Tuesday, September 6, 2022

  


  सपने तो अपने होते हैं



सपने तो सपने होते हैं

सच हो जाएं तो अपने होते हैं

            ऐसा ही एक सपना मन में संजोए

मैं चल पड़ा हूं

सामने खड़े विशालकाय पर्वतों की श्रृंखला की ओर

उपर को जाती उस उबड़-खाबड़ पथरीली पगडंडी पर

बिना जाने कब तक चलूंगा

कहां पर मिलूंगा उससे

थोड़ी दूर चलकर

सामने खड़ा दूसरा पहाड़

उसके टेढे-मेढ़े बर्फीले से रास्‍ते

सफेद बर्फ से जगमगाती उॅचाईयां

और मन को सिहराती

अंधेरे को लोरियां सुनाती

अतल गहराई में लेटी घाटियां

भरोसे की डोर थामे मैं

रुका नहीं

बढ़ता रहा, बढ़ता रहा, बढ़ता रहा..      

 

रूई फाहों से सफेद-सपनीले बादलों के ढेर

और उनके बीच से गुजरता मैं

भीगी पलकों से अपनी हथेलियों में उन्‍हें समेटता मैं

यह जानते हुए कि अपने इन हाथों से

मैं कभी अनंत को समेट नहीं पाऊंगा। 

फिर भी बढ़ चला हूं मैं

उन गगन चुम्‍बी हिम की ओर। 

देख पा रहा हूं चौंधियायी आंखों से

सूर्य किरण के प्रहार से चारों ओर बिखरी दुधिया सफेदी

 

और तभी

घने कोहरे की ओट में सिमटी

सकुचाई

नई नवेली दुल्‍हन सी

एक अद्भूत जादुई विस्‍तार लिए

नीला आसमान ओढ़े

पर्वतराज के पांव पखारती

सामने थी गुरूडोंगमार झील

 

मैं कहां देख पाता हूं

हल्‍के नीले झील की आसमानी गहराई 

कुछ ऐसा ही एहसास शायद तब हुआ था

जब तेरी झील सी नीली आंखों की गहराई में

उतरा था मैं I

 

अपने घुटनों पर झुका मैं

चारों ओर फैली नीरवता

शरीर में सिहरन पैदा करती हवाओं

गर्वेन्नित हिम शिखरों

लहरों से मुक्‍त

निश्‍चल जल को

नमन करता हूं, नमन करता हूं।

शंकाओं की जमीन पर विश्‍वास पनपा।

 

 

अनुपम एवं अदभूत दृश्‍य ह्दय में बसाए

अब मैं पुन: लौट आया हूं

अहंकार, राग-द्वेष, लड़ाई-झगड़े

जीवन की आपा-धापी से भरे

शूद्र सांसारिकता के क्षणभंगुर धरातल पर

 

वहां से लौटे मुझे वर्षों बीत गए हैं

मैंने अपनी आवाज फिर से पा ली है

दुनिया की आवाज की गूंज में भी

पहाड़ों की नीरवता

उसकी हवाओं की गूंज

सर्द छुअन को महसूस करता हूं

सोचता हूं

प्रकृति के ऐसा नैसर्गिक सौंदर्य

पथरीली पंगडंडियों पर चलकर ही

पाया जा सकता है, शायदI



 

On Gurudongmar Lake

 

An unmetalled strip snakes up

and beyond, curling around

this mountain, and then the next,

reaching the heart of the sky.

No, don't look down to the valley,

Approach these lofty heights

with the head held high.

I ride the clouds

cotton-wool white, wispy,

a mirage always,

Weeping when I try

to hold them in my palm-

A hopeless effort to imprison

In mortal hands, eternity.

Till only the jagged peaks

wearing shrouds of snow

stand guard to the sky,

Their blinding whiteness relieved

by a sunbeam splintering

into a thousand pieces,

lighting up the lunar landscape.

And then, like a vision,

Hidden by a fine veil of mist,

coy like a bride,

Gurudongmar offers a glimpse.

The bluest expanse of water

caressing the feet

of a mighty mountain.

I am unable to fathom

If the lake mirrors the sky above,

or the sky reflects the water below.

The only time in my life

when I saw this precise shade of blue

was when I first looked

deep into the depth of your eyes.

I fall to my knees and pray

to the silence reigning all around,

to the wind which cuts like a lash,

to the majesty of the mountains,

to the stillness of the waters.

For the first time in my life

doubts vanish and I believe.

Too soon it is time to descend

to earth, it's egos, rivalries,

squabbles, strife, dust and grime,

the rat race; all the petty realities

of a mundane existence,

made easier to bear by the memory

of having once locked eyes with God.

A year has passed since then

and I have found my voice again.

Amidst the everyday sounds and sights,

my dreams still roam those lofty heights.

Just one jarring note is struck-

Such beauty we can only reach

through mud tracks built for an army truck!

        ANAND MADHUKAR


 

बाढ़

उमड़ते–घुमड़ते,

घने काले मेघों के नीचे खड़ा मैं

खुश नहीं हूँ, 

आहत हूँ। 

 

चारों तरफ बारिश ही बारिश,

घर–घरारी,खेत-खलिहान

हर तरफ पानी ही पानी देखा है, 

डूबती-उतराती जिन्दगी का ढेर देखा है। 

 

देखी है लोगों की परेशानी,

उनकी विवशता,

तुम्हारा आतंक देखा है

और देखा है तुम्हारा कहर। 

तुम्हारी बहाव में हजारों घरों को टूटते,

हजारों सपनों को बिखरते देखा है,

देखा है करीब से

कैसे टूटती है उम्मीदों की डोर

बांधों के टूटने से

कैसे ढेर हो जाते हैं अरमान ।

 

गाँव,कस्बा या शहर ही नहीं 

बहा ले जाते हो

हमारी आस्था

हमारा विश्वास भी 

बड़ी मुश्किल से जिन्हें बसा पाए थे हम।

 

तुम्हें सुरसा की तरह

हमारे पैरों तले की जमीन,

हमारा आशियाना,

हमारा आसरा

पलभर में सबकुछ निगलते देखा है।

 

लोगों ने बड़ी मुश्किल से बनायी थी

रिश्तों की टूटी सड़क,

पाटकर दूरियां बनाए थे पुल।

 

मिलने का सिलसिला शुरु होता

उससे पहले तुम्हारी मौजें बहा ले गयीं

सड़क और पुल

उससे जुड़े सारे रास्ते,

कर दिया एक बार फिर

सबको एक-दूसरे से अलग,

मोहताज कर दिया औरों के सहारे का 

लगा दिया हमारे अस्तित्व पर ही प्रश्न चिह्न ?

 

तुम्हारा कहर

सुनामी,सूखे और भूकंप से बढ़कर है

तुम

जो कभी हुआ करते थे वरदान

हमारे लिए,

आज अभिशाप बन गए।

 

लेकिन आज मेरा एक वादा है तुमसे

डिगा नहीं पाओगे

जीवन के प्रति हमारा विश्वास,

मिटा नहीं पाओगे हमारी जीजीविषा,

मोड़कर पाँचों उंगलियां

मुट्ठी बनाएंगे,

तेरी उफनती धार पर

नाव और पतवार ले चढ़ जाएंगे।

मिटने नहीं देंगे अपनी हस्ती,

तुम्हारे हर कहर से टकराएंगे,

फिर से जोड़ेंगे तिनका-तिनका

अपना नया आशियाना बनाएंगे।

डालेंगे सृजन के बीज,

इंतजार करेंगे उम्मीद की किरणों संग

उनके उग आने का

जो देंगी हौसला तुमसे टकराने का, 

एक जज्बा

जिंदगी से दो-चार हो जाने का ।

 

शर्माजी का सबमर्सिबल (कच्ची कॉलोनियों का दर्द)

 

पानी की समस्या से होकर परेशान

अपने पड़ौसियों के व्यवहार से हैरान

एक दिन जब मैंने

गिरते जलस्तर के कारण

दम तोड़ते हैंडपम्प की जगह

सबमर्सिबल पम्प लगवाने का फैसला किया। 

 

लोगों ने मुझे समझाया,

डराया – धमकाया

“शर्माजी पानी नीचे है और नीचे चला जाएगा”

इसे मत लगवाओ।

 

सबने लगवा रखा था

और मुझे अपनी बातों में उलझा रखा था ।

 

जैसे-तैसे जोड़-तोड़कर

मैंने पैसा जुटाया,

सामान मंगाया

मिस्त्री लगाया,

बोरिंग का काम शुरु करवाया। 

 

तभी किसी सह्रदय पड़ौसी की पहल पर

आ धमका एक पुलिस वाला

बोला – ये क्या हो रहा है,

बिना परमिशन के सबमर्सिबल कौन लगवा रहा है”?

 

घरवाले परेशान,

प्लम्बर हैरान !

कैसे सूंघ लेते हैं पुलिस वाले

किस गली में चल रहा है कौनसा काम,

 

तभी वह जोर से चिल्लाया

 अरे! कोई बोलता क्यूँ नहीं,

मुँह खोलता क्यूँ नहीं”

 

चलो कोई बात नहीं,

मैं अपनी मोबाईल से इसकी वीडियो बनाऊंगा,

फिर थाने में जमा कराऊंगा,

थानेदार को सारी बात बताऊंगा। 

तुम जो कर रहे हो

वह सरासर इल्लिगल है।

 

शर्माजी धीरे से घर से बाहर आए

सिपाही को दरोगा जी कहकर बुलाया

कहा – कोई उपाय बताओ,सर,

आप ही कोई जुगत भिड़ाओ

किसी तरह मेरा सबमर्सिबल गड़वाओ।

 

सिपाही जी बोले शान से

“देखो भाई, वैसे तो है ये इल्लिगल,

पाँच हजार रुपए दे दो

मैं इसको करवा दूँगा लीगल।

 

शर्माजी बोले,

“लेकिन भाई पाँच हजार तो बहुत हैं””. 

देख भाई,

तेरे इल्लिगल काम को लीगल कराऊंगा,

नीचे से ऊपर तक

सबको खिलाऊंगा,

इससे कम में नहीं बनेगी बात ।

 

शर्माजी परेशान हो बोल पड़े,

“भाई, ये तो सरासर इल्लिगल है”

उसने कहा, 

तू जो कर रहा है वो कौनसा लीगल है

सिपाही बोला,

तू तो पढ़ा-लिखा समझदार लगता है,

तुझे तो पता होगा

माइनस – माइनस प्लस होता है,

वैसे ही इल्लिगल – इल्लिगल लीगल होता है।

जल्दी से पैसे निकालो,

इसे जल्दी से लीगल करवा लो।

 

आज मुझे करने हैं ढेरों ऐसे काम,

तेरी बातों में उलझा रहूंगा तो हो जाएगी शाम।

 

ले-देकर पांच सौ में सैटल हुआ मामला,

जाते-जाते सिपाही बोला,

“शर्माजी”, ताल ठोक के अपना सबमर्सिबल गड़वाओ,

मेरा मोबाईल नंबर रख लो साथ,

कोई तंग करे तो मुझे बताओ ।

 

     बाबूजी  

 

खादी का सफेद धोती-कुर्ता आपकी पहचान रहा,

गांधी के आदर्शों को निभाते आये आप,

आज समय की वर्तमानिकता में

आप और अधिक प्रासंगिक हो गए हैं, बाबूजी।

 

         आपका मार्गदर्शी व्‍यक्तित्‍व

        हम पर सदा हावी रहा है,

        अच्छे-बुरे का भेद समझाकर

       जीवन-मूल्‍यों के साथ सामंजस्य बिठाकर 

       आगे बढ़ने की राह बतलाता रहा।

 

आज हम उसी राह पर लौट रहे हैं

जो कल-तक आपका था

उस समय अधिकांश चीजें

लोकल हुआ करती थी,बाबूजी।

समय-चक्र की चाल तो देखिये

50 वर्षों के बाद आज़ पूरा देश  

          लोकल के लिए वोकल हो रहा है।

 

जिस तरह आपने प्रत्येक रिश्ते को एक नाम दिया

व्‍यक्ति के योगदान को बिना किसी भेद-भाव के

स्‍वीकार करना सिखाया,

आपसी सम्बन्धों को निभाना सिखाया,

गांधी की सर्वसमावेशी

सामाजिक अवसंरचना को अमली जामा पहनाया।

 

जिस तरह आपने कत्तिनों, बुनकरों से मिलवाया,

उनके कामों की बारीकियों को विस्तार से बताया

उत्पत्ति विभाग,कोल्हू-घानी, बागवानी,गौशाला,

और गोबर-गैस प्लांट की उपयोगिता बतलाई,   

ग्रामोद्योग में कुटीर-उद्योग की

सहभागिता का महत्‍व बताया,

सर्व-धर्म समभाव पर आधारित

आत्‍मनिर्भर भारत का यह विचार

बिल्‍कुल क्रांतिकारी और हत्-प्रभ कर देने वाला था।

 

यह अतीत में बनाया गया

वर्तमान और भविष्‍य का भावी मानचित्र था,

बिलकुल बापू के राम-राज्य सरीखा,

और आप उस संकल्पना के जीवंत उदाहरण थे,बाबूजी।

 

जिस तरह आपने हमें राह दिखाने के लिए

विचारों की जगह कर्मयोग का सहारा लिया,

कृषि और पशुपालन का मानवीय मूल्‍यों से मेल कराया,

उसमें बसे सुख की अनुभूति करायी,

उसका आनंद लेना सिखाया,

यह सब कितना सुंदर था,बाबूजी।

 

आपको बागवानी करते देखना,

उसमें तन-मन से आपका साथ देना,

गाय और बछिया संग आत्‍मीय हो जाना,

उनका आकर आपके गले से लिपट जाना,

संबंधों की एक अमिट लकीर छोड़ती 

अद्वितीय तस्‍वीर ही तो थी, बाबूजी।

 

आपका गौशाला और शौचालय को स्‍वयं साफ करना,

आस-पास की नालियों की रोज सफाई करना,

सफाई और स्‍वच्‍छता की बेमिशाल तस्‍वीर ही तो थी 

जो बिना कुछ कहे हमें भी प्रेरित करती थी

         और आज भी हमारे संस्‍कारों की नींव में पैबस्‍त है।

 

आपके धैर्य, आपके अदम्‍य साहस,

आपकी मितव्‍ययिता की सीख ने

हमारी राहें आसान कर दीं, बाबूजी

धन की कमी कभी हमारी मेहनत, 

हमारी सफलता के आड़े नहीं आई

यह आपका ही आशीर्वाद था।

 

गांधी का महात्‍मा होना आपसे ही जाना है,बाबजूी

आपने ही हमारे सपनों को पंख दिये

अभाव के असीम आसमान में उड़ने का हौसला दिया।

 

मैं धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था

पर बचपन की अपनी बदमाशियों

और आपकी बेरहम पिटाई की बातें सोचकर

आज भी सिहर उठता हूँ

          आपके मौन से भयाक्रांत रहा करता था

जो घर के कोने-कोने में घर किए बैठी थी।

         आपके गुस्‍से,

         आपके आपके अभिभावकीय तेवर से परेशान

         मैं कई-बार सामान्‍य शिष्‍टाचार की सीमाएं लांघता रहा 

         क्योंकि मन पल-भर को विद्रोही हो जाता था।

         मेरे प्रति आपकी निराशा

        आपके आंखों की उदासी और सूनापन

        मन को कचोट जाती थी, बाबूजी।

 

          छोटी-छोटी मांगों को कल पर टाल देना

आपके लिए आम रहा हो 

लेकिन मेरे मन को बुरी तरह आक्रोशित कर जाता था,

मैं अपने मन को समझाता था

क्योंकि आपकी विवशता मैं समझने लगा था, बाबूजी।

 

मुझे आज भी याद है

जब घर से 7-8 किलोमीटर दूर स्थित

इंटर कॉलेज में मैंने दाखिला लिया था

और कॉलेज जाने-आने के लिए

मैंने आपसे एक नई साईकिल मांगी थी,

तो आपने रंग-रोगन करवाकर

एक नई साईकिल दिलवाई थी।

 

घर के हालात का मुझे पता था, बाबूजी

पर, आपकी ईमानदारी और सत्‍यनिष्‍ठा पर

कभी-कभी बेहद गुस्‍सा आता था

क्योंकि इससे हमारे छोटे-छोटे सपने

यदा-कदा चोटिल हो जाया करते थे

और हम किसी से कह भी नहीं पाते थे।

 

जीवन और उसकी सीमाओं के प्रति आपका सम्‍मान,

शब्‍दों के चयन में बरती जानेवाली सावधानियों,

आपके उद्दात और समदर्शी विचारों के सामने

मैंने अपने-आपको बहुत छोटा पाया है,बाबूजी।

   

गुस्‍से के ज्‍वार-भाटे से परे

आपका प्‍यार अथाह

मगर सागर अंतःस्थल सा शांत था।

          हमउम्र दोस्‍त की तरह

आपका हमारे साथ बैठकर ताश खेलना

अपनी संस्‍था के नियम-अंतर्नियम समझाना

गांधी की विचारधारा को विस्‍तार से बताना

कितना साधारण, कितना विस्‍मयकारी था

अब समझ आ रहा है,

आज देश का प्रधानमंत्री उसे ही दोहरा रहा है।

 

कुर्ते बेशक पैबंद लगे मगर बेदाग हुआ करते थे

घर से निकलते समय

मां के टोकने पर मुस्‍कुरा कर कहते,

इसमें हर्ज ही क्‍या है, भाग्‍यवान।

आज हजारों लोगों को यह भी मय्यसर नहीं है’।

मां निरूत्तर हो जाया करती थीं

ऐसे थे बाबूजी, ऐसी ही थी उनकी सोच।

 

हमेशा एक लकीर खींचती सोच के साथ जीते आए,

जो सबके लिए एक ही लम्‍बाई लिए थी।

सर्वोदय के सिद्धांत,आपके विचार

बेहद मूल्‍यवान एवं जादुई थे,बाबूजी।

 

1990 का वर्ष था

जब फरवरी के महीने में

          मैंने भारत सरकार में नई-नई नौकरी ज्‍वाइन की थी,

और एकबारगी ही सारे सम्‍पर्क सूत्रों से कटकर

असहाय सा महसूस करने लगा था।

ऐसे समय स्‍नेहाशीष से भरा आपका खत

एक पूल बन जाता था,

रिश्‍तों को जोड़े रखने वाला पूल

ऐसा करके आप

परिवार को परिवार से जोड़े रखते थे,बाबूजी।

 

आज भी याद आता है

आपका प्‍यार से मेरे बालों में उंगलिया फिराना

जून-जुलाई की वारिश में

गायों,बछियों संग मैदान में जाकर खड़ा हो जाना ,

उनकी पीठ को सहलाते हुए उन्हें नहलाना,

क्या ही अद्भुत नजारा होता था,बाबूजी।  

 

सर्दियों की रात में देर तक अलाव के पास बैठना,

बैठकर बातें करना

आपके सानिध्‍य की गर्माहट से भर देता था

मैं आपके उस विश्‍वास का दीवाना था, बाबूजी

जिसमें आपको

मेरे सपनों को आसमान मि‍लने का भरोसा था

          यही आपके जीवन जीने के ठंग का वसीयतनामा-सा था।

और खुशी इस बात की है कि आखिकार

यह भी हमें अच्‍छाई की राह पर ही ले गया।