Friday, September 2, 2011

"कैक्टस के फूल"

काँटों-भरी
अपनी हरियाली के संग
जीते रहे जीवन पर्यंत,
भूलकर अपना सारा दर्द
मुस्कुराते रहे
अभावों के शुष्क रेगिस्तान में,
समय के बेरहम थपेड़ों से
बेहाल
करते रहे
बारिश के आने का इन्तजार ,
देखते रहे
एकटक
उम्मीद के बादलों से भरा
सूना आकाश.

सूरज को रखकर
सदा अपने सर-आँखों पर,
उसकी तपती छांव में
सुख के रिमझिम फुहारों का
बिना किये इन्तजार
लगाते रहे बाग़,
श्रम के स्वेद-कणों से
भिगोते रहे जमीन
उगाते रहे फूल
तुम्हारे लिए
बिना मांगे
अपने श्रम का
प्रतिदान.

गुलाब के चाहने वालों
काँटों के बिना
बस फूलों की करो बात,
काँटों की तो हर जगह
एक सी ही है जात.
पर
तुम्हें
कहाँ दिखाई देता है
काँटा अपने गुलाब का,
कहाँ दिखाई देता है
हमारा त्याग.

हमने
स्वेच्छा से चुनी है
अवसरों की उसर जमीन
ताकि गुलाब को मिल जाए
हरा-भरा उपजाऊ मैदान,
फिर भी
कहाँ भाए तुम्हें
काँटों के बीच खिलते
"कैक्टस के फूल"

खुले आसमान के
नीले छप्पर तले
ओढ़कर
चाँद की शीतल चांदनी
सपनों के सिरहाने
रखकर अपना सर
बेफिक्र हो सोते रहे,
मुट्ठी-भर मिटटी में भी
मुस्कुराकर जीते रहे
अपने विश्वास के सहारे
अपनों के साथ
आजतक.
(समाज के उस बड़े हिस्से को सादर समर्पित जो हमें सबकुछ देकर आज भी सर्वथा उपेक्षित है )

43 comments:

  1. आपकी पोस्ट पढ़कर किसी का बहुत प्यारा-सा शेर याद आ गया.आप भी देखिये;-
    हम क्यों कहें दिन आजकल अपने खराब हैं.
    काँटों से घिर गए हैं, समझ लो गुलाब हैं.

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  2. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  3. Rajeev ji bahut acchha likht hain aap.. badhai.. Bahut hi gahrai se aap kavya-muddon ke beech utarte hain.. bahut bahut Badhai..

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  4. गुलाब के चाहने वालों
    काँटों के बिना
    बस फूलों की करो बात,
    काँटों की तो हर जगह
    एक सी ही है जात.
    पर
    तुम्हें
    कहाँ दिखाई देता है
    काँटा अपने गुलाब का,
    कहाँ दिखाई देता है
    हमारा त्याग.

    waah behtreen abhivyakti ......bahut sunder bhavo se sajaya hai aapne badhai ..........

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  5. Arun Roy to me

    " आदरणीय राजीव जी वर्तमान कविता कैक्टस के स्थापित विम्ब को बदल रहा है और एक नई संवेदना का सृजन कर रहा है. हाशिये पर लगे कैक्टस के प्रति आपकी दृष्टि कैक्टस और इसके फूल को देखने का नजरिया बदल रही है... अच्छी कविता.. सादर अरुण ."

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  6. Jyoti Mishra to me

    "its beautiful...
    u wrote it with so much emotions :)"

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  7. vandana gupta to me

    "बेहद गहन चित्रण किया है"

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  8. Rakesh Kumar to me

    "आपकी यह बहुत सुन्दर प्रस्तुति है,राजीव जी.
    आभार,
    राकेश कुमार {ब्लॉग: मनसा वाचा कर्मणा}"

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  9. खुले आसमान के
    नीले छप्पर तले
    ओढ़कर
    चाँद की शीतल चांदनी
    सपनों के सिरहाने
    रखकर अपना सर
    बेफिक्र हो सोते रहे,

    बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  10. उपेक्षित वर्ग के लिए बहुत सार्थक बिम्ब ले कर रची गयी रचना मन को छू गयी

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  11. कैक्टस के फूलों का मर्म बताती यह कविता।

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  12. सुन्दर, संकेतात्मक, सार्थक अभिव्यक्ति...

    सादर बधाई...

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  13. --अब समाज व साहित्य में यही होरहा है कि केक्टसों की महत्ता बढाई जारही है,बिना सोचे समझे....गुलाबों पर केक्टसों को महत्त्व दिया जारहा है ...यही सामाजिक विश्रीन्खालता का कारण है ...सुनिए...

    केक्टस के फूल तो,
    साल में कभी कभार आते हैं ;
    सिर्फ कुछ समय के लिए,
    स्वयं की उपेक्षा का दुःख उठाते हैं,
    क्या वे किसी के काम आते हैं ?
    पूछो गुलाब के फूलों से जो,
    सदा काँटों के बीच रहकर ,
    सर्वदा दुःख उठाते हैं,
    फिर भी अपनी खुशबू व-
    स्नेहिल प्रसन्नता ,
    दूसरों को लुटाते हैं ,
    मुस्कुराते हैं ||

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  14. आपकी आला दर्जे की रचना है यह...समाज की सचाई है...इसे कटु भी क्यों कहूं ? सच तो सच ही होता है ,कडवा या मीठा नहीं !
    ऐसी रचनाएँ 'अंतर्जाल' पर कम ही मिलती हैं !

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  15. Dr_JOGA SINGH KAIT JOGI to me

    "राजीव कुमार जी आपने एक अछुते विषय को लेकर जो रचना बुनी है,वास्तव में सराहानीय रचना है.क्योकि ये रचना हर हाल में काम करणे को प्रेरित करती है.साधुवाद"
    http://drjogasinghkait.blogspot.com

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  16. दिल को छू गयी आपकी यह रचना...बहुत बढ़िया..आभार
    स्वागत है आपका मेरे ब्लाग पर...

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  17. Devendra Dutta Mishra -

    "गुलाब के चाहने वालों
    काँटों के बिना
    बस फूलों की करो बात,
    काँटों की तो हर जगह
    एक सी ही है जात.
    पर
    तुम्हें ,
    कहाँ दिखाई देता है
    काँटा अपने गुलाब का,
    कहाँ दिखाई देता है ।

    मानव संवेदनाओं को जगाती अभिव्यक्ति।"

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  18. Nirmal Gupta to me

    "बारिस नहीं बारिश ....ठीक कर लें"

    निर्मल गुप्त

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  19. You captured a lot in these few words. You write really well...

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  20. sudhir raghav to me

    "nice poem."

    http://sudhirraghav.blogspot.com/2011/08/blog-post_28.html

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  21. Prerna Argal to me

    "bahnut sunder gahanabhibyakti liye .bahut badhaai aapko.thanks."

    www.prernaargal.blogspot.com

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  22. हमने
    स्वेच्छा से चुनी है
    अवसरों की उसर जमीन
    ताकि गुलाब को मिल जाए
    हरा-भरा उपजाऊ मैदान,
    फिर भी
    कहाँ भाए तुम्हें
    काँटों के बीच खिलते
    "कैक्टस के फूल"

    Bahut hi Sunder....

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  23. bahut hi achhi rachna, vidyalaya mai padhi 'mai majdur mujhe devon ki basti se kya' yaad ho aayi.

    shubhkamnayen

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  24. बहुत गहरी रचना....बेहतरीन.

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  25. हमने
    स्वेच्छा से चुनी है
    अवसरों की उसर जमीन
    ताकि गुलाब को मिल जाए
    हरा-भरा उपजाऊ मैदान,
    फिर भी
    कहाँ भाए तुम्हें
    काँटों के बीच खिलते
    "कैक्टस के फूल" ...aaj neenv ka patthar naamak nibandh yaad aa gayaa.aapkii rachna behad achchhi hai

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  26. kaktas ke fool ko lekar bahut kuchh byan kar diya aapne..bahut sundar

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  27. बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति, शब्दों के बीच भावनाओं को जिस क्रम में पिरोया है, वह मोहित करता है।

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  28. बहुत सुन्दर
    वक़्त बदलेगा ये उम्मीद ही जीवन को चलने का इंधन है

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  29. केक्टस का सारा दर्द अपने शब्दों में पिरोया और भावनाओं से सींचा है अच्छी लगी आपकी ये बहुमूल्य प्रस्तुति

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  30. maheshwari kaneri to me

    "बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति....अभिव्यंजना में आप का स्वागत है.."

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  31. बहुत प्रभावी रचना है गुलाब जी ...
    सच में ऐसे लोग हैं तभी जीवन इतना सुन्दर हो सका है ...

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  32. sandhya tiwari to me


    "achhi kavita aur bahut hi acchi sonch."

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  33. Bhavpurna abhivyakti ! aabhaar!

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  34. Suman Patil to me

    "बहुत सुंदर रचना ...."

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  35. bahut kuch Zindagi sa laga ye Cactus ka fool...
    very very touchy n beautiful poem...

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  36. Asha Joglekar to me

    "फिर भी
    कहाँ भाए तुम्हें
    काँटों के बीच खिलते
    "कैक्टस के फूल"
    बहुत सुंदर और सार्थक रचना ।

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  37. कैक्टस के माध्यम से आपने जीवन के यथार्थ को चित्रित किया है।

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  38. bahut achha likha hai....kalam ki ye taakat aur bhwanaao kee abhiwyaktee kee kabiliyat banee rahe...dua hai hamaree...aapke liye...

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  39. सार्थक बिम्ब ले कर.......मानव संवेदनाओं को जगाती रचना ....बेहतरीन प्रस्‍तुति...बहुत खूब

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