Thursday, October 28, 2010

दर्द का कोई चेहरा नहीं होता

दर्द
होता है
ईश्वर की तरह
निराकार ,
पर,नहीं होता है
निराधार .

यह भी होता है
सर्वव्यापी
उसी की तरह,
होते हैं इसके भी
कई-कई रूप.

नहीं होता इसका
अलग-अलग रंग,
बस चोट होती है
अलग-अलग
दिखी-अनदिखी सी.

दर्द का
कोई चेहरा नहीं होता,
हर चेहरे पर
उभर आता है ये दर्द
आइना बनकर.

आंसू और मुस्कान में
छुपा रहता है.
वेदना-अंतर्वेदना में
बंटा रहता है
ये दर्द
सृजन का सार बनकर,
रिश्तों का आधार बनकर.

9 comments:

  1. dard ... deta hai zindagi ko akaar , wahi uska chehra hai ,
    bahut hi achhi rachna

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  2. बहुत अच्छा कविता. आप कविता के विभिन्न पहलुओं को समझा दिया है. अंतिम पंक्तियों अद्भुत हैं.

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  3. पूरे अस्तित्व में हो जाता है व्याप्त यह दर्द।

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  4. dard ko jatane ka tareeka behad umda hai bhai sahab!!

    badhai!!..:)

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  5. यह बात तो सही है कि दर्द का कोई चेहरा नहीं होता।

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  6. आंसू और मुस्कान में
    छुपा रहता है.
    वेदना-अंतर्वेदना में
    बंटा रहता है
    ये दर्द
    सृजन का सार बनकर,
    रिश्तों का आधार बनकरadbhut sachchhai hai in panktiyon me ye dard hi adhar hai is jeevan ka...

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  7. bahut sunder rachna rajiv sir. dard ko bakhobi mehsoos kiya hai aapne...saadar

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  8. दर्द तो दर्द है. दर्द चेहरे पर आ जाता है चाहे दर्द का कोई चेहरा नहीं होता.

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