Tuesday, September 6, 2022

 

मैंने देखा है उसे


मैंने देखा है उसे

एक छोटा सा छप्पर डाल

रहते हुए पड़ौस में

पति के साथ

करते हुए सीवर खुदाई का काम

बच्चे को बिठा देती थी

मिट्टी के ढेर पर 

 

उसकी ऊर्जा का स्रोत 

शायक उसके पति का उसके लिए प्रेम है

या फिर बच्चे के लिए उसका ममत्व 

छत्तीसगढ़ में छोड़कर

प्यारा अपना गाँव

शहर आयी है

 

पूरी श्रद्धा और लगन से करती है 

अपना काम

अपने चेहरे पर मोतियों सी चमकती

पसीने की बूँदों से लिखती रही

विकास की इबारत

बनकर सृजन-हार

 

भूल जाती वो अपनी सारी थकान 

आ बैठता जब उसका बेटा उसकी गोद में

बड़े प्यार से

आँचल की छांव में उसे दूध पिलाती

मन ही मन गुनगुनाती

फिर खो जाती सपनों के संसार में

जहां न फावड़ा होता

न कस्सी 

ना ही उसकी मेहनत से बना मिट्टी का ढेर 

जिस पर बैठकर

उसका नन्हा कान्हा

मारता था किलकारियां

वह भी काट रही है वनवास

पर खुश है 

उसका पति, उसका बच्चा है

हर पल उसके साथ 

नहीं चाहिए उसे कुछ और

दोनों जहान की खुशियां हैं उसके पास

कपड़ों में है पैबंद कोई बात नहीं

मन में नहीं है कोई बात

मड़ैया में भी मिलता है उसे

महला का सुख

क्योंकि अपने हैं उसके साथ ।

 

अचार

किसी ने कहा था एक दिन,

जब जीवन से भोजन की तरह जाने लगे स्वाद,

इसका बासीपन

विचारों के बासीपन की तरह करने लगे परेशान

तो अचार बनाने पर और खाने पर जरूर करें विचार,

मैं तो करता हूँ।

 

जब कभी मैं जाता हूँ मंडी/बाज़ार

और देखता हूँ कच्चे आमों का ढेर

स्वयं को रोक नहीं पाता हूँ 

खरीद कर ले आता हूँ कई-कई किलो आम

बैठकर फिर बड़े जतन से

उन्हें काटता हूँ कई-कई टुकड़ों में,

पानी भरे बाल्टी में डुबोकर

उन्हें धोता हूँ कई-कई बार,

फिर डाल देता हूँ खिली धूप में

चटाई पर फैलाकर

नमी हटाने को जेठ की भरी दोपहरी में।

 

मिट्टी की हांडी में उन टुकड़ों को डालकर

उस पर डालता हूँ हल्दी

और छिड़कता हूँ नमक

धूप की गर्मी में

उसे कई-कई दिन पकाता हूँ

हफ्ते-भर बाद

उसमें भांति-भांति के मसाले मिलाता हूँ,

उन्हें तेल में नहलाता हूँ

और सीसे के मर्तबान में समेटकर रख लेता हूँ

सहेजकर खुशियों के पल की तरह।

 

आज भी याद है मुझे 

माँ के साथ मिलकर

पिताजी भी बनाया करते थे अचार

मैं तो बस मूकदर्शक बना

देखता रहता एक-एक चरण

देखने की खुशी तो मुझे मिलती

पर कुछ बनाने का सुख पाते थे बाबूजी।

बन जाता था स्वादिष्ट अचार

खाने का जायका तो बढ़ाता था

जीवन की नीरसता में करता था

नयेपन का संचार ।

24/10/2010

            गौरेया

            सालों बाद

आज

सुबह-सवेरे

घर के दरवाजे पर

गौरेया का जोड़ा

फुदक-फुदक कर

चहक रहे थे।

मानों कह रहे हों

तुम्‍हारे बिना मन नहीं लगा

तो फिर मिलने चले आए तुमसे

चाहते हैं कुछ दिन रहना

तुम सबके साथ। 

मैं भी तो मन से यहीं चाहता था।

उन्‍हें कैसे बताता मैं

अपने मन की बात

भरोसे का कत्‍ल तो हमने ही किया था। 

 

दौड़कर मैं घर के भीतर गया

कटोरे में चावल के दाने भर लाया

कटोरा जब उनके सामन रखने लगा

वे उड़कर दूर जा बैठे

कटोरा बीच सड़क पर रख

मैं अलग हो गया

उन्‍हें भरोसा नहीं हो रहा था।

सतर्क निगाहों से

शंका मुक्‍त होने के बाद

दोनों चुगने लगे थे दाना 

मैं समझ रहा था सारी बात

पर कैसे उन्‍हें विश्‍वास दिलाता

सब एक से नहीं होते। 

गौरेया भी मेरी बात समझ रही थी शायद ।

 

अब तो दोनों रोज आने लगे

थोड़ा पास भी आने लगे

घर के दरवाजे के ऊपर

घास-फूस जमा कर

घोसला बनाने लगे

उनकी एक-एक हरकत

मन को हर्षाती,

मन का कोना-कोना

उमंग से भर जाती थी।

 

कुछ दिनों बाद अंडे

फिर धीरे-धीरे परदार होते

बेपरदार चूजे

पांचों का घोसला में होना

महानगरों के जीवन का आईना थे

लेकिन कौए तो हर जगह होते है

एक दिन गौरेये के चूजे ले उड़े

विश्‍वास फिर घात का शिकार हो गया

घोसला खंडहर में बदल गया

कुछ दिन तक तो आते रहे दोनों

बैचेन से ढूंढते रहे कुछ

मैंने भी एक मजबूत, सुरक्षित 

घोसला बनाकर रखा था

लेकिन भरोसे की जमीन नहीं दे पाया। 

 

धीरे-धीरे गौरेया ने आना छोड़ दिया।

इंसानी बस्‍ती में चहचहाना छोड़ दिया।

अब तो बस हम हैं

गौरेयों का घोसला है

             बस  .....  

 

पापा

आपका व्‍यक्तित्‍व मुझ पर हमेशा हावि रहा,

जिस तरह आपने मार्क्‍स के बारे में विस्‍तार से बताया,

जिस तरह आपने मेरे अनगिनत सपनों को पहचान दी,

जिस तरह आपने समय चक्र को साधा

और इतिहास के उतार-चढ़ाव से रूबरू करवाया,

जिस तरह आपने नित्‍से को नाजीवाद से जोड़ा,

जिस तरह सापेक्षवाद को अपने आसान बनाया,

और फ्रायड पर चढ़े मुल्‍लमें को हटाया,

जिस तरह गैरीबाल्‍डी और ग्‍यूवेरा की बाते करते हुए ,

आपके चेहरे की चमक बढ़ जाती थी

उससे मैं अभिभूत था।

गांधी का महात्‍मा होना भी आपसे ही जाना, पापा

आपने ही मेरे सपनों को पंख दिए

असीम आकाश में उड़ने का हौसला दिया,

मैं धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था

फिर भी 

मैं हमेशा आपसे, आपकी चुप्‍पी से थोड़ा भयाक्रांत रहा

जो घर के कोने-कोने में घर किए बैठी थी।

आपके दिए असंभव से लक्ष्‍य को पाने में

असफल मैं

आपके अभिभावकीय कोप

आपके कड़े तेवर से परेशान

कई बार

सामान्‍य शिष्‍टाचार की सीमाएं

लांघता रहा।

आपकी मेरे प्रति बढ़ती निराशा

आपकी आंखों की उदासी को झेलना

जब असह्य हो जाता,

मेरा मन

पलभर को

विद्रोही हो जाता था। 

आपकी पुरानी-जर्जर कार देखकर

मुझे आप पर बहुत गुस्‍सा आता था

पर आपकी विवशता भी मैं समझने लगा था। 

जब मैं 10वीं में था

तब घर में ब्‍लैक एंड व्‍हाइट टी.वी. आया

बदलाव की बयार लिए

 

आपके अनियंत्रित गुस्‍से से

मुझे चिढ़ थी।

याद है आपको

जब आपने मुझे थप्‍पड़ मारा

और मैंने आपका हाथ पकड लिया था

आप गुस्‍से में चुपचाप बाहर चले गए थे।  

मेरे जीवन में वो पल भी आए

जब मुझे आपकी बेरहम इमानदारी

आपके वि‍वेक पर गुस्‍सा आता था

जीवन और शब्‍दों के प्रति

आपके उदार विचारों के सामने

मैं हमेशा बौना नजर आया

आपमें सभी नैसर्गिक गुण थे,

अथाह मगर शांत सागर प्‍यार सा भी था

आपका जानबुझकर शतरंज में हार जाना

वड्सवर्थ के बारे में मुझे विस्‍तार से बताना

आपकी हंसी, आपका वाक् चातुर्य

आपका मेरे अनगढ़ लेखन पर गर्व से भर जाना

मेरे बालों में उंगलियां फिराना

तेज बारिश और हवाओं में

मुझे खींचकर घर से बाहर ले जाना

सर्द रातों में मेरे साथ बैठकर

देर तक बातें करना

आपके सानिध्‍य की गर्माहट से भर देता था।

बेख्‍याली में गुनगुनाती मां

और आपका मोहित होकर उसको एकटक निहारना,

उनकी आंखों पर छाई लटों को उँगलियों से झटककर हटाना

समय से परे था, पापा।

मैं आपके उस विश्‍वास पर फिदा था

जिसमें मेरे सपनों को आसमान मिलने का भरोसा था। 

काश! मैं समझ पाता कि जल्‍द ही यह सब बिखर जाने वाला है

ट्रेन धीरे-धीरे आगे बढ़ रही ही थी

और आप भीड़ का हिस्‍सा बनकर

भीड़ में ही खो गए

खोते चले गए।

पता होता तो मैंने

उन पलों को कैद कर लिया होता, पापा। 

दो दिन बाद ही मुझे

आपका समाचार मिला मिला

सामने जो पाया था वो आप नहीं थे

शून्‍य को निहारता निस्‍तेज शरीर मात्र था। 

आपका अंतिम संस्‍कार कर

मैं लौट आया अपनी दुनिया में

इन पन्‍द्रह वर्षों में शायद ही कभी मैं रोया

आपकी अलमारियां साफ करते समय

एक दिन कविताओं से भरी आपकी डायरी मिली

समय के प्रभाव से जर्द होते,

बिखरते,

एक-एक पन्‍ने पर

आपकी मुस्‍कुराहट

आपकी उदासी की छाया

स्‍याही के उतरते रंगों में

आज भी पैबस्‍त हैं, पापा।

यह वसीयतनामा था

आपके जीवन

और जीने के सलीके का

इन पन्‍द्रह सालों में

मैंने कुछ भी नहीं लिखा

कुछ भी तो नहीं।

अपने आपको संभालने में,

अपने दरम्‍यानेपन से उबरने में

मुझे इतने साल लग गए। 



 

Letter To My Father

 

I was always a little in awe of you,

Of the way you explained Marx

Giving words to countless dreams,

The way you spun the wheels of time

To reveal how History ebbs and flows,

The way you linked Nietzsche with Nazism,

The way you made Relativity look simple

And Freud a little less fanciful,

Of the way your eyes lit up

When you spoke of Garibaldi and Guevera,

The way you taught me how

Gandhi was indeed a Mahatma,

Of the way you ignited my dreams

Giving them a boundless sky to soar.

I was always a little afraid of you,

Of your silence that grew heavy

Digging roots in the corners of the house,

Of the thundering shadows in your face

When I fell short of your impossible standards,

Of your deepening frowns as I grew older

And crossed more often the lines of propriety,

Of the sadness in your eyes when

I rebelled briefly for I could no longer bear

The growing disappointment in your eyes.

I always hated you a little,

For the third-hand, run-down car

Which was the most you could afford,

For the black and white television

That we got only when I was in 10th.

I hated you when you once tried to slap me

When I was seventeen, and hated you

even more when I caught hold of the blow,

And you walked out without a word.

There were also times when I hated

Your honesty that could be heartless,

Your conscience that could be infuriating,

Your zest for life, your way with words,

Everything in you that made me feel

Just that little bit smaller.

Awe, fear, hate; but there was love as well,

Like a placid sea of unknown depths,

The way you purposely lost at chess,

The way you read Wordsworth to me,

Your pride in my amateurish scribbles,

Your laughter, wit, the stories in your eyes,

The way you ruffled my hair, and dragged me out

When it rained hard or the wind blew high,

The way you talked deep into cold nights-

Your voice like smouldering embers,

The way you looked at Ma entranced

When unmindful she broke into a song

Or brushed her hair off her eyes.

I loved the way you believed

My dreams would find a place to nest.

Had I known it would soon shatter

When slowly the train steamed ahead

And you dissolved into a crowd of faces,

I would have imprisoned the moment.

Two days later, in Delhi I got the news,

Rushing back to find you unfeeling, unseeing,

Stone-cold in a way that was just not you, and so

With dry eyes I consigned you to flames,

Neither have I shed any tears these fifteen years,

Though every day I have died a little too.

Cleaning your closet a few days ago,

I found a diary of your poems,

A testament to your life and the way you lived it,

Your laughter rustling the pages,

Your tears staining them brown,

The ink faded with time, the binding falling apart

Unable to hold together

Your dreams and your disappointments.

I have not written a word these fifteen years,

It has taken me this long

To come to terms

With my loss

And my mediocrity.

(P.S. Papa passed away in 1993, the same month when my graduation results came out.

This poem was written 15 years later, in 2008. I had posted it earlier too,

but this is a revised, more tightened up version,

now that I am able to look at this piece with some measure of objectivity.)

ANAND MADHUKAR