Saturday, September 18, 2010

लिव-इन-रिलेशनशिप

न कोई रिश्ता
न कोई बंधन
बस एक छोटी सी शर्त
एक छोटा सा निबंधन .

साथ रहकर भी
नहीं होगा साथ
सात जन्मों का.
पल-क्षण का मिलन होगा,
मेल होगा,खेल होगा,
खिलवाड़ होगा प्रकृति साथ,

जीवन चक्र टूटे या रुके
ये रिश्ता चलेगा सालों-साल
आजादी और अपने-पन का भ्रम पाले
जवानी की वैसाखी पर सवार.
रहेंगे दोनों साथ-साथ
पक्षियों की तरह
स्वछन्द , उन्मुक्त
अपना-अपना आकाश लिए .

यहाँ पुराना कुछ नहीं होगा
सबकुछ होगा नया-नया ,
अपनों की सोच नहीं होगी,
नहीं होगा सर पर रिश्तों का बोझ,
अपनी-अपनी आजादी होगी,
अपनी-अपनी राह.
कोई किसी का नहीं होगा,
होगा मनमर्जी का साथ ,
मां-बाप के होते हुए
बच्चे होंगे अनाथ .

कोई दायित्व नहीं,
जीवन में स्थायित्व नहीं
कैसा है यह सम्बन्ध जहाँ
अपनों की सौगात नहीं.
अपने-पन की कोई बात नहीं,

26 comments:

  1. अच्छी पंक्तिया ........

    इसे भी पढ़कर कुछ कहे :-
    (आपने भी कभी तो जीवन में बनाये होंगे नियम ??)
    http://oshotheone.blogspot.com/2010/09/blog-post_19.html

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  2. कोई दायित्व नहीं,
    जीवन में स्थायित्व नहीं
    कैसा है यह सम्बन्ध जहाँ
    अपनों की सौगात नहीं.
    अपने-पन की कोई बात नहीं,

    आने वाले खतरे को आगाह करती हुई पंक्तियाँ |
    सुन्दर प्रस्तुति|
    ब्रह्माण्ड

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  3. होगा मनमर्जी का साथ ,
    मां-बाप के होते हुए
    बच्चे होंगे अनाथ .

    this one of the greatest satire I have read in recent times, brilliant... enjoyed it !

    congrates on wonderful peom...

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  4. कोई दायित्व नहीं,
    जीवन में स्थायित्व नहीं
    कैसा है यह सम्बन्ध जहाँ
    अपनों की सौगात नहीं.
    अपने-पन की कोई बात नहीं,

    सुंदर पंक्तियां

    http://veenakesur.blogspot.com/

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  5. कोई दायित्व नहीं,
    जीवन में स्थायित्व नहीं
    कैसा है यह सम्बन्ध जहाँ
    अपनों की सौगात नहीं.
    mann khush ho gaya padhke, bahut silsilewar sab kaha hai

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  6. खेद है राजीव जी मैं आपकी बात से सहमत नहीं हूं। आप ने लिव इन रिलेशनशिप को संकीर्ण दायरे में ही सोचा है। यह कहीं उसके आगे की सोच है। कमियां किस व्‍यवस्‍था में नहीं हैं। क्‍या हम स्‍वयं जिस विवाह संस्‍था से बंधे हैं,वहां सब कुछ अच्‍छा है। सब आपके मन का है। किसी भी सिक्‍के के दो पहलू होते हैं। मेरा मानना है जिस रिश्‍ते में आपसी विश्‍वास न हो,प्रेम न हो वह न तो विवाह संस्‍था में सफल हो सकता है और न ही लिव इन रिलेशन‍शिप में। इसलिए जितनी चीजें आपने गिनाईं हैं उनके सबके लिए विश्‍वास और प्रेम की अनिवार्यता है।

    कविता पर टिप्‍पणी नहीं करूंगा कि मैं आपके मुद्दे से ही सहमत नहीं हूं। हां इतना जरूर कहना चाहूंगा कि एक सर्तक और चेतनावान कवि को अपनी कविता के लिए विषय चुनते समय यह ध्‍यान रखना चाहिए कि वह उससे समाज को क्‍या देने वाला है।

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  7. कोई किसी का नहीं होगा,
    होगा मनमर्जी का साथ ,
    मां-बाप के होते हुए
    बच्चे होंगे अनाथ .


    इस रिश्ते से होने वाली कठिनाइयों को इंगित किया है ..विचारणीय रचना

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  8. मैं टिप्पणियां पढता जा रहा था, मुझे लगा कविता के बारे में कोई भी चर्चा होगी या नहीं, लेकिन राजेश उत्साही जी ने निराश नहीं किया...

    कविता तो वाकई में काफी अच्छी है लेकिन सोच थोड़ी कमजोर है... अब साथ रहने के लिए कौन सा रिश्ता अच्छा है वो तो फैसला हमें करना है...वो रिश्ता जो समाज ने जोड़ा हो लेकिन दिल न मिले हों....जिम्मेदारियां तो हों लेकिन प्यार नहीं, या फिर वो रिश्ता जो बिना किसी बंधन के वो सारे दायित्व निभाए.....

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  9. कोई दायित्व नहीं,
    जीवन में स्थायित्व नहीं
    कैसा है यह सम्बन्ध जहाँ
    अपनों की सौगात नहीं.
    अपने-पन की कोई बात नहीं
    बहुत गहरी बात एक विचारणीय विषय उठाया है सबकी अपनी अपनी सोच है

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  10. बड़े भैया,सादर प्रणाम.
    "लिव-इन-रिलेशनशिप"परआपकी टिपण्णी पढ़ी,पढकर अच्छा लगा . आपकी बात सही है कि मैंने इसके एक पहलू पर ही ध्यान दिया है.इसका दूसरा पहलू शायद समाज की चिंता का उतना बड़ा कारण न हो. वैसे तो यह दीर्घकालिक चर्चा का विषय है ,मैंने इसके सामयिक प्रभाव आनेवाली समस्याओं को ध्यान में रखकर ये बात कही है. अभी हाल में ही में किसी हाईकोर्ट ने ये फैसला दिया है कि इस तरह के रिश्तों से उत्पन्न होने वाली संतान का दायित्व "लिव-इन-रिलेशन" में रहनेवाले पार्टनरों का होगा.यदि कोर्ट को ऐसा कहना पड़ा है तो कहीं न कहीं इसमें कुछ विसंगतियां तो हैं न.आप कह सकते हैं कि ऐसी विसंगतियां तो समाज द्वारा स्थापित वैवाहिक संस्थाओं में भी हैं.सही है,लेकिन वहां समाज तो खड़ा होता है न उन कमियों को दूर करने के लिए. ऐसे तो जार्ज बर्नाड शा ने विवाह को एक "वैधानिक वैश्यावृति" तक कह डाला था,पर क्या आप अपनी sensibility के साथ उनकी बात से सहमत हो पाएंगे .
    मेरा विरोध इस तरह के संबंधों से कदापि नहीं है ,हो भी नहीं सकता ये भी वैसे ही अस्तित्वमान हो रही हैं जैसे कि किसी ज़माने में हमारी वैवाहिक संस्थाएं हुई होंगी.उनमें भी इस तरह कि खामियां रही होंगी ,लेकिन उसे दूर करने के प्रयास पहले भी हुए हैं,और आज भी हो रहे है. आप भी इस बात से सहमत होंगे कि इन रिश्तों को दायित्व के दायरे में लाये जाने कि जरूरत है ,नहीं तो सामाजिक ढांचा चरमरा जायेगा.मेरा तो ऐसा ही कुछ मानना है,
    शादी के बदलते स्वरू के रूप में इसे अपनाना बुरा नहीं है पर इसे दिशाहीन छोड़ देना एक भयंकर भूल होगी,

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  11. rishton ke vikroop roop ka naam live in rele..... hai. iske pahluon par prakash dalti hai aapki rachna.. badhai....

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  12. राजीव भाई मैंने आपकी टिप्पणी को ध्यान में रखकर एक लम्बी प्रतिक्रया यहां लगाई थी,पर वह नहीं आ पाई। अब दुबारा लिखने की कोशिश कर रहा हूं,पर वह बात नहीं बन रही। कुछ बिन्दु‍ओं का उल्लेख कर देता हूं। चलिए आपने यह तो माना कि आपने मुद्दे के केवल एक ही पक्ष पर विचार किया है। आपने कहा कि इसे दिशाहीन छोड़ देना भूल होगी। अगर कोर्ट के हस्तक्षेप से इसे एक दिशा मिलती है तो यह तो अच्छी बात है। हमें उसका स्वागत करना चाहिए। आखिर विवाह संस्था में भी जब कोई बात समाज भी नहीं सुलझा पाता है तब हम कोर्ट में ही जाते हैं न। राजीव भाई यह भी विचारणीय बात है कि हमारे समाज में ही बहुत सारे लोग लिव इन रिलेशनशिप की समझ के तहत सफल जीवन जी रहे हैं। उनमें कई जानी मानी हस्तियां भी हैं। मैं उनके नाम नहीं लूंगा।

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  13. मैं पूरे होशो हवास और संवेदनशीलता के साथ जार्ज बनार्ड शा के कथन से सहमत हूं। किन्तु उनके कहे के तात्पर्य को केवल इतने सीमित दायरे में समझना भूल होगी। समाज एक जटिल संरचना है। उसे समझने के लिए आपको तरह तरह के चश्मों का उपयोग करना पड़ता है। आप जानते हैं मैंने अपने ब्लाग गुलमोहर पर अपनी पत्नी नीमा को संबोधित करते हुए चार किस्तों में लिखी गई एक लम्बी कविता का समापन हाल ही में किया है। मैंने उसमें जिस प्रेम,विश्वा स, दायित्व,अधिकार आदि जैसे मूल्यों को अप्रत्यक्ष रूप से बयान किया है अगर वह हम दोनों के बीच न हो तो सोचिए वहां क्या बचेगा।
    सच यही है कि किसी भी तरह के रिश्ते में अगर विश्वास और प्रेम नहीं होगा तो वह लम्बे समय तक जीवित नहीं रहेगा। हां वह एक समझौता हो सकता है। फिर चाहे उसे समाज के डर से निभाना पड़े या कानून के डर से।

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  14. ओह पोस्ट और टिप्पणियों का सार संग्रह ये हुआ कि .....आप अपनी रचना को मुद्दे के विपक्ष में लिख सकते हैं और बदले में टिप्पणियां उसके पक्ष में आ सकती हैं ...इस तरह कविता से भी बहस की शुरुआत कराई जा सकती है ...ये विधा भी खूब रही ....

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  15. बहुत ही गहरी और विषय के साथ पूरा न्याय करती हुई रचना है. सारा का सारा सच शब्दों में उडेल दिया है आपने...

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  16. अच्छा हुआ कि मै देर से आया और पुरी बहस हो गयी है... मै राजेश उत्साही जी से सहमत हू कि भाइ राजीव जी ने लिव इन रिलेसन्शिप पर एकान्गी द्रिश्ती डाली है... कोइ भी सम्बन्ध बिना प्रेम या विश्वास के टिक नही सकता है.. भरोसा नही तो विवाह भी कहा चल पाता है...बदलते समाज मे रिश्ते का स्वरूप भी बदल रहा है और भी यह बदलेगा.. इस्के अपने फ़ाइदे भी होगे..नुक्सान भी... कवि को फ़ैसला देने से बच्ना चाहिये...

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  17. पश्चिमी सभ्यता के साथ-साथ अब तो ये ट्रेंड हमारे देश में भी चल निकला है...अच्छी और सशक्त रचना

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  18. साथ रहकर भी
    नहीं होगा साथ
    सात जन्मों का.
    पल-क्षण का मिलन होगा,
    मेल होगा,खेल होगा,
    खिलवाड़ होगा प्रकृति साथ..


    समझ नहीं आया.. खिलवाड कैसे होगा.. प्रकृति के साथ? प्रकृति ने कब सात जन्मों के लिए बांधा था?

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  19. कोई दायित्व नहीं,
    जीवन में स्थायित्व नहीं
    कैसा है यह सम्बन्ध जहाँ
    अपनों की सौगात नहीं.
    अपने-पन की कोई बात नहीं,...

    ऐसे रिश्तों की यही परिणिति होती है ...!

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  20. कोई दायित्व नहीं,
    जीवन में स्थायित्व नहीं
    कैसा है यह सम्बन्ध जहाँ
    अपनों की सौगात नहीं.
    अपने-पन की कोई बात नहीं,

    बंधन और सीमा में भी अलग सुख है .. पर सिर्फ स्‍वतंत्रता की चाहत रखनेवालों की क्‍या बात की जाए ??

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  21. आज के चर्चामंच पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से अवगत कराइयेगा।
    http://charchamanch.blogspot.com

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  22. रंजन जी, प्रकृति से खिलवाड़ से मेरा तात्पर्य बस इतना ही है की सामाजिक सरोकारों को भी ध्यान में रखा जाये.प्रकृति यदि जीवों को जीवन देती है तो उनको संरक्षण भी देती है.अपने दायित्वों से कभी मुंह नहीं मोड़ती है.यदि विवाह जैसी संस्था में कोई खराबी है तो उसे दूर करने का प्रयास किया जाना चाहिए न कि उससे पलायन कर स्वंत्रता और व्यक्तिगत पहचान के नाम अपनी जिम्मेवारियों से भागना चाहिए. कई लोगों ने कहा है कि रिश्ते प्यार और आपसी विश्वास पर आधारित होते हैं.ऐसा तो पुरानी संस्था में रहकर भी हो सकता है.इस सम्बन्ध से मेरा कोई दुराव नहीं है.जहाँ तक सात जन्मों का साथ होने की बात है तो स्पष्ट कर दूं कि अगर आप सच्चा प्यार करते हैं,किसी से भी तो आप उससे कभी भी जुदा होने की बात नहीं हैं ,बल्कि इसका अंतहीन विस्तार चाहते हैं.इसी को लोगो ने शायद सात जन्मों का प्यार कहा है.
    आपकी बहुमूल्य टिपण्णी के लिए धन्यवाद.

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