Monday, August 10, 2020

A Letter To Papa

 

      पापा


आपका व्‍यक्तित्‍व मुझ पर हमेशा हावि रहा,

जिस तरह आपने मार्क्‍स के बारे में विस्‍तार से बताया,

जिस तरह आपने मेरे अनगिनत सपनों को पहचान दी,

जिस तरह आपने समय चक्र को साधा

और इतिहास के उतार-चढ़ाव से रूबरू करवाया,

जिस तरह आपने नित्‍से को नाजीवाद से जोड़ा,

जिस तरह सापेक्षवाद को अपने आसान बनाया,

और फ्रायड पर चढ़े मुल्‍लमें को हटाया,

जिस तरह गैरीबाल्‍डी और ग्‍यूवेरा की बाते करते हुए ,

आपके चेहरे की चमक बढ़ जाती थी

उससे मैं अभिभूत था।

गांधी का महात्‍मा होना भी 

आपसे ही जाना, पापा

आपने ही मेरे सपनों को पंख दिए

हौसला दिया

असीम आकाश में उड़ने का,


मैं धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था

फिर भी 

मैं हमेशा आपसे

आपकी चुप्‍पी से थोड़ा भयाक्रांत रहा

जो घर के कोने-कोने में घर किए बैठी थी।

आपके दिए असंभव से लक्ष्‍य को पाने में

असफल मैं

आपके अभिभावकीय कोप

आपके कड़े तेवर से परेशान

कई बार

सामान्‍य शिष्‍टाचार की सीमाएं

लांघता रहा।


मेरे प्रति बढ़ती आपकी निराशा,

आपकी आंखों की उदासी को झेलना

जब असह्य हो जाता,

मेरा मन

पलभर को

विद्रोही हो जाता था।

 

आपकी पुरानी-जर्जर कार देखकर

मुझे आप पर बहुत गुस्‍सा आता था

पर आपकी विवशता भी मैं समझने लगा था। 

जब मैं 10वीं में था

तब घर में ब्‍लैक एंड व्‍हाइट टी.वी. आया

बदलाव की बयार लिए

 

आपके अनियंत्रित गुस्‍से से

मुझे चिढ़ थी।

याद है आपको

जब आपने मुझे थप्‍पड़ मारा

और मैंने आपका हाथ पकड लिया था

आप गुस्‍से में चुपचाप बाहर चले गए थे।

  

मेरे जीवन में वो पल भी आए

जब मुझे आपकी बेरहम इमानदारी

आपके वि‍वेक पर गुस्‍सा आता था

जीवन और शब्‍दों के प्रति

आपके उदार विचारों के सामने

मैं हमेशा बौना नजर आया

आपमें सभी नैसर्गिक गुण थे,

अथाह मगर शांत सागर प्‍यार सा भी था


आपका जानबुझकर शतरंज में हार जाना

वड्सवर्थ के बारे में मुझे विस्‍तार से बताना

आपकी हंसी, आपका वाक् चातुर्य

मेरे अनगढ़ लेखन पर 

आपका गर्व से भर जाना

मेरे बालों में उंगलियां फिराना

तेज बारिश और हवाओं में

मुझे खींचकर घर से बाहर ले जाना

सर्द रातों में मेरे साथ बैठकर

देर तक बातें करना

आपके सानिध्‍य की गर्माहट से भर देता था।


बेख्‍याली में गुनगुनाती मां

और आपका मोहित होकर उसको एकटक निहारना,

उनकी आंखों पर छाई लटों को उँगलियों से झटककर हटाना

समय से परे था, पापा।

मैं आपके उस विश्‍वास पर फिदा था

जिसमें मेरे सपनों को 

आसमान मिलने का भरोसा था,

  

काश! मैं समझ पाता कि जल्‍द ही यह सब 

बिखर जाने वाला है

ट्रेन धीरे-धीरे आगे बढ़ रही ही थी

और आप भीड़ का हिस्‍सा बनकर

भीड़ में ही खो गए

खोते चले गए।

पता होता तो मैंने

उन पलों को कैद कर लिया होता, पापा।

 

दो दिन बाद ही मुझे

आपका समाचार मिला मिला

सामने जो पाया था वो आप नहीं थे

शून्‍य को निहारता निस्‍तेज शरीर मात्र था। 

आपका अंतिम संस्‍कार कर

मैं लौट आया अपनी दुनिया में

इन पन्‍द्रह वर्षों में शायद ही कभी मैं रोयाI


आपकी अलमारियां साफ करते समय

एक दिन कविताओं से भरी आपकी डायरी मिली

समय के प्रभाव से जर्द होते,

बिखरते,

एक-एक पन्‍ने पर

आपकी मुस्‍कुराहट

आपकी उदासी की छाया

स्‍याही के उतरते रंगों में

आज भी पैबस्‍त हैं, पापा।

यह वसीयतनामा था

आपके जीवन

और जीने के सलीके का.


इन पन्‍द्रह सालों में

मैंने कुछ भी नहीं लिखा

कुछ भी तो नहीं।

अपने आपको संभालने में,

अपने दरम्‍यानेपन से उबरने में

मुझे इतने साल लग गए। 


Rajiv:10/08/2020

Wednesday, September 18, 2019

ON THE PATH OF GAIN

ON THE PATH OF GAIN
Dear Angel, 
I’m sorry for the earth & sky 
You shared alone. 
I’m sorry for the air 
You breathed alone. 
I’m sorry for the flowers you touched, 
And the games you played alone. 
I earned a lot, 
Achieved the goals  
Beyond my dreams, 
Touched the horizons of success, 
But all without you , my love. 
In a trance of trampling success 
I forgot you’re a part of me, 
I forgot you’re in me. 
Not only that, 
I forgot the days 
When I told you to brush your teeth, 
Helped you to get dressed, 
 And go to school. 
When we went to park 
You holding my finger & walked 
The green patches of our grassy lawn. 
I’m very sorry to say 
I have seen you grow 
All alone in my presence 
With your west-ward emotions 
Full of breezy lull. 
I missed your first day at school, 
First football match, 
Your Halloween Parade 
And many more. 
Now they are countless to write, 
Countless to read. 
Dear doll, 
In your suffering 
I too have suffered 
By allowing my priorities over my relationship 
All at the cost of globetrotting job. 
This I could know 
 A year ago 
When I asked you to remember 
What you missed 
When I was away. 
You asked me to wait, 
Went to your room 
 And came with a piece of paper, 
And handed me a list of 22 events 
Surely important one for you, 
Important one for me. 
 List of events & activities you compiled . 
Both you & I missed 
Due to my so called commitments. 
Surely it was a wake-up call! 
Excuses apart 
Each missing events 
Weighed heavy upon me, 
My tours , travels & meets. 
 But I was sure enough now 
By doing so I have missed 
A thread of life & love. 
It deeply hurts to know 
I allowed my relations 
 To ride on unruly waves 
Of misleading commitments. 
 Work may be worship 
But not at the cost of you. 
Now I’m with you 
Binding knot to knot 
And kissing every smile.
 (Rajiv kumar/29/09/2014)

Friday, September 23, 2011

अपनेपन की छाया में

दर्द के काले-घने
बादलों को
अपने सीने में
उमड़ने-घुमड़ने दो,
जमकर बरस लेने दो
मन के सूखे,
सूने आँगन में,
तोड़कर पलकों के बांध
निकल आने दो
आंसुओं की बाढ़,
बहा ले जाने दो
अपने भीतर का
सारा संताप.

मुसीबतों का अँधेरा
आएगा,छाएगा
बार-बार,बार-बार,
लगातार
पर,ठहर नहीं पायेगा,
उसका आशियाना बने
उससे पहले
जला लेना तुम
उम्मीदों के दीप
अपने भीतर,
घर के बाहर
नील गगन में भी
निकल आएगा
चमकता हुआ
दूधिया चाँद,

सूरज के उगने का
करना इन्तजार,
उसके उजाले से
जगमग हो उठेगा
सारा संसार.

अगली सुबह
अपने आँगन में बने
तुलसी के चौरे में
लगा लेना तुम
एक नन्हा सा पौधा
या, फिर लगा लेना
एक नाजुक सी बेल
डालकर
ढीली मिटटी में
एक नन्हा सा बीज,
सींचना उसे प्रतिदिन,
अपने स्नेह-जल से
रखना उसे सिक्त.

देखना उसे निरंतर
बढ़ते हुए,
धीरे-धीरे उगते हुए
पत्ती-पत्ती,डाली-डाली ,
फूलों से सजते,
फलों से लदते हुए
पल-पल,हर-पल
सुबह-दोपहर-शाम.

अपनी आँखों में बसाकर
अपनी यादों में बसा लेना,
पौध से पेड़ तक का सफ़र,
बीज से बेल तक का सफ़र
हरियाली से भर जायेगा
तेरे घर का आँगन,
खुशियों का रैन बसेरा होगा
कोना-कोना तेरा मन,
परायों की भीड़ में
मिल जाएँगे तुम्हें
ढ़ेरों अपने.
सपनों से भर जायेगा
तेरा जीवन.

दुःख की परछाई
नहीं फटकेगी तेरे पास
अपनेपन की छाया में
चैन से कट जायेगा
तेरा वर्तमान,
तेरा आनेवाला कल भी
संवर जायेगा

(छोटी बहन के लिए सस्नेह)

Thursday, September 15, 2011

"बाँध के फाटक उठाओ"

आज
प्रकृति से कर घात
पहाड़ों के हृदय को
दे भारी आघात
बांधकर नदियों को
ऊंची घाटियों में
ढ़ेरों बाँध से
रोक दिया है तुमने
उनका नैसर्गिक प्रवाह.

सपना खुशहाली का देकर
छीन ली
हमारी
हरी-भरी धरती ,
ले लिया है
हमारा
सारा आकाश .

बाँध के आगे
बनाकर
छोटे-छोटे,
अपने-अपने बाँध
नदियों को बंधक बना,
दिखाकर सपने
सुनहरे भविष्य के
घर से भी हमें
बेघर कर गए,
रोजी छिनी,रोटी छिनी ,
खाने के लाले पड़ गए.

आजतक मूंदें रहे हम
अपनी आँखों के पलक
सोचकर कि खो न जाएं
ख्वाब सारे
जो हमें तुमने दिए.

जल तरल है,
वह सरल है
वह सहज ही बढ़ चलेगा,
चाहे कितनी भी हो बाधा
राह अपनी ढूंढ़ लेगा,
बनके निर्झर एक दिन वह
इस धरा को चूम लेगा

अब नहीं
बादल दिखाओ,
अब न बातों में घुमाओ
आ गया है अब समय
तुम बाँध के फाटक उठाओ,

Friday, September 2, 2011

"कैक्टस के फूल"

काँटों-भरी
अपनी हरियाली के संग
जीते रहे जीवन पर्यंत,
भूलकर अपना सारा दर्द
मुस्कुराते रहे
अभावों के शुष्क रेगिस्तान में,
समय के बेरहम थपेड़ों से
बेहाल
करते रहे
बारिश के आने का इन्तजार ,
देखते रहे
एकटक
उम्मीद के बादलों से भरा
सूना आकाश.

सूरज को रखकर
सदा अपने सर-आँखों पर,
उसकी तपती छांव में
सुख के रिमझिम फुहारों का
बिना किये इन्तजार
लगाते रहे बाग़,
श्रम के स्वेद-कणों से
भिगोते रहे जमीन
उगाते रहे फूल
तुम्हारे लिए
बिना मांगे
अपने श्रम का
प्रतिदान.

गुलाब के चाहने वालों
काँटों के बिना
बस फूलों की करो बात,
काँटों की तो हर जगह
एक सी ही है जात.
पर
तुम्हें
कहाँ दिखाई देता है
काँटा अपने गुलाब का,
कहाँ दिखाई देता है
हमारा त्याग.

हमने
स्वेच्छा से चुनी है
अवसरों की उसर जमीन
ताकि गुलाब को मिल जाए
हरा-भरा उपजाऊ मैदान,
फिर भी
कहाँ भाए तुम्हें
काँटों के बीच खिलते
"कैक्टस के फूल"

खुले आसमान के
नीले छप्पर तले
ओढ़कर
चाँद की शीतल चांदनी
सपनों के सिरहाने
रखकर अपना सर
बेफिक्र हो सोते रहे,
मुट्ठी-भर मिटटी में भी
मुस्कुराकर जीते रहे
अपने विश्वास के सहारे
अपनों के साथ
आजतक.
(समाज के उस बड़े हिस्से को सादर समर्पित जो हमें सबकुछ देकर आज भी सर्वथा उपेक्षित है )

Thursday, August 11, 2011

बहन हो तुम.

बहन हो तुम. .
हर भाई का अरमान हो तुम
राखी के धागे में लिपटी
एक मनभावन पहचान हो तुम,
मां के जैसा है मान तेरा
घर-घर पाती सम्मान हो तुम.

स्वार्थ भरी इस दुनिया में
एक सुखद अहसास हो तुम.
घायल हाथों की पट्टी हो,
आहत मन का बाम हो तुम.
स्नेह का जलता दीपक हो,
ममता का बिम्ब महान हो तुम.
संचारी है रूप तुम्हारा,
सर्वोत्तम जीवन आयाम हो तुम.

तुमसे सूरज-चाँद हमारे,
झीलमिल,झिलमिल करते तारे,
हरा-भरा जीवन है तुमसे,
सच्चे सुख का संसार हो तुम.
इतना सुन्दर,इतना कोमल
है तेरे धागों का बंधन
मृग बन ढूंढ़ रहे जो खुशबू,
उसका भी स्रोत साकार हो तुम.

जब-जब माथे तिलक लगाती
राखी बांध जब तुम मुस्काती,
खुशियों की एक धार निकलती,
लगता सृष्टि साकार हो तुम.

ख़त में सिमटी तेरी बातें,
भींगे सावन की सौगातें
धागों में बंध बढ़ता जीवन
फूलों भरी बहार हो तुम

धरती हो तुम,आसमान हो तुम,
चमत्कारी वरदान हो तुम
रिश्तों का केंद्र हो,
बहन हो तुम.

Wednesday, August 3, 2011

समझ लेने दो

अब तो
रह गया है
मेरी यादों में बसकर
मिटटी की दीवारों वाला
मेरा खपरैल घर
जिसके आँगन में सुबह-सबेरे
धूप उतर आती थी,
आहिस्ता-आहिस्ता,
घर के कोने-कोने में
पालतू बिल्ली की तरह
दादी मां के पीछे-पीछे
घूम आती थी,
और
शाम होते ही
दुबक जाती थी
घर के पिछवाड़े
चुपके से.

झांकने लगते थे
आसमान से
जुगनुओं की तरह
टिमटिमाते तारे,
करते थे आँख-मिचौली
जलती लालटेनों से.

आँगन में पड़ी
ढीली सी खाट पर
सोया करता था मैं
दादी के साथ.

पर,आज
वहां खड़ा है
एक आलीशान मकान,
बच्चों की मर्जी का
बनकर निशान.
उसके भीतर है
बाईक,कार,
सुख-सुविधा का अम्बार है.

नहीं है तो बस
उस मिटटी की महक
जिससे बनी थी दीवारें,
जिसमें रचा-बसा था
कई-कई हाथों का स्पर्श,
अपनों का प्यार,
नहीं है वो खाट
जिसपर
चैन से सोया करता था
मेरा बचपन.

एकबार फिर
जी लेने दो मुझे
उन यादों के साये में,
समझ लेने दो
अपनेपन का सार.