Wednesday, August 3, 2011

समझ लेने दो

अब तो
रह गया है
मेरी यादों में बसकर
मिटटी की दीवारों वाला
मेरा खपरैल घर
जिसके आँगन में सुबह-सबेरे
धूप उतर आती थी,
आहिस्ता-आहिस्ता,
घर के कोने-कोने में
पालतू बिल्ली की तरह
दादी मां के पीछे-पीछे
घूम आती थी,
और
शाम होते ही
दुबक जाती थी
घर के पिछवाड़े
चुपके से.

झांकने लगते थे
आसमान से
जुगनुओं की तरह
टिमटिमाते तारे,
करते थे आँख-मिचौली
जलती लालटेनों से.

आँगन में पड़ी
ढीली सी खाट पर
सोया करता था मैं
दादी के साथ.

पर,आज
वहां खड़ा है
एक आलीशान मकान,
बच्चों की मर्जी का
बनकर निशान.
उसके भीतर है
बाईक,कार,
सुख-सुविधा का अम्बार है.

नहीं है तो बस
उस मिटटी की महक
जिससे बनी थी दीवारें,
जिसमें रचा-बसा था
कई-कई हाथों का स्पर्श,
अपनों का प्यार,
नहीं है वो खाट
जिसपर
चैन से सोया करता था
मेरा बचपन.

एकबार फिर
जी लेने दो मुझे
उन यादों के साये में,
समझ लेने दो
अपनेपन का सार.

42 comments:

  1. अपनेपन का सार.... ye yaaden

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  2. एकबार फिर
    जी लेने दो मुझे
    उन यादों के साये में,
    समझ लेने दो
    अपनेपन का सार.


    -ओह!! सीधे दिल से दिल तक!!!

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  3. बहुत गहरे भाव.
    क्या बात है.

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  4. एक बार फिर जी लेने दो ....बहुत अच्छे

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  5. This comment has been removed by the author.

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  6. क्या बात है राजीव जी .कितनी सरलता से सब कुछ कह दिया .बधाई .

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  7. उन स्मृतियों में उतरना सुहाता है।

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  8. दिल में यादो का मेला है
    आँखों में है नमी
    ओर क्या कहें आपसे
    ये ही है जिन्दगी .........आभार

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  9. धूप उतर आती थी,
    आहिस्ता-आहिस्ता,
    घर के कोने-कोने में
    पालतू बिल्ली की तरह
    दादी मां के पीछे-पीछे
    घूम आती थी,...

    bahut sundar ye pamktiyan...Apne pan ki yaaden hamesha hi dil men basi hoti han ...bahut achi prastuti..badhai!

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  10. ऐसी सुंदर स्मृतियाँ कभी दी से दूर नहीं होतीं..... बहुत सुंदर .

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  11. खुबसूरत रचना....

    "स्मृतियों के बादल बनके
    विगत, ह्रदय में रिमझिम बरसे
    उन्हें देखता चलचित्र सा,
    भीग न पाऊँ, ये मन तरसे"
    सादर....

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  12. ... सरलता से सब कुछ कह दिया राजीव जी

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  13. अब तो जीना कहाँ है भाई....समय काटना है ! बहुत संवेदनशील कविता !

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  14. खूबसूरत और संवेदनशील अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  15. एकबार फिर
    जी लेने दो मुझे
    उन यादों के साये में,
    समझ लेने दो
    अपनेपन का सार.

    सुंदर भावो से सजी भावपूर्ण रचना , बधाई स्वीकार करिएँ

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  16. गया वक्त कब लौट्कर आया है राजीव जी बस उसकी यादें ही हमे उम्रभर भरमाती रहती हैं।

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  17. बहुत गहरे भाव.
    खूबसूरत

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  18. बढ़िया कविता.. आधुनिक जीवन के द्वन्द से उपजी...

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  19. आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है , कृपया पधारें
    चर्चा मंच

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  20. sushma verma to me


    "very nice...."

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  21. पुराने दिन याद करा दिए आपने तो...
    भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति

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  22. ये बातें तो बस अब एक सपना भर ही रह गयीं हैं. कोमल अहसास

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  23. सुन्दर,भावपूर्ण रचना

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  24. बहुत सुंदर संवेदनशील भाव समेटे हैं!!

    !!यहाँ पर भी आयें!!

    "घृणा पाप से करो पापी से नहीं"

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  25. मिटटी के घर और उसकी महक से साक्षात्कार कराती, मार्मिक प्रस्तुति

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  27. This comment has been removed by the author.

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  28. यादों का बहुत ख़ूबसूरत पुलिंदा
    बहुत संदर रचना


    आपका मेरे ब्लॉग पे आपका स्वागत है
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  29. एकबार फिर
    जी लेने दो मुझे
    उन यादों के साये में,
    समझ लेने दो
    अपनेपन का सार.

    भावपूर्ण रचना !

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  30. आदरणीय राजीव सर
    आपकी इस कविता को मैंने कई बार पढ़ा है. हर बार मुझे अलग कोण और दृष्टिकोण मिले हैं आपकी कविता में. एक द्वन्द मिला है तो एक आशा मिली है. एक निराशा मिली है तो एक विश्वास भी मिला है. इस कविता को पढ़ते हुए मुझे एक आधुनिक अमेरिकन कवि और उपन्यासकार ए. केनिथ. बोर्तोन की एक कविता 'आई अंडरस्टैंड " की याद आ गई.. आप भी पढ़िए... बार बार कहता हूँ कि आपकी कविताओं में पश्चिम की संवेदनशीलता है.. यह आपको काफी आगे ले जाएगी सर... पढ़िए केनिथ. बोर्तोन की कविता...

    I Understand

    To be free of relationships
    that manipulate people

    To be anxious about the future
    and one's self-importance

    To trust openly
    without pencil and pen

    I understand
    what it means to be a friend

    To grow and mature
    under loving care and tutelage

    To share the same dreams
    for family and kin

    I understand
    what it means to be a friend

    To harbor fears about aging
    and finality

    To see the younger generation
    as wanting to strive, not compete

    To share of one's talents
    and gifts out of love, not conceit

    To be totally at peace
    in spite of our sin

    I understand
    what it means to be a friend

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  31. ओह....

    ये टीस....



    कुँवर जी,

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  32. waah... aise bhaawon ko kaise shabdon mei samet lete hain aap...

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  33. बेहतरीन और अनुपम अभिव्यक्ति.
    भाव और शब्दों का सुन्दर तालमेल.

    सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.

    मेरे ब्लॉग पर दर्शन दीजियेगा.

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  34. कहाँ से जियेंगे वो अहसास , सब कुछ पीछे छूट गया है , प्यार आज भी है और रिश्ते भी लेकिन क्या वो बात है? पिता इस चिंता में लगा रहता कि कैसे इनको सारी सुविधाएँ दूं चाहे सर पर हाथ फिरने का समय न मिले. माँ भी मशीन की तरह से सुबह से शाम तक व्यस्त बस उसके पास समय नहीं है और बच्चे भी तो अब किताबों के बोझ तले दबे जी रहे हैं कब उन्हें दादी या माँ के साथ खेलने या दुलराने का समय बचा है. हम स्वर्ग सा जीवन जी चुके हैं और अब वो दुबारा नहीं मिलने वाला बस इसी तरह लिखा करेंगे और बच्चे कहेंगे -' क्या आप टूटी खाट में वह भी दादी के साथ सोते थे.' आपका अलग बेडरूम नहीं था. सच है न.....

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  35. एकबार फिर
    जी लेने दो मुझे
    उन यादों के साये में,
    समझ लेने दो
    अपनेपन का सार...

    अपना आँगन ... बीता बचपन ... वो घर ... वो पेड़ ... सब कुछ ही याद आता है हमेशा ...

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  36. नहीं है तो बस
    उस मिटटी की महक
    जिससे बनी थी दीवारें,
    जिसमें रचा-बसा था
    कई-कई हाथों का स्पर्श,
    अपनों का प्यार,
    नहीं है वो खाट
    जिसपर
    चैन से सोया करता था
    मेरा बचपन....

    एक था बचपन..
    एक था बचपन...
    जिसकी यादों में है सुकून
    आज भी, अभी भी...
    उस मिटटी की महक
    और प्यार भरे स्पर्श को
    महसूस करना भर है..
    बस आँख मूँद कर..
    थोड़ी देर शांत बैठ जाएँ...!!
    यही बचा है हमारे पास..
    इससे ज्यादा कुछ नहीं !!

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  37. कृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर आपको हार्दिक शुभकामनाएँ.

    मेरे ब्लॉग पर आपके आने के लिए आभारी हूँ.

    एक बार फिर से आईये.

    भक्ति व शिवलिंग पर अपने सुविचार प्रकट कर अनुग्रहित कीजियेगा मुझे.

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