Thursday, May 20, 2010

अमानुष

मैं तो ईंट था
जब नींव में पड़ा
सक्रिय जीवन से
ले लिया सन्यास
निष्क्रिय रहकर
एक सक्रिय आधार बना .

जीता रहा
अपनों की याद लिए,
अपनों का साथ लिए ,
एक गुमनाम जिंदगी
आजीवन
औरों के लिए .

लेकिन
तुम तो मानुष थे,
तुम्हें तो बड़ा बनना था,
भला बनना था,
औरों के लिए जीना,
औरों के लिए मरना था.
किसी का सहारा बनना था .

फिर तुमने क्यों
अलग कर लिया
स्वयं को
अपनों की भीड़ से ,
जीते रहे
अपने-आप से अलग
एक एकाकी जीवन
अपने लिए
और
हो गए अमानुष

4 comments:

  1. मैं तो ईंट था
    जब नींव में पड़ा
    सक्रिय जीवन से
    ले लिया सन्यास
    निष्क्रिय रहकर
    एक सक्रिय आधार बना .....
    sunder kavita, sunder vimb...

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  2. bahut khub likha hai aaapne....
    achha laga padhkar.....
    yun hi likhte rahein.........

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  3. -----------------------------------
    mere blog par meri nayi kavita,
    हाँ मुसलमान हूँ मैं.....
    jaroor aayein...
    aapki pratikriya ka intzaar rahega...
    regards..
    http://i555.blogspot.com/

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