठ
नहीं पढ़ा पाए खुद को ।

स्वार्थवश
तुम्ही ने किया
खेत से खुदा तक का बंटवारा,
बढाई दूरियां अपनों के बीच
अपना-अपना देवता, बनाकर।

काश !
धर्म को अपनी जागीर न बनाते ,
भेद-भाव की दीवार न उठाते
तो आज हम
राम-रहीम को साथ-साथ पाते।

Thursday, September 23, 2010

दादी-मां की बोरसी

दादी बड़े जतन से
बनाया करती थी बोरसी,
कुम्हार के घर से मंगवाती थी
काली दोमट मिटटी,
पानी मिला-मिलाकर
गूंधती थी उसे ,
मिलाती थी उसमें
पुआल बड़े-बड़े टुकड़े
जो उसकी उम्र बढ़ाते थे.
फिर पूरी तन्मयता से देती थी
उसे मनचाहा आकार
जैसे हो कोई शिल्पकार।

सुघड़ता और चिकनाई का
रखती थी पूरा-पूरा ध्यान
क्योंकि उसे नहीं था पसंद
रुखड़ापन,
न बोरसी में
और न ही व्यवहार में.
सुखाती थी उसे कई-कई दिन
सूरज की आंच में धीरे-धीरे
क्योंकि उसे
सहेजकर रखनी होती थी आग
अपने लिए, औरों के लिए।

पूस की रात हो
या लगी हो सावन की झड़ी ,
दादी की बोरसी में होती थी आग
कभी लपटों के साथ जलती हुई ,
कभी नवजात शिशु की भांति
गर्म राख की चादर ओढ़े
पड़ी होती थी
ग़ुम-सुम,चुप-चाप ।

शायद ही कभी
बुझती थी ये आग,
दादी जलाये रखती थी,
जगाये रखती थी इसे
हर-पल, हर-क्षण .
जब सोने जाती,
बड़े जतन से रख लेती थी
खाट के नीचे इसे,
गर्म रखती थी
अपना जर्जर होता शरीर,
बनाये रखती थी
रिश्तों में गर्माहट
इसे बाँट-बांटकर ।

जब लगती थी सावन कि झड़ी
चाह कर भी
नहीं निकल पाता था सूरज
बादलों को भेदकर
कई-कई दिन।

और ग्लूकोज के टिनही डब्बे में
सहेज कर रखी
माचिस कि तीलियाँ भी
सिल जाती थी,
कर देती थी जलने से इन्कार
तब कम आती थी
दादी मां की बोरसी में आँखें मूंदें
अलसाई पड़ी आग।

नहीं बुझने देती थी दादी मां
किसी के घर का चूल्हा .
जब भी कोई मांगनें आता
राख को हौले-हौले कुरेद कर
जतन से बाहर निकालती थी
एक छोटा टुकड़ा आग का ,
सूखे उपले पर रखकर दे देती थी
जरूरतमंद को।

कड़कड़ाती ठंढ में
सुसुम दूध में मिलाकर जोरन
इसी बोरसी की गुनगुनी आंच में
दही जमाती थी दादी मां,
दूसरों को जोरन देने में भी
कभी पीछे नहीं रहती थीं,
शायद जानती थी
इससे भी जमता है
आपसी रिश्ता
बिलकुल दही की तरह ।

दादाजी को भी दिया करती थी
जिससे जलता था अलाव,
जलता था उनका हुक्का,
जिसे बड़े चाव से पीते थे
दादाजी और उनके ढेरों दोस्त,
जिसके धुंए में होती थी
तम्बाकू की गंध
और रिश्तों की महक
साथ-साथ.

उनकी बोरसी की आग से ही
जलाई जाती थी
हमारी लालटेन कई बार
उसके चारो ओर बैठे होते थे हम
पतंगों की तरह.
दादी की आग
सिर्फ औरों का चूल्हा ही नहीं जलाती थी,
सूरज की सहचरी बन
उसके आने तक
उजाला फैलाती थी.
जीवन के हर तम को
दूर भगाने का
रास्ता दिखाती थी.
(बोरसी=अंगीठी;जोरन=जामन;सुसुम=गुनगुना )

Sunday, September 19, 2010

काश ! कुछ किया होता

हर बरसात में
टूटी सड़क,
रास्ते हो गए
उबड़-खाबड़
उनमें गड्ढे उभर आये,
चलना लगने लगा दूभर,
पर ठीक करने कि नहीं सोच पाए
रास्ता बदल लिया
क्योंकि बेहद परेशान थे.

टपकती रही टूटी छत,
कोशिश नहीं की
दरार भर जाये,
कोसते रहे बरसात को
होते रहे परेशान .

लेकिन बरसात का क्या ?
बरसता ही रहा
कभी बे-मौसम,
कभी सावन की घटा बनकर.

टूटी सड़क बना पाते
तो शायद चल पाते ,
छत की दरारों को भर पाते
तो शायद
भीगनें से बच जाते .

पर,हमतो
रास्ते बदलते रहे,
घर बदलते रहे,
रोक नहीं पाए बरसात,
न ही सड़क का टूटना
न ही छत टपकना.

ना ही सड़क ठीक कर पाए,
ना ही अपना घर
बस भींगते रहे,
भागते रहे
अपने-आप से.

Saturday, September 18, 2010

लिव-इन-रिलेशनशिप

न कोई रिश्ता
न कोई बंधन
बस एक छोटी सी शर्त
एक छोटा सा निबंधन .

साथ रहकर भी
नहीं होगा साथ
सात जन्मों का.
पल-क्षण का मिलन होगा,
मेल होगा,खेल होगा,
खिलवाड़ होगा प्रकृति साथ,

जीवन चक्र टूटे या रुके
ये रिश्ता चलेगा सालों-साल
आजादी और अपने-पन का भ्रम पाले
जवानी की वैसाखी पर सवार.
रहेंगे दोनों साथ-साथ
पक्षियों की तरह
स्वछन्द , उन्मुक्त
अपना-अपना आकाश लिए .

यहाँ पुराना कुछ नहीं होगा
सबकुछ होगा नया-नया ,
अपनों की सोच नहीं होगी,
नहीं होगा सर पर रिश्तों का बोझ,
अपनी-अपनी आजादी होगी,
अपनी-अपनी राह.
कोई किसी का नहीं होगा,
होगा मनमर्जी का साथ ,
मां-बाप के होते हुए
बच्चे होंगे अनाथ .

कोई दायित्व नहीं,
जीवन में स्थायित्व नहीं
कैसा है यह सम्बन्ध जहाँ
अपनों की सौगात नहीं.
अपने-पन की कोई बात नहीं,

समय का हैमलेट होना

समय का "हैमलेट" होना
तो समझते हैं न पापा ?
तब तो यह भी समझते होंगे
जिम्मेवार कौन है-समय या आप ?
मैं तो नहीं हूँ
क्योंकि न तो मैं समय हूँ
और न ही आप .

मैं हजारों टुकड़ों में
टूटकर बिखरा आइना हूँ
अपने आप में समेटे
आपक आपके पदचिन्ह
और समय की तस्वीर
टुकड़ों में बँटा अस्तित्व कह लें इसे .

उम्मीद की डोर थामे
जीवन की चाह लिए
कभी जीवन के साथ ,
कभी जीवन के पार
एक अर्थहीन बलिदान दे रहा हूँ -
आप चाहे तो ऐसा कह सकते हैं

लेकिन आप इस बदलाव को कैसे देख पायेंगे ,
आप तो अपनी आदतों के शिकार हैं,
आदत जो आज चाहत बन गयी है ,
स्वभाव बन गया है।
इसी चाहत ने
आपको "मिदास" बना दिया है ,पापा ।
आप तो सिर्फ सोना चाहते हैं,सोना,
और कुछ नहीं।

चेतना और परिवर्तन
एक भयानक गाली है आपके लिए।
सोने सा बेटा आपको जगा नहीं पाता,
शायद जगा भी नहीं पायेगा
क्योंकि उसे खुद के सोना होने का
अहसास जो है।

समय का हर कतरा
वहशी है,पागल है
क्योंकि उसके हर कतरे को ढाला है
आपने
अपने सांचे में
सजाया है, संवारा है
अपनी मर्जी से
अपनी आदतों की तरह ।

तभी तो सोचता हूँ
समय और आप ,
आप और मैं
एक ही जैसे क्यों हैं।
("मिदास" एक राजा था जो सोने का भूखा था
उसने ईश्वर से यह वरदान माँगा था कि वह जिस किसी
वस्तु को छुए वह सोने की हो जाए")

Wednesday, September 15, 2010

"मेरी मातृभाषा"

मां
जब मैंने पहली बार
तम्हारी गोद में
आँखे खोली थी
तब नहीं जानती थी मैं तुम्हें ,
नहीं जानती थी दुनियां को ,
दुनियांदारी को ,
नहीं जानती थी क्या होते हैं
अक्षर और शब्द
क्या होती हैं भाषा.

तुम रोज-रोज निहारती थी
मेरा चेहरा
कुछ पढती थी वहां
मैं तो बस देखती थी तुम्हें
मेरी आँखों में झांककर
बुदबुदाते हुए.
देखती थी तुम्हारे होठों को
बार-बार खुलते और बंद होते हुए
शायद मैं भी तेरे संग-संग
बुदबुदाती थी
तुम जो कहती थी
उसे समझाना चाहती थी,
पर समझ कहाँ पाती थी.

तुम कहती थी "माँ--माँ--माँ--माँ"
मैं तो बस
तुम्हें देखती थी
तुम्हारी नक़ल उतारती थी.

"बा-बा-बा-बा;पा-पा-पा-पा"
करते-करते
कब तुम्हारे मुंह से
अक्षर-अक्षर
निकल-निकलकर
मुंह के रास्ते
मेरे मष्तिष्क में समाते गए
आपस में जुड़ते गए
शब्द और वाक्य बनते गए
पता ही नहीं चला .

यही मातृभाषा है मेरी
ये तो तब जाना,
तब पहचाना
जब तुमने गोद में बिठाकर
मुझे बताया:
"अ" से "अमरुद", "ई" से "ईश्वर".

अक्षर से शब्द,
शब्द से वाक्य तक का सफ़र
मैंने तेरी गोद में ही तो पूरा किया.
तुमसे विरासत में मिला
यह अक्षर ज्ञान
मेरी मातृभाषा है, मेरी पहचान है
बिलकुल तुम्हारी तरह.
(राजभाषा दिवस के अवसर पर अपनी मातृभाषा को सादर समर्पित)

Sunday, September 12, 2010

मैं भी रखना चाहता हूँ व्रत तुम्हारे लिए

आज
मैं भी
रखना चाहता हूँ व्रत
तुम्हारे लिए ,
तुम्हारी लम्बी आयु के लिए,
रहना चाहता हूँ
निर्जलाहार
पूरे एक दिन
ताकि, महसूस कर सकूं
तुम्हारी श्रद्धा, चिंता ,
मेरे लिए
तुम्हारा समर्पण,
तुम्हारा प्यार,
देख सकूँ
तुम्हारा कामना से दीप्त चेहरा ,
जिसमें कांति है ,
पानी की चमक है
और है
मेरे लिए तुम्हारा प्यार ,
प्यास का जरा भी
अहसास नहीं है।

हर वर्ष रखती हो तुम
व्रत मेरे लिए
रहती हो दिन-रात
बिना जल का पान किये,
रचाती हो मेहंदी अपने हाथों में,
पैरों में लगाती हो महावर,
करती हो सोलह श्रृंगार
पूरी आस्था के साथ
लगाती हो माथे पर बिंदी,
मांग में सिन्दूर
जिसमें होती है
विश्वास की लाली,
जिसमें होता है
एक असीमित विस्तार
प्रकृति तरह।

बिटिया ने कई बार पूछा है -
एक सवाल ,
"मां ही क्यों रखती है हर व्रत
हर बार सबके लिए ,
आप क्यों नहीं रखते
मां के लिए कोई व्रत कभी",
मैं रहा निरुत्तर .........

हाँ,ये सच है कि मैं
कभी नहीं बाँध पाया स्वयं को
पूजा-पाठ ,व्रत-उपवास के बंधनमें
तुम्हारी तरह ,
पर, पल-पल बंधा रहा हूँ मैं
तुमसे ,
तुम सबसे,
निष्ठा रही है मेरी
आपसी संबंधों में,रिश्तों में.

तुमने समय के साथ चलकर भी
बांधे रखा स्वयं को परम्पराओं से ,
पर,परम्पराओं से अलग
मैं बंधा रहा
तुमसे,तुम्हारे सरोकारों से।

मैंने तो बस इतना जाना है
जब भी तुम परेशान हुई,
परेशान हुआ मैं.
तुम्हारी मुस्कान से
खिल उठता है
हम सबका मन ।

कहते हैं
ये रीति-रिवाज,व्रत-उपवास
रिश्तों की नींव मजबूत बनाते हैं
संबंधों का वटवृक्ष उगाते हैं
हर वर्ष आकर
हमें कुछ याद दिलाते हैं.

पर ,
तुम तो जीवन साथी हो मेरी,
बराबरी का है साथ।
तुम चाहो तो मिलकर ले आयेंगे
परम्पराओं में बदलाव ,
बदल देंगे
कुछ पुराने प्रतिमान,
नया गढ़ लेंगे ।
तुम सिन्दूर,बिंदी और कंगन को
बंधन नहीं ,
बना लेना श्रृंगार
मैं तेरे साथ मिलकर
बसा लूँगा एक संसार.
जहाँ प्यार और विश्वास ही होगा
जीवन का आधार।

Wednesday, September 8, 2010

फादर्स-डे

आज सुबह-सुबह नहाई थी मैं
संवारे थे करीने से अपने बाल
पहने थे अपने पसंद के परिधान
क्योंकि आज है "फादर्स-डे,
मुझे जाना है स्कूल
मिलना है अपनी टीचर जी से
उनसे पापा का परिचय करवाना है .

मम्मी नहीं चाहती थी मैं जाऊं स्कूल,
बनूँ हिस्सा उस भीड़ का
जिसमें शामिल थे
मेरे दोस्त और उनके पापा.

मैंने सोच लिया था जाउंगी,
जरूर जाउंगी स्कूल
अपने पापा से सबका परिचय करवाउंगी
सबको बताउंगी उनके बारे में.

मम्मी थी बहुत उदास,घबराई सी
पर आई थी मेरे साथ-साथ,
एक-एक कर मेरे दोस्तों ने
टीचर जी से अपने पापा को मिलवाया ,
उनके बारे में संक्षेप में बताया.

जब मेरी बारी आयी
टीचर जी ने बुलाया अपने पास
सबने देखा पापा नहीं हैं मेरे साथ
एक ने कहा "अरे!मिन्नी के पापा नहीं हैं उसके साथ"
दूसरे ने कहा "शायद! नहीं हैं उसके पापा"
किसी ने पीछे से कहा,
"सोचते होंगे कौन समय बर्बाद करे इन बेकार की बातों में "
इन सबसे से कतई परेशान नहीं थी मैं .

मैं मंच पर खड़ी हुई और बोली
"देखो,मेरे पापा खड़े हैं मेरे साथ"
पर,आप सब नहीं देख पाओगे उन्हें
क्योंकि मेरे जैसी मन की आँखें
नहीं हैं आपके पास,
सुनकर दंग रह गए थे सभी.
मैंने कहा "मेरे डैडी नहीं हैं यहाँ,
दूर देश में रहते हैं वो ,
चाहते तो हैं रहना मेरे साथ
क्योंकि वर्ष में एक बार आता है
ये विशेष दिन."
पर, एक सच्चे सैनिक थे,
आतंकवादियों लड़ते हुए
शहीद हुए थे वो
देश से बड़ा नहीं था
उनके लिए मेरा प्यार।

मैं बताना चाहती हूँ आपको
"बहुत प्यार करते थे मेरे पापा मुझसे ,
सुनाया करते थे अच्छी-अच्छी कहानियां ,
साईकिल चलाना सिखाया करते थे,
बताया करते थे गुर पतंग उड़ाने के".
मेरे जन्मदिन पर दिया था मुझे
मेरे गुलाबी ड्रेस से मिलता गुलाब.

आपकी नजरें नहीं ढूंढ़ पा रही हैं उन्हें
पर अकेली नहीं हूँ मैं
क्योंकि उन्होनें कहा था
मेरे दिल में रहेंगे धड़कन बनकर
चाहे कहीं भी रहे वो .

गर्व से चमकती मां की आँखों से
बह चली थी अविरल अश्रु-धार
उम्र से बड़ी बिटिया को देखकर
जो थी अब उसका जीवन
उसका प्यार-भरा आधार .


पापा के लिए उसका प्यार
गूंज रहा था चारो ओर
बनकर उसके सन्देश का सार
"मुझे है डैडी से बहुत प्यार,
आज भी चमकते है ध्रुव-तारा बन
मेरे आँगन में "
आ खड़े होते मेरे पास
जो आसमां नहीं होता इतनी दूर.
बंद आँखों से सदा पाया है
मैंने उनको अपने पास.

सबकी आँखें बंद थी,
सब देख रहे थे
मिन्नी का आत्मविश्वाश
जिसमें खड़े थे उसके पापा।

वह हौले से बुदबुदाई थी,
"मैं जानती हूँ आप हैं मेरे साथ,
आसमां नहीं है दूर, नहीं हैं दूर आप ".
यही था उसका सच, उसकी ख़ुशी का राज.

Monday, August 30, 2010

गृहणी हूँ मैं

गृहणी हूँ मैं

न जाने कितने संबंधों में

बंधी हूँ मैं ,

कभी पत्नी,कभी माता

कभी कुछ और हूँ मैं

सृजन का सार हूँ मैं,

सभी संबंधों का आधार

पति और बच्चों से बना

एक छोटा सा

सुंदर संसार हूँ मैं ,

मै देखती हूँ घर और बाहर ,

सास-ससुर को रखती हूँ सादर ।

सबकी अपेक्षाओं ,

उम्मीदों से ऐसी बनी हूँ मैं

गर्व है मुझे

अपने गृहिणी होने पर

क्योंकि थोड़े में पा लेती हूँ

संसार का सारा सुख

पूरा जीवन जी लेती हूँ मैं

बन जाती हूँ

गम और ख़ुशी की पहचान।

सुबह-सुबह

बिटिया को करती हूँ तैयार,

छोड़कर आती हूँ स्कूल वैन में

पति को जाता देखती हूँ दफ्तर

दरवाजे पर खड़े-खड़े तबतक

जबतक की वो

आँखों से ओझल नहीं हो जाते ।

कुछ डर,कुछ संशय लिए

बना रहता है मन में एक उद्वेग

उनके लौटकर घर आने तक ।

उन सबके जाते ही

घर के साथ-साथ

मन का खालीपन भी

काटने को दौड़ता है,

ह्रदय में मची रहती है हल-चल

विचारों की ,

नजरें बिछी होती हैं सड़क पर

उन सबके लौट आने तक।

इस खालीपन से बचने के लिए

करने लगती हूँ

घर की साफ-सफाई,

कपड़े धोती,सुखाती हूँ,

किचेन संवारती हूँ,

सबकुछ करती हूँ

पर अनमने ढंग से.

उम्मीदों की डोली में सवार

करती हूँ उनके आने का इन्तजार ,

उन्हें देखते ही मन में

बरस जाती है सावन की घटा ,

निकल आता है पूरा चाँद,

मिट जाती हैं माथे की लकीरें ,

मैं सुंदर हो जाती हूँ ,

क्योंकि मैं मां हो जाती हूँ।

Friday, August 27, 2010

एक सुझाव

भाई साहब आइए
कुछ अच्छा कर जाइए
अपने बेटे को
किसी बेटी के नाम कर
अपना,अपने पुरखों का नाम
ऊंचा कर जाइए,
या फिर,
मुक्त बाजार में
खुला है
नीलामी का विकल्प ,
बेटे की कीमत लगाइए,
बोली लगवाइए,
मनचाहा पाइए ,
बेटे को बेचकर
ख़ुशी-ख़ुशी घर जाइए ।


Wednesday, August 25, 2010

बंधन जो बांध गया सदा के लिए.

बचपन में रहता था
इसदिन का बेकरारी से इन्तजार ,
सपनों में भी दिखती थी
रंग-बिरंगी राखियाँ
कलाइयों में सजी हुई
चेहरे पर होती थी
चटक मुस्कान ।

बहनों का थाल में ,
रोली,राखी सजाना
दीप जलाना,
राखी से मिठाई तक होती थी
उसकी मिठास।
इस सबके पीछे होती थी मां,
होते थे पिताजी ,
हमारा तो होता था उत्साह
राखी बंधवाने का,
मिठाई खाने का
सारे गिले-शिकवे भूलकर
रक्षाबंधन मनाने का।

आज भी जब आता है
ये त्यौहार
ले जाता है मुझे
वर्तमान के पार
मेरे अतीत में
जहाँ गुडिया जैसी
मेरी बहना
बांध रही है
राखी मेरे हाथों में
खिलखिलाती हुई
और मैं
बंधता जा रहा हूँ
उसके प्यार में वैसे ही
जैसे यशोदा के हाथों बंधे थे
माखनचोर ।

Tuesday, August 24, 2010

अनदिखी डोर



राखी



कहते हैं जिसे बंधन



एक डोर है



अनदिखी,पतली सी ,



रिश्तों की



एक-दूसरे को जोड़ती हुई



कल भी इंतजार था इसका



बेसब्री से ,



आज भी है



उतनी ही शिद्दत से।



कह नहीं सकता



कितनी लम्बी है ये डोर



जो कुछ पल बंधकर



बनाए रखती है अनंत तक



भाई-बहन निश्छल प्यार





Thursday, August 19, 2010

दूसरी सड़क के लोग

दूसरी सड़क के लोग हो
तुम लोग,
दूसरा आसमान है तुम्हारा,
गाढ़ा सिन्दूरी लाल,
दूसरी हवा है
दहशत भरी,
एकदम सर्द
तीखी-सी।

सूरज स्याह है ,
ए.के . 47 की तड- तड़ाहट के बाद
चूड़ियों के टूटने की आवाजके बीच से
उभरती है सिसकियाँ,
साथ ही उभरता है
मासूम आँखों में सिमटा
एक उलझन-भरा सवाल
" पापा बोलते क्यों नहीं,
क्या हो गया उनको ?"
कोई जवाब नहीं।
उसके ग़मगीन चेहरे पर
अभी भी ठहरे हुए हैं
कई उनुत्तरित सवाल,
ख़ामोशी में तैरते हुए ।

नेता,पुलिस,पडोसी,
सांत्वना के दौर,
लोगों का आना-जाना,
सर झुकाना और चले जाना।
लेकिन तुम्हे क्या?
तुम तो जेठ के सूरज हो
हवाओं को झुलसाते हुए,
शाम का क़त्ल कर
उसे खून से नहलाते हुए,
छोड़ जाते हो
अंतहीन रातें
रोने के लिए।

Tuesday, August 17, 2010

सावन के महीने में

सावन के महीने में ,
कड़कती बिजलियों के बीच
घनघोर बरसते पानी में
अकेला खड़ा मैं
तकता रहा आसमान,
निहारता रहा
सफ़ेद-काले भेड़ों से दौड़ते- भागते
बादलों के झुण्ड ।

मेरी इच्छा थी
यूँ ही मुसलाधार बरसते रहे
घने-काले घुंघराले बालों वाले मेघ,
और पड़ती रहे
उसकी शीतल फुहार
मेरे तन-मन पर
ताकि मुक्त हो जाऊं मैं
अतीत की सृजनहीनता से
बो सकूँ सृजन के नए बीज
नई सुबह में उग आने के लिए।

धो डालूं
अपना गुस्सा ,अपना कलुष ,
सावन की फुहार
बन जाये मेरा प्यार ,
बदरी बन सबको
तर कर जाऊं ,
बंजर भूमि में
स्नेह के बीज उगाऊं ।

हर युग, हर वर्ष
इस मौसम का रहा मुझे
बेसब्री से इंतजार ,
इसके साथ आये परिवर्तन का,
नवजीवन का इंतजार
जो पीढियां बनाती रहीं,
श्रृष्टिचक्र बनकर बार-बार
अपनी अंतहीन परिधि में
सबको घुमाती रही ,
देती रही वरदान
जीवन बनकर।

करूँगा अगली सुबह का इंतजार
जब फूलों की पंखुड़ियों पर,
दूब की नुकीली नोकों पर
टिकी होंगी मोतिया बूंदें
ओस की,
और हवा
अपने हिंडोले पर
हिला रही होगी
समस्त पादप-पुंजों को ।

दिखेगा नया उत्साह,
नया जीवन ,
हरियाली की शुरुआत ,
लौट जाऊंगा मैं
अपने बचपन में,
खुले आसमान के नीचे ,
बरसात में नंगे बदन
भींगता-भागता सा।

Tuesday, August 10, 2010

परायेपन की "परिधि"

मैं
परायेपन की सोच से पैदा हुई ,
परायेपन के सच के साथ,
परायेपन के माहौल में ही पली-बढ़ी ,
परायापन हावी रहा ताउम्र ,
मुझ पर
समाज बनकर ।

सबको मिला दूध,
मुझे दूध का धोवन ,
यह सच है,
एक कड़वा सच !
आखिर बेटी जो ठहरी मैं
बेटी तो 'परायाधन' होती है।

परायेपन के अपनेपन में
कब मायका छूटा ,
माँ-बापू के साथ जीने का
भरम टूटा ,
कब अपने गुड्डे-गुड़िया को छोड़
बनते-बिखरते सपनों के संग
ससुराल गई
पता ही नहीं चला!

परायेपन की कोख से ही
फिर बचपन फूटा ,
मेरे भीतर बहुत कुछ बिखरा,
बहुत कुछ टूटा ,
एक बार फिर
मेरा बचपन,
मेरी गोद में ठहर गया
मेरी बिटिया बनकर ।

मैं उसकी आँखों में ढूंढ़ती रही
अपने बिखरे सपने,,
अपना किलकता बचपन
अपना अतीत ,
पर,वहां.............
सिवाय खालीपन के
कुछ नहीं था ,
कुछ भी तो नहीं,
थे तो बस
अपनों के बीच
परायों की तरह
जीते हुए हम ।

लेकिन मैंने सोच लिया है
अपनी बिटिया को
परियों की कहानी दूँगी,
दूँगी उसके सपनों को पंख
उसके बचपन को दूंगी
जवानी ,
उसकी आशाओं को दूंगी
जमीन ।

अब मैं नहीं जीऊँगी
पराएपन के अहसास तले,
उनको भी समझाउंगी
चाहे कुछ भी करना पड़े
अपनी बेटी को 'खूब पढ़ाउंगी' ,
खड़ा करूंगी उसे अपने पैरों पर
दूँगी उसे एक पहचान ।

परायेपन के पालने में
अब नहीं झुलाउंगी उसे ,
पालूँगी अपनेपन के साथ ,
ले आउंगी उसे
परायेपन की "परिधि" से बाहर ।

Monday, August 9, 2010

बुंदेलखंड का सच

बुंदेलखंड का सच
भूख का,तिरस्कार का ,
प्रकृति की मार का,
अपनों की दुत्कार का सच है.

जहाँ सपनों की फसल
बोने की चाह में
न जाने कितने ही सपने
तस्वीर बनकर रह गए .

कुंए के पानी के साथ ही
सूख गए हैं आँखों के आंसू ,
पथराई आँखे
आज भी करती हैं
बुझे चूल्हे के पास बैठ
अपनों का इंतजार
दरार पड़े खेतों ,
झुर्रीदार चेहरे के साथ ।

पूरब लगने लगा है
पश्चिम सा ,
सूरज हरवक्त दिखता है
क्षितिज पर
डूबता सा,
सर्द चांदनी रात देती है
आंसुओं-भरी सुबह.

खेत ख़ुशी नहीं देते आज
शरीर की तरह
सूखी है धरती
जो न हरियाली का सबब है,
न उमंगों का।

मन में उम्मीद का सूरज,
होठों पर सुबह लाली लिए
पालकी से उतरी थी,कम्मो,
अपने पिया की दहलीज पर.
वह ब्याही गयी थी
लड़के के संग-संग,
उसके खेतों के साथ।

सोने जैसी फसल की चाहत ,
"लहलहाती फसल" की सच्चाई
खा गयी उसका पति,
उसका खेत ,
उसके सपने।

मिला क्या दहकती आग
जो चूल्हा नहीं जला सकी ,
बस लगाई पेट में आग,
जला गई दिल को,
कर गई सपनों को खाक।

Thursday, August 5, 2010

काश!टिफिन का डब्बा ही बन पाया होता.

देखा था बहुत कुछ करने का सपना,
पर समय का लगा ऐसा फेर,
बनकर रह गया विचारों का ढेर,
टिफिन का डब्बा भी नहीं बन पाया.

किस्मत तो देखिये टिफिन के डब्बे की,
रोज-रोज भरा जाता है,
अपने भाग्य पर इतराता है,
ख़ुशी-ख़ुशी होता है
कई-कई कन्धों पर सवार,
कई-कई बार,
करता है गंतव्य की सवारी,
बदल-बदलकर गाड़ियाँ
बार-बार,लगातार.

पहुँच कर अपनी ठावं
लेता है एक गहरी साँस
चहरे पर होता है संतोष का भाव.
देखकर अपनों को तृप्त
भूल जाता है अपनी सारी थकान.
कुछ सार्थक कर पाने के दर्प से
होता है उसका मुखमंडल दीप्त.

एकाकीपन का अहसास तो सताता है,
जब दुखी मन से औरों की तरह
अपनी मंजिल पर अकेला जाता है.

लौटते हुए होगी सबसे होगी मुलाकात,
खाली होंगे,पर होंगे साथ-साथ
इस उम्मीद में भूल जाता है अपना गम.
मंजिल पर ही ठहरा रहेगा
मिलने-बिछड़ने का क्रम,
कम ख़ुशी की नहीं है ये बात,
कोई तो रिश्ता है हमारा
उनके साथ औरों के साथ.

Tuesday, August 3, 2010

मैंने देखा है.....

सूखी रेत की तरह
मैंने जिंदगी को
मुट्ठी से
फिसलते देखा है,
काफी करीब से
अपने वर्तमान को
अतीत में
बदलते देखा है
देखा है अपने सपनों को
सजते-संवरते,भरते उड़ान
बार-बार .
अपनी सोच की श्रंखला को
कई बार टूटते-बिखरते देखा है.
लोग आईने के पीछे
ढूंढते हैं खुद को
मैंने आईने में
खुद को बदलते देखा .

Monday, August 2, 2010

कामन वेल्थ गेम्स (अर्थात जन-धन क्रीड़ा)

जी हाँ,जनाब
ये कामन वेल्थ गेम्स है,
अर्थात जन-धन क्रीडा.
सब ले रहे हैं भाग
इस महान उत्सव में,
आप भी आइये, भाग लीजिये,
सभी कर रहे हैं स्वंय पर गर्व,
आप भी कीजिये.
देश का बढ़ा है गौरव
अपने भाग्य पर इतराइए
जबसे हमें
इसकी मेजबानी का हक़ मिला है
जनता के साथ-साथ
व्यस्थापकों का भी दिल खिला है
मन में मची है हलचल
दशकों बाद
कुछ तो अंतरराष्ट्रीय हुआ है .

हुजूर!
यह अकेले का "खेल" नहीं,
ढेरों लोग मिलकर खेलेंगे,
कामन वेल्थ का खेल
खेल भी होंगे अनेक,
कोई पर्यावरण से खेलेगा,
कोई पेड़ों से खेलेगा ,
कोई सड़क से खेलेगा,
कोई सड़क पे खेलेगा ,
कोई सड़क से दूर,
स्टेडियम में खेलेगा,
कोई खेलने जायेगा खेलगाँव.
परन्तु,खेलेंगे सब
क्योंकि यह कामन "वेल्थ"(जन-धन) का गेम है.
जनता तो बस मूक दर्शक बन
देखेगी,झेलेगी सारे खेल,
क्योंकि उसी का "वेल्थ" होता है
"कॉमन".

खिलाडी तो आते हैं
उछल-कूद मचाते हैं
तैरते है,साईकिल चलाते हैं ,
कुछ हारते है,कुछ जीत जाते हैं,
कुछ दिन उधम मचाकर
समापन समारोहके बाद
घर को लौट जाते हैं.

लेकिन कॉमन"वेल्थ" का गेम तो
आगे भी चलता रहता है
वर्षों पहले से महीनों बाद तक-एक समयबद्ध,
दूसरा समय से परे असीम.
यह कल भी जारी था,
आज भी है और कल भी रहेगा.

लेकिन स्वर्णपदक तो उसे ही मिलेगा
जो देश की अस्मिता से खेलेगा.

Monday, July 26, 2010

रिश्तों की भूख जगने दो

कल जैसा नीला नहीं है आसमान
आज अँधेरा पहले से अधिक घना है,
दीये ने रौशनी से नाता तोड़ लिया है,
आज चमकता सूरज सिर पर है,
पेड़ों ने हरियाली का दामन छोड़ दिया है,
मुंह मोड़ लिया है सावन की घटाओं ने,
पुरवैया बयार ने बहना छोड़ दिया है.

गलियों-कुचों में रहते हैं ढेरों लोग,
फिर भी यहाँ सन्नाटा पसरा हुआ है,
सुख-सुविधाओं का लगा है अम्बार,
पर,बात-बात पर होने लगी है
अपनों में तकरार,
बच्चे भी भूल रहे हैं अपना व्यवहार,
जाने-अनजाने ही हर स्तर पर
होने लगा है रिश्तों का तिरस्कार ,
जलकुम्भी के ढेर सा हो गया है जीवन,
ढेर के ढेर पर सबकी जडें अलग-अलग,
नई जडें ज़माने की चाह में
हर बरसात में होते रहे अपनी जड़ों से जुदा.

अपनों की यादों को गुम हो जाने दिया है
गुम होती तस्वीरों के साथ
बस बचाकर रखा है
तो बिना भविष्य का एक छोटा-सा अतीत,
एक छोटा-सा वर्तमान.

जीवन-वृत्त को काटकर
रेखा बनानेवाले
कभी लौट नहीं पाते
अपने स्वर्णिम अतीत की ओर,
नहीं दे पाते अपने सपनों को मनचाहा रंग
क्योंकि रेखाओं की परिधि नहीं होती.

अतीत तो आज भी बाहें फैलाये
अंक में भर लेने को आतुर है वर्तमान
पर,वर्तमान अपने चका-चौंध से इतर
कहाँ देख पाता है,कब देख पाता है ये सब ?
सुख की चाह में गले लगा लेता है
जीवन-भर के लिए अकेलेपन का रोग
अवसाद-भरा,भटकाव-भरा.

"उसका" ख़त

आज भी
जब देखता हूँ
"उसका" ख़त
याद आता है
बीता हुआ कल,
वो बैचनी,
वो अपनापन.

कैसे
बैचैन कर जाता था
उसके ख़त का
इन्तजार,
बढ़ा जाता था
मेरी भीतर की
बेकरारी.

लेकिन
उमड़ आते थे
घने बादल
लग जाती थी
सावन की झड़ी,
नाच उठता था
मेरा मन-मयूर,
उसका ख़त पाकर.

सुख से भर देती थी
मेरे मन-प्राण
उनके हाथ की लिखाई
क्योंकि
उसके पीछे होता था
उसका अक्स ,
उसका समर्पण ,
उसका प्यार.

लगता है मानों
वह स्वयं खड़ी हो
ख़त के मजमून में
मेरे लिए बाहें फैलाये
आज भी.

Thursday, July 22, 2010

मेरा घर

मेरा घर है
छोटा सा,
टूटा-फूटा हुआ,
छप्परदार ,
इस छप्पर में हैं
ढेर सारे छेद.

जब उतर आती है
घनी अँधेरी रात ,
टूटे छप्पर के छेद से
झांकता है
एक मोहक तारा
शायद कहता है-
"तुम्हारी हालत पर
तरस आता है".

मैं जानता हूँ
वह मेरे घर को देखता है
घर के टूटे
छप्पर को देखता है,
मेरे मन को,
मन की उड़ान को
नहीं देखता
जो जाड़े की
सिहरन भरी रात में
रजाई की ओट से
छप्पर के पार
देखता है
तारों भरा आकाश
और
सोचता है
किसने बनाया होगा
नीला आकाश,
चमकता सूरज ,
दमकता चाँद.

किसने जड़े होगे
रात की चादर में
जगमगाते सितारे,
इतने सारे!
इतने मोहक!
इतने प्यारे!

Monday, July 19, 2010

कौन देखता है?

अनदिखे भावों के टूटन
कौन देखता है?
कौन देखता है
उनसे उभरता दर्द
कब देखता है?

सितार के तार का टूटना
और
उस टूटन में
उसके स्वर का
गुम हो जाना
तो सब देखते हैं.
कौन देखता है
एक अनगूंजा स्वर
देर तक ठहरा हुआ?

टूटते तो घरोंदें भी हैं,
हिरोशिमा भी,
उनका टूटना,
टूटकर बिखरना
तो सब देखते हैं,
पर अस्तित्व का
बिखरना
कौन देखता है,
कब देखता है?

आग और धुंए का
उठता गुबार
सब देखतें हैं
पर उसके साए में
पलते-बढ़ते
दूसरे गुबार को
कौन देखता है?

कौन भूलता है
उस घुटन का दर्द,
टूटन का दर्द?

Friday, July 16, 2010

पागल नहीं हूँ मैं

लोग
मुझे पागल
समझते हैं
क्योंकि
मैं
तन नहीं ढकता
अपने मन का,
नहीं ढो पता हूँ
संस्कारों की लाश,
सर्द रिश्तों का
बासीपन
अपनेपन की गर्माहट
नहीं देता,
नहीं देता
वो अनदिखी डोर
जो बांधे रखती है
हम दोनों को
साथ-साथ.

मेरी आदिम भावना
तपिश ढूंढ़ती है,
तपिश ,
रगों में
ढूंढ़ती है
खून का उबाल ,
ढूंढ़ती है
भावों में तड़प
तुम्हारे लिए
एक अनबुझी प्यास लिए
एक अनजानी चाह लिए .

Thursday, July 15, 2010

दिल्ली

मेरी दिल्ली
अपनी सारी
विविधताओं,
अपनी सारी
विषमताओं
अपनी बदमिजाजी ,
अपनी सारी
बदगुमानी ,
अपनी झोपड़पट्टीयों,
अट्टालिकाओं के साथ
दिल्ली
कब मेरे दिल में
समां गई
पता ही नहीं चला.

इसके बहते नाले,
इसकी सूखी नदियाँ,
इसके भीड़-भरे चौराहे,
हर जगह धक्का-मुक्की
कब मन को भा गए,
पता ही नहीं चला.

यह भी पता नहीं चला
कब वह मुझमें
और मैं
उसमें.

Wednesday, July 14, 2010

चिट्ठी

बड़े जतन से
सहेजकर रखा है
तुम्हें आजतक ,
क्योंकि
तुझमें समाएं हैं
मेरे दादाजी , दादी मां,
और समाया है
मेरे लिए उनका प्यार .
तुझमें सिमटे पड़े है
उनके बोल,
बोल की मिठास,
उनका स्नेह,
उनका आशीष.

दादा-दादी तो नहीं हैं
आज हमारे बीच
पर,तुमने
संजो रखी है
उनकी यादें
अपने सीने में
मेरे लिए .
जब कभी भी
देखता हूँ तुम्हें
चल-चित्र की भांति
सामने आ खड़े होते हैं
वे दोनों .

आज भी
उन खतों में
घूमती है दादी,
उनकी बातें बुलाती हैं,
जब भी छूता हूँ तुम्हें
बन जाती हो
दादी मां की गोद,
दादाजी का कन्धा बन
सामने आ जाती हो .

आज भी
तुममें है
मेरा बचपन ,
मां का दुलार,
पिताजी की बातें,
उनकी नसीहतें
"दूर जा रहे हो,
नई जगह है,
ध्यान से रहना,
दूसरों से सदा
अच्छा व्यवहार करना "
पढ़ता हूँ तुम्हें
बार-बार,कई-कई बार,
पर,
उनमें लिखी बातों को
दूरभाष पर हुई बातों की तरह
बिसरा नहीं पाता हूँ
क्योंकि
वे ठहरी हुई हैं
तुम्हारे पन्नों में
सदा के लिए
यादें बनकर.

Wednesday, July 7, 2010

बिटिया

बिटिया,
तू तो
कविता है मेरी.
नाजों पली
तितलियों के पीछे
दौड़ती-भागती
फूलों से लदी
मखमली
परिधान में सजी
नन्ही गुड़िया है मेरी.

निःशंक सोयी रहती है
मेरी गोद में
सपनों का संसार लिए
और
मैं
अपने चारो ओर
बुनती रहती हूँ
कल्पनाओं के अद्भुत
जाल.
ओढ़ लेती हूँ
सितारों से जगमगाती
अँधेरी रात,
और
हो जाती हूँ
अनंत .
तुझमें पाती हूँ
जीवन के सारे रस
सारे रंग
सुख-दुःख के
दो किनारों के बीच से
बहता हुआ.

तुम लगा देती हो
मेरे मन-आँगन में
खुशियों की झड़ी
उमड़ आती है
सावन की घटा,
खुल जाते है
सारे सृजन-द्वार
जब तुम छलकाती
अपनी निर्मल,
निश्चल मुस्कान
कर जाता है
व्योम को पार
हमारा आनंद,
हमारा प्यार.

Monday, July 5, 2010

तेरा स्पर्श

तेरा स्पर्श
मुझे
दूसरी दुनियां में
ले जाता है-
अन्तेर्मन की दुनियां में
जहाँ हिलोरें मारती उमंगें है
ठाठें मारता समंदर है
खुशियों का
नीचे
ऊपर है आसमान
नीली छतरी सा
पसरा हुआ
दूर सागर में
समाता सा.

लौकिक होते हुए भी
कितना अलौकिक है
तेरा स्पर्श
मेरे भावों को
ताजगी देता हुआ
और
देता हुआ
ढेरों अनसुलझे,
अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर
दुनियावी होकर
जिसका हल
नहीं ढूंढ़ पाता मैं.

तेरा स्पर्श
मुझे
मेरे होने का
अहसास कराता है
जीवन में
तुम्हारे होने का
महत्व बतलाता है
और
दिखलाता है
वह अदृश्य बंधन
जो
हमदोनों के साथ-साथ
सारे जग को
अपने बाहुपाश में
बाँध जाता है.

तेरा स्पर्श
उठा लेता है
गोद में
मेरा बचपन
संबंधों के
अद्भुत संसार की
सैर कराता है
भेद-भाव से बचाता है.

तेरा स्पर्श
मुझे पूर्णता की ओर
ले जाता है
अपनेपन का पाठ
पढाता है,
जीने की राह
दिखलाता है
एक अच्छा
आस्थावान इंसान
बनाता है.

तेरा स्पर्श
मुझे
वहां ले जाता है
जहाँ सारा द्वंद्व
निर्द्वंद्व हो जाता है,
साकार हो जाता है
निराकार ,
सीमाएं हो जाती हैं
आभाषी
और
सबकुछ
हो जाता है
एकाकार.

Friday, June 25, 2010

तुमसे मेरा श्रृंगार प्रिये

तुमसे ही है जीवन मेरा,
तुम्हीं मेरा आधार प्रिये,
तुमसे ही जीवन-सार मेरा ,
तुम्हीं मेरा श्रृंगार प्रिये.


माथे बिंदी,हाथों कंगन ,
पावों में पायल की रून-झुन,
बालों में फूल भरा गजरा,
अपने में यौवन-भार लिए,
तुमसे ही जीवन-सार मेरा,
तुम्हीं मेरा श्रृंगार प्रिये.


जब चलती तुम इठलाती सी ,
मदमाती सी ,बल खाती सी ,
गंगोत्री बन बहती जाती
मेरा तट अपने साथ लिए,
कर देती तुम उद्धार मेरा,
तुमसे ही मैं साकार प्रिये.

यादों की उम्र नहीं छोटी,
यह मन में बसता जाता है,
हम आगे बढ़ते जाते हैं,
यह पीछे-पीछे आता है
खुशबु की एक बयार लिए,
मेरा जीवन संचार प्रिये

जब-जब जाती हो छोड़ मुझे ,
नज़रों से ओझल रहती हो,
आता है मुझको याद सदा
तेरे संग बीता एक-एक पल,
तुम आ बसती मन-आँगन में
मीठी सी कुछ सौगात लिए.


जब दर्द बहूत बढ़ जाता है,
बैचैनी बढती जाती है,
यादों राह की पकड़ता हूँ ,
तस्वीर तुम्हारी साथ लिए,
तुमसे मरहम की आस लिए.
तुम आ जाओ एकबार प्रिये
तुम ही मेरा उपचार प्रिये .

सपनों में हर-पल साथ तेरा
जीवन तुम बिन अभिशाप बना ,
कुछ कह जाती,कुछ सुन जाती
मन को थोड़ा बहला जाती ,
मेरे गम को सहला जाती,
तुम बिन सूना संसार प्रिये.


तेरे संग बीता एक-एक पल
यादों में चलता जाता है ,
उम्र नहीं कोई उसकी ,
हर-पल मुझको बहलाता है,
मैं आज भी जिए जाता हूँ,
अंतस में विरह की आग लिए,
तुम मेरे मन की शीतलता
तुम मेरी प्राणाधार प्रिये.

सपनों में हर-पल साथ तेरा
हर सोच पे मेरे हावी तुम,
जाते-जाते कुछ कह जाते,
दिल को मेरे समझा जाते ,
तुम बिन रीता जीवन मेरा ,
तुम बिन सूना संसार प्रिये.


जब सामने तुम आ जाती हो
मन-प्राण हरा हो जाता है,
सावन की घटा छा जाती है,
बादल भी बरसने लगते हैं ,
हरियाली छाती जाती है ,
ऐसा है तेरा प्यार प्रिये.


तुमसे मिलने की सोच मात्र
मुझको रोमांचित कर जाती ,
जब तुम मुझको मिल जाती हो,
मन कहता है आभार प्रिये,
तुमसे ही है जीवन मेरा,
तुम्हीं मेरा श्रृंगार प्रिये.

शब्द तो जीवंत है

शब्द श्रृष्टि बीज है
शब्द-शब्द वृक्ष यहाँ,
शब्द-शब्द जीव है,
शब्द का न आदि है
शब्द का न अंत है ,
शब्द तो अनंत है,
शब्द तो जीवंत है.

शब्द ही है जिंदगी
शब्द यहाँ मौत है
शब्द शिशु सा यहाँ
रोज जन्म ले रहा,
पल रहा,बढ़ रहा
और युवा हो रहा.

शब्द से ही शब्द है,
शब्द से ही अर्थ भी,
शब्द अर्थ पा रहा ,
शब्द अर्थ खो रहा,
शब्द ही पुराण है,
शब्द ही कुरान भी.

शब्द से ही रीत यहाँ,
शब्द से ही प्रीत है ,
शब्द कहीं प्रेमराग,
शब्द मनमीत है ,
शब्द-शब्द है निडर ,
शब्द भय से भीत है.

शब्द कहीं धूप है,
शब्द कहीं छांव है,
शब्द यहाँ सांझ है,
शब्द है निशा यहाँ,
शब्द से ही चांदनी ,
शब्द ही चकोर है,
शब्द-शब्द चाँद यहाँ,
शब्द प्रेम-भोर है.

शब्द कहीं है काम,
कहीं ये विश्राम है
शब्द के भी पाँव है,
शब्द के हैं रास्ते
शब्द से ही मंजिलें ,
शब्द उनको पा रहे.

शब्द कहीं कृष्ण है,
शब्द कहीं राम है,
शब्द अयोध्या यहाँ ,
शब्द -गोकुल-धाम है,
शब्द सरयू तट यहाँ,
शब्द यमुन-धार है.
शब्द बह रहे यहाँ ,
शब्द-शब्द तीर है.

शब्द का चलन रुके,
जीवन चक्र सा रुके ,
शब्द को पुकार लो,
शब्द तो है प्रेमराग ,
शब्द-शब्द स्नेह है,
शब्द अनुराग है.

शब्द प्रखर सूर्य है,
शब्द-शब्द रश्मियाँ ,
शब्द धूप जेठ का ,
शब्द सावन की घटा.
आज भी ये सत्य है,
शब्द तो अनंत है,
शब्द का न आदि-अंत,
शब्द तो जीवंत है.

Tuesday, June 15, 2010

टेलेफोन का खंभा

टेलेफोन का खंभा हूँ मैं
चौपाल में अकेले बैठकर
हुक्का गुडगुडाते
दादाजी की तरह
आज सड़क पर खड़ा-खड़ा
शर्म से गड़ा-गड़ा
हसरत-भरी निगाहों से
देखता हूँ उन्हें
जो कल तक
मेरी एक झलक को
तरसते थे.

अजीब से द्वंद्व में फंसा मैं
आज सोच नहीं पा रहा हूँ
अपने अतीत पर इतराऊँ
या फिर अपने वर्तमान
आंसू बहाऊँ.

याद आता है
वो दिन
जब जेठ की दोपहरी में भी
लाइनमेन सीढ़ी लगाता था
और फिर उसपर चढ़कर
नए कनेक्शन लगाता था
और नीचे होती थी
हसरत भरी निगाहों वाले
तमाशबीनों भीड़
तो कैसे मेरा
और
लाइनमेन का सर
गर्व से ऊंचा हो जाता था,

एक समय था
जब मैं
स्वयं पर बहुत इतराया करता था
लाइनमेन के अलावा
कोई और मेरे ऊपर चढ़े
यह बर्दाश्त नहीं कर पाता था.
जब लगता था
नया कनेक्शन
किसी के घर
हाथ जोड़े खड़ा होता था वह
मेरे नीचे ,
कर देते थे उसपर मेहरबानी
लाइनमेन को
उसके घर की घंटी
बजाने देते थे .

कभी हुआ करता था
हमारे सर पर
सफ़ेद ताज
चीनी मिटटी का
पर,हाय रे समय का फेर
हमें बना दिया
बिना डाली का
सूखा हुआ
ठूँठा पेड़.

मैं और मेरा कंप्यूटर

कंप्यूटर के आने के पहले तक
मैं याद रखता था
सबकुछ
यादों के सहारे
ढूंढ़ लेता था मनचाहा .

पर
आज मैं अक्सर भूल जाता हूँ
कभी अपना अतीत
तो कभी अपना वर्तमान,
और कभी ढूंढता हूँ
भविष्य के तार .

जब ढेर सारे "क्यों" में
उलझ कर रह जाता हूँ ,
उपहास का विषय बन जाता हूँ
तब याद आता है कंप्यूटर
जिसमें स्टोर कर दिया है
जानकारियों का भंडार
ताकि समय-समय पर
उसकी सहायता से
कर सकूँ
अपनी भूल सुधार

Thursday, June 10, 2010

महानगर का एक और चेहरा

यहाँ लोग
मरे हुए कुत्तों को
फेंक जाते हैं
खुली सड़क पर
अँधेरी रात में
दिन के उजाले में
सड़ने और दमघोंटू बदबू
फ़ैलाने के लिए .
फैंक कर
लौट जाते हैं
अपने घर
अँधेरे में
अपना मुंह छिपाए
अपनी सड़ी-गली सोच के साथ
जीने के लिए
लेकिन
करें भी
तो क्या करें.
यहाँ का तो दर्शन है,
"जो हो रहा है,होने दो,
जैसा चल रहा है,चलने दो,
कोई मरता है,मरने दो"
यहाँ की परंपरा है
"देखो,सुनो और बढ़ जाओ,
रुको मत,
बढ़ते रहो,चलते रहो ."
अंतस में
कोई हलचल नहीं,
कोई उबाल नही.
न कोई प्रतिक्रिया,
न ही कोई पछतावा.

कुत्ते की लाश
तो सड़-गल जाएगी ,
दिन,हफ्ते,महीनों में .
पर
सडती रहेगी
हमारे भीतर
एक लाश
एक पीढ़ी से
दूसरी पीढ़ी तक,
होता रहेगा
इसका अनवरत विस्तार.

Wednesday, June 9, 2010

रिक्शावाला-एडिटेड

यह शहर
कोलकाता है
जहाँ
चीथड़ों में लिपटा
ढांचे सा खड़ा
एक मरियल आदमी
रोटी के लिए
तांगे की तरह
रिक्शा चलाता है
घोड़ा बनकर .

अपना खून जलाता है,
पसीना बहता है,
उसकी नज़रों के
सामने होता है
उसका गंतव्य,
नज़रों के पीछे होता है
मिलनेवाला "भाड़ा"
जिसके लिए
वह दौड़ता जाता है,
हाँफता जाता है ,
हाँफता जाता है ,
दौड़ता जाता है
लेकिन रुकता नहीं
बस दौड़ता जाता है:
एक मील,दो मील ,दस मील......
मीलों का सफ़र
रोज तय कर जाता है
दो जून के निवाले के लिए.

कमाकर कर
जब घर आता है
वह बिलकुल बेदम
नजर आता है,
आते ही
जमीन पर
लेट जाता है
लोटे में पानी लिए
उसकी पत्नी ,
बेबस सी देखती है
कभी पति का खोखला बदन,
कभी उसकी खाली जेब
कभी चूल्हे को
जिसमें नहीं है आग ,
पेट की आग बुझेगी कैसे?
कातर नज़रों से
बच्चे भी तकते है
फर्श पर पड़े बाप को
जो उनकी नज़रों के सामने
लुढ़का पड़ा है
बगल में लुढ़की पड़ी है
दारू की बोतल-दोनों बिलकुल खाली.




(नयी पंक्तियाँ नए रूप में.)
कमाकर कर
जब घर आता है
वह बिलकुल बेदम
नजर आता है,
आते ही
जमीं पर लोट जाता है.
पत्नी हाथ में पानी लिए
जेब में घुसी
दारू की बोतल देख
धम्म से बैठ जाती है
अपना सिर पकड़ कर .
जेब में टटोलती है पैसे
और फिर
खाली जेब देख
बच्चों के साथ
कभी खाली चूल्हे को देखती है
और कभी खाली बोतल को.

मेरी दिल्ली

अपनी सारी विविधताओं,
अपनी सारी विषमताओं
अपनी बदमिजाजी ,
अपनी सारी बदगुमानी ,
अपनी झोपड़पट्टीयों,
अट्टालिकाओं के साथ
दिल्ली
कब मेरे दिल में
समां गई
पता ही नहीं चला.

इसके बहते नाले,
इसकी सूखी नदियाँ,
इसके भीड़-भरे चौराहे
कब मन को भा गए,
पता ही नहीं चला.

यह भी पता नहीं चला
कब वह मुझमें
और मैं
उसमें समा गया .

Wednesday, June 2, 2010

रिक्शावाला

यह शहर
कोलकाता है
जहाँ
चीथड़ों में लिपटा
ढांचे सा खड़ा
एक मरियल आदमी
रोटी के लिए
तांगे की तरह
रिक्शा चलाता है
घोड़ा बनकर .

अपना खून जलाता है,
पसीना बहता है,
उसकी नज़रों के
सामने होता है
उसका गंतव्य,
नज़रों के पीछे होता है
मिलनेवाला "भाड़ा"
जिसके लिए
वह दौड़ता जाता है,
हाँफता जाता है ,
हाँफता जाता है ,
दौड़ता जाता है
लेकिन रुकता नहीं
बस दौड़ता जाता है:
एक मील,दो मील ,दस मील......
मीलों का सफ़र
रोज तय कर जाता है
दो जून के निवाले के लिए.

कमाकर कर
जब घर आता है
वह बिलकुल बेदम
नजर आता है,
आते ही
जमीन पर लेट जाता है
एक लोटा पानी की आस लिए
फर्श पर ही सो जाता है,
बगल में लुढ़की होती है
दारू की बोतल-दोनों बिलकुल खाली

Monday, May 31, 2010

रिश्तों का रेगिस्तान

गाँव,गाँव,
शहर,शहर
धीरे-धीरे
सूखता जा रहा है
भू-जल की तरह
आँखों का पानी,
रिश्तों के रेगिस्तान का
बढ़ता ही जा रहा है आकार ,
हो रहा है शनै-शनै
इसका असीमित विस्तार.

झरने खो रहे हैं
अपना झर-झर स्वर,
नदियों की कम हो रही है
रवानी,
क्योंकि कम हो रहा है
उसका भी पानी.

हर जगह सन्नाटा है पसरा,
हर जगह की है यही कहानी.
चिलचिलाती धूप में
बबूल के पत्तों के नीचे टिकी छाँव से
ठंढी नहीं होती
थार के तपते रेत की तपिश.

जब चलते हैं
लू के थपेड़े यहाँ
धरती हो जाती है गर्म तवा
जिसपर टिकता नहीं पानी.

बस हर तरफ होता है
पानी का भ्रम,
मृगमारीचिका से
नहीं बुझती प्यास,
प्यास से सूखता है गला
सबका.

पटा पड़ा है सारा रेगिस्तान
संबंधों की लाशों से
जिसपर मडरातें हैं
स्वार्थी चील-कौवे
नोच-नोच कर
उन्हें खा जाने को.

कहीं-कहीं दिखती है
कैनवास पर पड़ी
हरे रंग के
धब्बे सी
एक छोटी हरियाली
काँटों-भरी
कैक्टस की.

भेड़ों के झुण्ड की तरह
बादलों के ढेर
मडरातें है नीले आकाश में,
कुछ देर धमा-चौकड़ी मचाते हैं,
फिर बिना बरसे
वापस लौट जाते हैं
बिना बरसे
समंदर की ओर.

अब तो
आँखों में
उमड़ आने दो समंदर,
मन में उमड़ते बादलों को
बरस जाने दो,
बना कर
इस मरुस्थल में
एक छोटी सी नहर
बह जाने दो
आँसुओं संग अपनेपन की धार ,
इंतजार करो सूखे पेड़ों में
रिश्तों के कोंपलों के
निकल आने का.

धीरे-धीरे
बढ़ेगी हरियाली
पत्ता-पत्ता,डाली-डाली,
धीरे-धीरे होगा इनका विस्तार,
समय के साथ
सिमटता जायेगा
रिश्तों का रेगिस्तान.

Wednesday, May 26, 2010

तेरी यादों से.....

तेरी यादों से
जी तो बहल जाता है
जिन्दगी नहीं कटती ,
नहीं कटते
मेरे दिन और रात
सपनों में खो जाने से.

यूं तो
सूरज की सोचकर
उजाला सा
मन में होता है,
पर
बिना सूरज के
उजाला नहीं होता है
जीवन में .

तस्वीरों में
देख-देख तुम्हें
बहुत बहला लिया
दिल को,
सामने आओगी
तो मेरा वक्त
गुजर जायेगा .

कह नहीं सकता
चांदनी रात से
क्या मिलता है
मुझे
तेरे बिन,
तुम जो
आ जाती हो
तो
चाँद भी
पूरनम हो जाता है.

न जाने क्यूं ......

पत्थर हूँ मैं
रास्ते का
पास से गुजरते है
कई लोग
कोई एक ठोकर लगा जाता है,
कोई श्रद्धा से उठा
माथे से लगाता है
शिवाले का शिवलिंग
बना जाता है ,
न जाने क्यूं .......

पेड़ हूँ मैं
हरा-भरा
जिसपर
कुछ तो जल चढाते हैं,
शीश नवाते हैं,
कुछ राह चलते
डालियों को तोड़ जाते हैं,
पत्तियां नोच जाते हैं
न जाने क्यों ........

फूल हूँ मैं
बगिया का
बागबां पालता है
जिसे
जतन से,
स्नेह-भरे हाथों से
डाली से अलग कर
गुलदस्ते में सजाता है,
किसी के घर की
शोभा बना देता है.
पर, कुछ लोग
बड़ी बेरहमी से
तोड़ लेते हैं ,
पंखुड़ियों को मसलकर
फेंक देते हैं ,
न जाने क्यों ........

तितली हूँ मैं
अपने रंग-बिरंगे
पंखों पर इठलाती,इतराती
फूलों पर मंडराती हूँ मैं,
कोई तो
स्नेह-भरे हाथों से
सहला जाता है ,
कोई
मेरे पैरों में सूतली बांध
मेरी उडान रोक जाता है ,
न जाने क्यों ........

पंछी हूँ मैं
उन्मुक्त उडान भरता हूँ
खुले आकाश में,
कभी-कभी थककर
नीचे गिर जाता हूँ ,
तब
कुछ तो पानी पिलाते हैं
कुछ यूं ही तड़पता
छोड़ जाते हैं
न जाने क्यों ........

Tuesday, May 25, 2010

मां हो तुम

माँ हो तुम.
कौशल्या हो या कैकेयी
यशोदा हो या वैदेही ,
प्यार-भरा उपहार हो तुम
सबका जीवन-आधार हो तुम,
मां हो तुम.

तेरे आँचल की छाँव तले
राम पले,घनश्याम पले ,
लक्ष्मण भी पले,बलराम पले,
सपनों से भरा संसार हो तुम,
मां हो तुम.

भौतिकता को स्वीकार किया
जीवन को हमपर वार दिया,
दे-देकर अपना स्नेह लेप,
पैरों पर हमको खड़ा किया,
प्रकृति का अद्भुत सार हो तुम,
मां हो तुम.

गा-गाकर कर लोरी रातों में
परियों के देश तुम ले जाती,
जब नींद हमें भी आ जाती,
मीठे सपनों में खो जाती तुम,
मेरी कल्पना का आकार हो तुम
मां हो तुम.

बचपन तो झूला करता है,
तेरी इन कोमल बाँहों में,
तू राग मेरा, तू रंग मेरा,
तुमसे ही है सर्वांग मेरा,
जीवन की बहती धार हो तुम,
मां हो तुम..

तुमसे ही सारे रिश्ते हैं
तुमसे ही सारे नाते हैं
बाकि तो बनते रहते हैं,
बाकि तो आते-जाते है,
सारे रिश्ते की नाव हो तुम,
मां हो तुम.

तू ही पूजा,तू ही भक्ति
तू ही आदि शक्ति है,मां
तेरे अंतर्मन के जैसा
संसार न कोई दूजा है,
प्रकृति का सुंदर उपहार हो तुम,
मां हो तुम. .

हम सब में एकाकार हो तुम,
ईश्वर का एक अवतार हो तुम,
छोटे सहज साकार का,
निराकार विस्तार हो तुम ,
मां हो तुम.

नजरिया

शब्द
कभी सूरज
हुआ करता था
मेरे मन-आँगन का
चमकता हुआ,
आज तो
वह एक गोली है
लोहे की जंग लगी .

शब्द
कभी चाँद सा
चेहरा
हुआ करता था
मेरे प्यार का
सलोना सा ,
अब तो
सूखी रोटी सा
नजर आता है
दागों भरा.

शब्द
कभी
सितारों सा
जगमगाया करता था
उसके आँचल में
जुगनुओं की तरह
आज तो
नदी की
चमकती रेत
नजर आता है .

Thursday, May 20, 2010

अमानुष

मैं तो ईंट था
जब नींव में पड़ा
सक्रिय जीवन से
ले लिया सन्यास
निष्क्रिय रहकर
एक सक्रिय आधार बना .

जीता रहा
अपनों की याद लिए,
अपनों का साथ लिए ,
एक गुमनाम जिंदगी
आजीवन
औरों के लिए .

लेकिन
तुम तो मानुष थे,
तुम्हें तो बड़ा बनना था,
भला बनना था,
औरों के लिए जीना,
औरों के लिए मरना था.
किसी का सहारा बनना था .

फिर तुमने क्यों
अलग कर लिया
स्वयं को
अपनों की भीड़ से ,
जीते रहे
अपने-आप से अलग
एक एकाकी जीवन
अपने लिए
और
हो गए अमानुष

Thursday, May 13, 2010

नीड़

उड़कर आये थे
बहुत दूर
भरे मन से
अपनों को पीछे छोड़
एक नई दुनियां बसाने
तम्हारे लिए .

तिनका-तिनका जोड़
भीड़ से अलग
बनाया था
एक नीड़:
भीतर कोमल,बाहर कठोर.
डाला था उसमें
तुम सबों का बचपन,
चुगकर लाते थे दाने,
चुगाते थे तुम्हें प्यार से
स्वयं रहकर भी खाली पेट
कई-कई बार,
सींचते थे
तुम सबका तन-मन
दुलार से .

अपने डैनों पर
ओढ़ लेते थे सूरज,
झेल लेते थे
बारिस का झमकता पानी
तुम्हें बचाने के लिए
ताकि
तुम बनो
अपना सबल कल,
हमारा सहारा बनों.

यह हमारा सपना था
उम्मीदों भरा.
जब तुम जवान हुए
बन गए
नदी की मचलती धार
और
हम सराहते रहे
तुम्हारा अविरल प्रवाह .

लेकिन
तुमने
हमदोनों को
बना डाला "दो" तीर
जो देखते रहे
एक-दूसरे को
हसरत भरी निगाहों से
मिलन की धूमिल आस लिए.
तुमने बाँट दिया हमें ,
हमारा साझा अस्तित्व ,
बनाकर रख दिया हमें
यादों का ढेर.

बेहतर होता
तुम हमें "दो" न करते,
छोड़ देते हमें
हमारे हाल पर
अपने सपनों के साथ .

Wednesday, May 12, 2010

सांझ

जब
वातावरण में
हो उठता गुंजायमान
शिवालय के
घड़ीघंटे का स्वर
दिन के आखरी प्रहर
समझ लेती मैं की सांझ उतर आई है
मेरे आँगन में.

जब
सुनाई देती
जंगल से चर कर
घर लौटती गायों के
रंभाने की आवाज
और
दिखाई देता
उनके खुरों की चोट से
उठता धूल का गुबार
समझ लेती मैं की सांझ उतर आई है
मेरे आँगन में.

जब
पर्वतों के पेड़ों से
उतरने लगती
सुरमई धूप
और
हरियाली
खोने लगती
अपना रंग
समझ लेती मैं की सांझ उतर आई है
मेरे आँगन में.

जब
पेड़ों पर उतर आते
खगवृन्द
और
उनका कलरव
हो जाता तेज
समझ लेती मैं की सांझ उतर आई है
मेरे आँगन में.

जब
शनै-शनै
घटने लगती
सूरज की प्रकाश परिधि
और
पश्चिम में आकाश
हो जाता
सिन्दूरी लाल,
धुंधला हो जाता
आस-पास
समझ लेती मैं की सांझ उतर आई है
मेरे आँगन में.

जब
गली में खेलते समय
कानों में पड़ती
बाबूजी की स्नेहभरी पुकार
और
रसोईघर से आने लगती
बर्तनों के खड़कने की आवाज
समझ लेती मैं की सांझ उतर आई है
मेरे आँगन में.

जब
आँगन के तुलसी-चौरे में
दीप जला
तुलसी को साँझ दिखाती माँ
और
श्रद्धा से
दीप्त हो उठता
उनका मुखमंडल
समझ लेती मैं की सांझ उतर आई है
मेरे आँगन में.

Tuesday, May 11, 2010

पत्रकारिता के बदलते आयाम

दूरदर्शन पर
देख रहा था
समाचार:
"आइसलैंड में
ज्वालामुखी फटा ,
यूरोप के आसमान पंर
राख के घने बादल छाये,
यूरोप को आने-जाने वाली
सभी उडाने रद्द "
सीधा-सीधा
फीका-फीका सा .
दिल किया
कोई और चैनल
खंगाळू .
खोजते-खोजते
अचानक
पहुँच गया
एक नामी-गिरामी
खबरिया चैनल पर
जहां महीने भर पहले
२४ घंटे तक
दिखाई गयी थी
"रावण की कब्र"
वहीँ आ रहा था
आज
एक और समाचार:
आज की ताजा खबर
"बर्फ में लगी है आग ,
आग लगी है बर्फ में .
सारा यूरोप जलनेवाला है.
कैसे जलेगा यूरोप,
क्यों जलेगा यूरोप?
ये हम बतायेंगे आपको
लेकिन
एक छोटे से ब्रेक के बाद.
आईये अब हम आपको
सीधे लिये चलते है
अपने संवाददाता
"निरालाजी" के पास
जो घटनास्थळ के काफी करीब है .
हां,तो निराला जी, बताइये,
क्या आग के कारण का पता चला?,
आशा जी,
यहां ज्वालामुखी फटा है .
यह बर्फ कि चादर से ढका
आईसलैंड का इलाका है ,
यही फटा है ज्वालामुखी ,
इससे निकलते गर्द का गुबार
जिससे पूरे यूरोप का आसमान
भर गया है,
आप अपने टीवी स्क्रीन पर भी
देख सकते है .
एक और ब्रेक का समय हो चला है
हम शीघ्र ही लौटेंगे
आप अपने टीवी स्क्रीन पर
बने रहियेगा,
कंही जाइयेगा नही.
आठ बजे शुरू हुआ था
समाचार
अब रात के बारह बजनेवाले हैं.
मैं अभी भी
टीवी स्क्रीन पर नजरें गड़ाए
सोच रहा था
कुछ तो नया आएगा .
लेकिन
मेरे उम्मीद के सूरज पर
पूर्णतः बाजारू,
समाचारी ज्वालामुखी से
निकलती राख
छा गयी थी
खबरो के आसमान पंर
समाचार का सूरज
निकलता कैसे ?
निकलता भी तो आखिर कैसे ?

Monday, May 10, 2010

एक सिपाही का निवेदन

साहब जी
सेंसिटिव जगहों पर
कैमरा मत
लगवाना,
अगर भूल से
लगवा भी दिया
सुरक्षा कारणों
का हवाला देकर
तो ऐसे संवेदनशील
जगहों पर
हमारी ड्यूटी
मत लगाना.
कैमरा लगा नहीं की
क्रिमिनलों की
शामत आ जाएगी.
सारी चोरियां ,
हमारी सीनाजोरियां
पकड़ी जाएँगी ,
सारे गुंडे
पकड़े जायेंगे ,
हमारा धंधा
चौपट हो जायेगा ,
हम बर्बाद हो जायेंगे ,
हमारे बच्चे
सड़कों पर आ जायेंगे.
साहब,
एक बार फिर सोच लो
हफ्ते की मार से
आप भी
उबर नहीं पाओगे .
इसलिए कहता हूँ
जैसे चल रहा है
चलने दो ,
अपने पेट पर लात
और पैरों पर
कुल्हाड़ी मत मारो
भूलकर भी
कैमरा मत लगवाओ ,
ये मेरा निवेदन है .

Thursday, May 6, 2010

दिल्ली

आते-जाते
रोज
मैं देखा करता था
एक नन्ही सी बच्ची को
अपने झोपड़े के आगे
खेलते हुए
गली के बच्चों के साथ.
प्लाट में बहते
नालों की तरह
बहती रहती थी
उसकी नाक,
सर के बाल
थे बेहद उलझे-उलझे से ,
उनींदी आखों में
भरी होती थी कीच
और
मेमने की तरह
लगा रही होती थी
वह दौड़
आस-पास के खेतों में,
खलिहानों में,
कच्ची-पक्की,
धूलभरी सडकों पर
बिना किसी चिंता,
बिना किसी भय.

बहुत दिनों बाद
आज जब मैं
एकबार फिर
गुजरा उधर से
तो
झोपड़े की जगह
एक भव्य मकान
खड़ा पाया.
हर तरफ
पक्की सड़कें,
पक्की नालियाँ,
बिजली के खम्भे
और
घर के बाहर
एक बेहद खूबसूरत
युवती को खड़ा पाया .
उसे देखकर
मैं सोच में पड़ गया ......
वह बच्ची कहाँ है?
कहाँ है वह झोपड़ा ?
तभी एक सुरीली आवाज से
मेरी तन्द्रा टूटी:
"मुझे पहचाना नहीं,अंकल,
मैं वही झोपड़ेवाली दिल्ली"

Wednesday, May 5, 2010

प्रदूषण (बचपन के नाम )

तन भी दूषित,मन भी दूषित
दूषित ये जग सारा है

भोजन-पानी हवा भी दूषित
दूषित स्वास्थ्य हमारा है

किया-धरा यह नहीं और का
सारा दोष हमारा है

अगर आज भी हम ना संभले
समय हाथ से जाएगा
हो जायेगा नष्ट यहाँ सब
कुछ भी ना बच पायेगा

आओ मिल संकल्प करें अब
कचरा नहीं फैलायेंगे
प्रदूषण दूर भगायेंगे
स्वस्थ समाज बनायेंगे

कवि

मछुआरा
बन
बुनता हूँ जाल
पूरी तन्मयता से
शब्दों के
मजबूत धागों से
ताकि जा सकूँ
अपनी छोटी सी नाव ले
गहरे समुद्र में
मुंह अँधेरे
सुबह-सबेरे
और
पकड़ सकूँ
स्वतंत्र विचरण करती
ढेर सारी
मछलियाँ ,
देख सकूँ
जाल में
अपने
उनकी तड़प,
या फिर
बन जाऊं
बागबां
बागों से
चुनूं फूल
गूंथ-गूंथ कर
बनाऊं
एक माला
अदृश्य खुशबुओं
से भरी
और
जान लूं
काव्य सृजन का
राज
और
सहेज कर रख लूं
उन्हें
अपने मन-आँगन में.

आनंद की अनुभूति

जब
हम मिले
पहली बार
संबंधों की नीवं पड़ी ,
रोपा गया
प्रेम-बीज
आँगन में
और
होने लगी
आनंद की बरसात.

समय
आगे बढ़ा
बीज
पौधा बना ,
बढ़ता गया,बढ़ता गया
और
एकदिन
बन बैठा
हरा-भरा
बटवृक्ष
प्रेम का
फिर
बह चली
आनंद-धार
सागर की ओर
क्षितिज के पार
जहाँ मिलते हैं
धरती और आकाश
और
पा गयी
एक अंतहीन विस्तार
जीवन सा .

गाँव की सड़क

बचपन में
जब पिताजी की
उँगलियाँ पकड़े
जाता था अपने गावं
तो देखता था
टूटी सी खाट पर
लेटे हुए
बुढिया दादी की तरह
अपनी
जानी-पहचानी
सड़क को
पूरी तरह जीर्ण-शीर्ण
कृशकाय ,
कातर निगाहों से
निहारते
अपने शरीर में पड़े
अनगिन
छालों को
जो समय ने
दिए थे उसे ।

आज भी मैं
अपने बच्चों की बाहें थामे
जाता हूँ
अपने गावं
उसी सड़क पर चलकर ।
आज भी वह
वैसे ही पड़ी है
छालों से बने
अपने घावों को
सहलाती

और
कर रही है
इन्तजार
किसी के आने का
जो
उसकी जवानी
भले ही न लौटाए
पर उसके घावों पर
मरहम तो लगा जाये,
उसकी साँसों को
कुछ उम्र तो दे जाए ।

Tuesday, May 4, 2010

सबेरा होनेवाला है

जब
मस्जिदों में होती
पहली अजान
समझ लेती मैं कि सबेरा होनेवाला है ।

जब वातावरण में
मंदिर के घंटे का स्वर
होता गुंजायमान
समझ लेती मैं कि सबेरा होनेवाला है ।

जब सुनाई देती
कोयल कि कूक
पक्षियों के कलरव के बीच
समझ लेती मैं कि सबेरा होनेवाला है ।

जब कानों तक आती
मां की
ममता-भरी आवाज
समझ लेती मैं कि सबेरा होनेवाला है ।

कुछ पल बाद जब गालों पर होता
पापा के स्नेहिल हाथों का स्पर्श
समझ लेती मैं कि सबेरा होनेवाला है ।

जब रसोई से आने लगती
बर्तनों के खड़कने की आवाज
समझ लेती मैं कि सबेरा होनेवाला है ।

जब पूरब हो जाता सिन्दूरी लाल
और धरती पर फैलने लगता प्रकाश
समझ लेती मैं कि सबेरा होनेवाला है ।

Friday, April 30, 2010

वहम

नवजात
शिशु सा
खेला
तुम्हारी गोद में ,
तुम्हारी ऊँगली पकड़
पला-बढ़ा।
देखते ही देखते
तुम्हारी नजरों के सामने
हो गया बड़ा ।
पर, रुका नहीं
हमारी तरह ,
बढ़ता ही रहा,
बढ़ता ही रहा ,
और
विकराल हो गया ।
अब यह
हर रोज
डराएगा तुम्हें ,
तुम्हारे रातों की
नींद उड़ाएगा ,
छीन लेगा
दिन का चैन
क्योंकि
यह वहम है
तुमने ही पाल-पोस कर
बड़ा किया है
जिसे ।






Thursday, April 29, 2010

ठहरा हुआ बचपन

गाँव में
आज भी निकलता है
चाँद ,
अँधेरी रात
जगमगाती है
जग-मग करते
जुगनुओं ,
झील-मिल
सितारों से ,
पूरब की ओट से
ांकता सूरज भी है
और साथ में है
ठहरा हुआ
हमारा बचपन ।

सुबह-सबेरे
दादाजी की ऊँगली पकड़
कंधे पे बस्ता ,
हाथ में चटाई लिए
स्कूल जाता
बचपन ।

मास्टर जी से
आँख बचाकर
ईमली के पेड़ से
ईमली चुराता
और फिर
मास्टर जी से
मार खाता ,
उनकी छड़ी छुपाता
बचपन ।

खेतों की मेड़ों पर
दौड़ लगाता ,
हरियाली में
घुल-मिल जाता ,
तितलियों के पीछे भागता ,
कबूतरों को दाना चुगाता,
नदी की रेत पर
घरौंदा बनाता बचपन

मेले में जाने की
जिद करता ,
गुब्बारे के लिए मचलता ,
सपनों से लबरेज
सच के काफी करीब था
बचपन ।

तालाब के किनारे
खड़े-खड़े
एक छोर से
दूसरे छोर तक
पानी पर
पत्थर के टुकड़े
तिराता बचपन।

ये बचपन ही तो था
जो किसी की गोद में ,
किसी के कंधे पर
चढ़ा होता था ,
पापा की मार से
बचने के लिए
मां के आँचल में
छुपा रहता था ।

ये बचपन ही तो है
जो आज भी मन को
गुदगुदाता है ,
अतीत में ले जाकर
यादों के पालने में
झुलाता है ।

आज हम बड़े हो गए हैं,
पर आज भी
पूरी शिद्दत से
ठहरा हुआ है बचपन
हमारी यादों में ।