Friday, July 16, 2010

पागल नहीं हूँ मैं

लोग
मुझे पागल
समझते हैं
क्योंकि
मैं
तन नहीं ढकता
अपने मन का,
नहीं ढो पता हूँ
संस्कारों की लाश,
सर्द रिश्तों का
बासीपन
अपनेपन की गर्माहट
नहीं देता,
नहीं देता
वो अनदिखी डोर
जो बांधे रखती है
हम दोनों को
साथ-साथ.

मेरी आदिम भावना
तपिश ढूंढ़ती है,
तपिश ,
रगों में
ढूंढ़ती है
खून का उबाल ,
ढूंढ़ती है
भावों में तड़प
तुम्हारे लिए
एक अनबुझी प्यास लिए
एक अनजानी चाह लिए .

9 comments:

  1. well said Rajiv !

    Hata off !
    .

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  2. बहुत उम्दा अभिव्यक्ति!! बधाई.

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  3. आपकी पोस्ट आज चर्चा मंच पर भी है...

    http://charchamanch.blogspot.com/2010/07/217_17.html

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  4. बहुत ही सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति ।

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  5. बेहद सुन्दर अभिव्यक्ति।

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  6. ए़क अलग भाव की कविता ... प्रेम में पागल हुए कवि के उद्दत कल्पना की कविता

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