Wednesday, May 5, 2010

कवि

मछुआरा
बन
बुनता हूँ जाल
पूरी तन्मयता से
शब्दों के
मजबूत धागों से
ताकि जा सकूँ
अपनी छोटी सी नाव ले
गहरे समुद्र में
मुंह अँधेरे
सुबह-सबेरे
और
पकड़ सकूँ
स्वतंत्र विचरण करती
ढेर सारी
मछलियाँ ,
देख सकूँ
जाल में
अपने
उनकी तड़प,
या फिर
बन जाऊं
बागबां
बागों से
चुनूं फूल
गूंथ-गूंथ कर
बनाऊं
एक माला
अदृश्य खुशबुओं
से भरी
और
जान लूं
काव्य सृजन का
राज
और
सहेज कर रख लूं
उन्हें
अपने मन-आँगन में.

3 comments:

  1. एक कवि के मन की बात को कविता के माध्यम से कहा है ..इस से बेहतर क्या हो सकता है .....सुन्दर गहरी भाव पूर्ण रचना ......पसंद आई आज से आपके अभिव्यक्ति घोंसले में ....हमें भी पनाह दीजिये..haam aapke saath hai

    http://athaah.blogspot.com/2010/05/blog-post_4890.html

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  2. बहुत खूब, लाजबाब !

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  3. बुनता हूँ जाल
    पूरी तन्मयता से
    शब्दों के
    मजबूत धागों से
    ताकि जा सकूँ
    अपनी छोटी सी नाव ले
    गहरे समुद्र में
    sunder rachna... srijan ki aatma ko abhivyakt karti

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