Wednesday, September 23, 2020

 

       बाबूजी  

 

खादी का सफेद धोती-कुर्ता आपकी पहचान रहा,

गांधी के आदर्शों को निभाते आये आप,

आज समय की वर्तमानिकता में

आप और अधिक प्रासंगिक हो गए हैं, बाबूजी।

 

    आपका मार्गदर्शी व्‍यक्तित्‍व

    हम पर सदा हावी रहा है,

    अच्छे-बुरे का भेद समझाकर

    जीवन-मूल्‍यों के साथ सामंजस्य बिठाकर 

    आगे बढ़ने की राह बतलाता रहा।

 

आज हम उसी राह पर लौट रहे हैं

जो कल-तक आपका था

उस समय अधिकांश चीजें

लोकल हुआ करती थी,बाबूजी।

समय-चक्र की चाल तो देखिये

50 वर्षों के बाद आज़ पूरा देश  

    लोकल के लिए वोकल हो रहा है।

 

जिस तरह आपने प्रत्येक रिश्ते को एक नाम दिया

व्‍यक्ति के योगदान को बिना किसी भेद-भाव के

स्‍वीकार करना सिखाया,

आपसी सम्बन्धों को निभाना सिखाया,

गांधी की सर्वसमावेशी

सामाजिक अवसंरचना को अमली जामा पहनाया।

 

जिस तरह आपने कत्तिनों, बुनकरों से मिलवाया,

उनके कामों की बारीकियों को विस्तार से बताया

उत्पत्ति विभाग,कोल्हू-घानी, बागवानी,गौशाला,

और गोबर-गैस प्लांट की उपयोगिता बतलाई,   

ग्रामोद्योग में कुटीर-उद्योग की

सहभागिता का महत्‍व बताया,

सर्व-धर्म समभाव पर आधारित

आत्‍मनिर्भर भारत का यह विचार

बिल्‍कुल क्रांतिकारी और हत्-प्रभ कर देने वाला था।

 

यह अतीत में बनाया गया

वर्तमान और भविष्‍य का भावी मानचित्र था,

बिलकुल बापू के राम-राज्य सरीखा,

और आप उस संकल्पना के जीवंत उदाहरण थे,बाबूजी।

 

जिस तरह आपने हमें राह दिखाने के लिए

विचारों की जगह कर्मयोग का सहारा लिया,

कृषि और पशुपालन का मानवीय मूल्‍यों से मेल कराया,

उसमें बसे सुख की अनुभूति करायी,

उसका आनंद लेना सिखाया,

यह सब कितना सुंदर था,बाबूजी।

 

आपको बागवानी करते देखना,

उसमें तन-मन से आपका साथ देना,

गाय और बछिया संग आत्‍मीय हो जाना,

उनका आकर आपके गले से लिपट जाना,

संबंधों की एक अमिट लकीर छोड़ती 

अद्वितीय तस्‍वीर ही तो थी, बाबूजी।

 

आपका गौशाला और शौचालय को स्‍वयं साफ करना,

आस-पास की नालियों की रोज सफाई करना,

सफाई और स्‍वच्‍छता की बेमिशाल तस्‍वीर ही तो थी 

जो बिना कुछ कहे हमें भी प्रेरित करती थी

    और आज भी हमारे संस्‍कारों की नींव में पैबस्‍त है।

 

आपके धैर्य, आपके अदम्‍य साहस,

आपकी मितव्‍ययिता की सीख ने

हमारी राहें आसान कर दीं, बाबूजी

धन की कमी कभी हमारी मेहनत, 

हमारी सफलता के आड़े नहीं आई

यह आपका ही आशीर्वाद था।

 

गांधी का महात्‍मा होना आपसे ही जाना है,बाबजूी

आपने ही हमारे सपनों को पंख दिये

अभाव के असीम आसमान में उड़ने का हौसला दिया।

 

मैं धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था

पर बचपन की अपनी बदमाशियों

और आपकी बेरहम पिटाई की बातें सोचकर

आज भी सिहर उठता हूँ

    आपके मौन से भयाक्रांत रहा करता था

जो घर के कोने-कोने में घर किए बैठी थी।

    आपके गुस्‍से,

    आपके आपके अभिभावकीय तेवर से परेशान

    मैं कई-बार सामान्‍य शिष्‍टाचार की सीमाएं लांघता रहा

क्योंकि मन पल-भर को विद्रोही हो जाता था।

मेरे प्रति आपकी निराशा

आपके आंखों की उदासी और सूनापन

मन को कचोट जाती थी, बाबूजी।

 

    छोटी-छोटी मांगों को कल पर टाल देना

आपके लिए आम रहा हो 

लेकिन मेरे मन को बुरी तरह आक्रोशित कर जाता था,

मैं अपने मन को समझाता था

क्योंकि आपकी विवशता मैं समझने लगा था, बाबूजी।

 

मुझे आज भी याद है

जब घर से 7-8 किलोमीटर दूर स्थित

इंटर कॉलेज में मैंने दाखिला लिया था

और कॉलेज जाने-आने के लिए

मैंने आपसे एक नई साईकिल मांगी थी,

तो आपने रंग-रोगन करवाकर

एक नई साईकिल दिलवाई थी।

 

घर के हालात का मुझे पता था, बाबूजी

पर, आपकी ईमानदारी और सत्‍यनिष्‍ठा पर

कभी-कभी बेहद गुस्‍सा आता था

क्योंकि इससे हमारे छोटे-छोटे सपने

यदा-कदा चोटिल हो जाया करते थे

और हम किसी से कह भी नहीं पाते थे।

 

जीवन और उसकी सीमाओं के प्रति आपका सम्‍मान,

शब्‍दों के चयन में बरती जानेवाली सावधानियों,

आपके उद्दात और समदर्शी विचारों के सामने

मैंने अपने-आपको बहुत छोटा पाया है,बाबूजी।

   

गुस्‍से के ज्‍वार-भाटे से परे

आपका प्‍यार अथाह

मगर सागर अंतःस्थल सा शांत था।

     हमउम्र दोस्‍त की तरह

आपका हमारे साथ बैठकर ताश खेलना

अपनी संस्‍था के नियम-अंतर्नियम समझाना

गांधी की विचारधारा को विस्‍तार से बताना

कितना साधारण, कितना विस्‍मयकारी था

अब समझ आ रहा है,

आज देश का प्रधानमंत्री उसे ही दोहरा रहा है।

 

कुर्ते बेशक पैबंद लगे मगर बेदाग हुआ करते थे

घर से निकलते समय

मां के टोकने पर मुस्‍कुरा कर कहते,

इसमें हर्ज ही क्‍या है, भाग्‍यवान।

आज हजारों लोगों को यह भी मय्यसर नहीं है’।

मां निरूत्तर हो जाया करती थीं

ऐसे थे बाबूजी, ऐसी ही थी उनकी सोच।

 

हमेशा एक लकीर खींचती सोच के साथ जीते आए,

जो सबके लिए एक ही लम्‍बाई लिए थी।

सर्वोदय के सिद्धांत,आपके विचार

बेहद मूल्‍यवान एवं जादुई थे,बाबूजी।

 

1990 का वर्ष था

जब फरवरी के महीने में

     मैंने भारत सरकार में नई-नई नौकरी ज्‍वाइन की थी,

और एकबारगी ही सारे सम्‍पर्क सूत्रों से कटकर

असहाय सा महसूस करने लगा था।

ऐसे समय स्‍नेहाशीष से भरा आपका खत

एक पूल बन जाता था,

रिश्‍तों को जोड़े रखने वाला पूल

ऐसा करके आप

परिवार को परिवार से जोड़े रखते थे,बाबूजी।

 

आज भी याद आता है

आपका प्‍यार से मेरे बालों में उंगलिया फिराना

जून-जुलाई की वारिश में

गायों,बछियों संग मैदान में जाकर खड़ा हो जाना ,

उनकी पीठ को सहलाते हुए उन्हें नहलाना,

क्या ही अद्भुत नजारा होता था,बाबूजी।  

 

सर्दियों की रात में देर तक अलाव के पास बैठना,

बैठकर बातें करना

आपके सानिध्‍य की गर्माहट से भर देता था

मैं आपके उस विश्‍वास का दीवाना था, बाबूजी

जिसमें आपको

मेरे सपनों को आसमान मि‍लने का भरोसा था

    यही आपके जीवन जीने के ठंग का वसीयतनामा-सा था।

और खुशी इस बात की है कि आखिकार

यह भी हमें अच्‍छाई की राह पर ही ले गया।

        राजीव:08/09/2020

Monday, August 10, 2020

A Letter To Papa

 

      पापा को खत 


आपका व्‍यक्तित्‍व मुझ पर हमेशा हावि रहा,

जिस तरह आपने मार्क्‍स के बारे में विस्‍तार से बताया,

जिस तरह आपने मेरे अनगिनत सपनों को पहचान दी,

जिस तरह आपने समय चक्र को साधा

और इतिहास के उतार-चढ़ाव से रूबरू करवाया,

जिस तरह आपने नित्‍से को नाजीवाद से जोड़ा,

जिस तरह सापेक्षवाद को अपने आसान बनाया,

और फ्रायड पर चढ़े मुल्‍लमें को हटाया,

जिस तरह गैरीबाल्‍डी और ग्‍यूवेरा की बाते करते हुए ,

आपके चेहरे की चमक बढ़ जाती थी

उससे मैं अभिभूत था।

गांधी का महात्‍मा होना भी 

आपसे ही जाना, पापा

आपने ही मेरे सपनों को पंख दिए

हौसला दिया

असीम आकाश में उड़ने का,


मैं धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था

फिर भी 

मैं हमेशा आपसे

आपकी चुप्‍पी से थोड़ा भयाक्रांत रहा

जो घर के कोने-कोने में घर किए बैठी थी।

आपके दिए असंभव से लक्ष्‍य को पाने में

असफल मैं

आपके अभिभावकीय कोप

आपके कड़े तेवर से परेशान

कई बार

सामान्‍य शिष्‍टाचार की सीमाएं

लांघता रहा।


मेरे प्रति बढ़ती आपकी निराशा,

आपकी आंखों की उदासी को झेलना

जब असह्य हो जाता,

मेरा मन

पलभर को

विद्रोही हो जाता था।

 

आपकी पुरानी-जर्जर कार देखकर

मुझे आप पर बहुत गुस्‍सा आता था

पर आपकी विवशता भी मैं समझने लगा था। 

जब मैं 10वीं में था

तब घर में ब्‍लैक एंड व्‍हाइट टी.वी. आया

बदलाव की बयार लिए

 

आपके अनियंत्रित गुस्‍से से

मुझे चिढ़ थी।

याद है आपको

जब आपने मुझे थप्‍पड़ मारा

और मैंने आपका हाथ पकड लिया था

आप गुस्‍से में चुपचाप बाहर चले गए थे।

  

मेरे जीवन में वो पल भी आए

जब मुझे आपकी बेरहम इमानदारी

आपके वि‍वेक पर गुस्‍सा आता था

जीवन और शब्‍दों के प्रति

आपके उदार विचारों के सामने

मैं हमेशा बौना नजर आया

आपमें सभी नैसर्गिक गुण थे,

अथाह मगर शांत सागर प्‍यार सा भी था


आपका जानबुझकर शतरंज में हार जाना

वड्सवर्थ के बारे में मुझे विस्‍तार से बताना

आपकी हंसी, आपका वाक् चातुर्य

मेरे अनगढ़ लेखन पर 

आपका गर्व से भर जाना

मेरे बालों में उंगलियां फिराना

तेज बारिश और हवाओं में

मुझे खींचकर घर से बाहर ले जाना

सर्द रातों में मेरे साथ बैठकर

देर तक बातें करना

आपके सानिध्‍य की गर्माहट से भर देता था।


बेख्‍याली में गुनगुनाती मां

और आपका मोहित होकर उसको एकटक निहारना,

उनकी आंखों पर छाई लटों को उँगलियों से झटककर हटाना

समय से परे था, पापा।

मैं आपके उस विश्‍वास पर फिदा था

जिसमें मेरे सपनों को 

आसमान मिलने का भरोसा था,

  

काश! मैं समझ पाता कि जल्‍द ही यह सब 

बिखर जाने वाला है

ट्रेन धीरे-धीरे आगे बढ़ रही ही थी

और आप भीड़ का हिस्‍सा बनकर

भीड़ में ही खो गए

खोते चले गए।

पता होता तो मैंने

उन पलों को कैद कर लिया होता, पापा।

 

दो दिन बाद ही मुझे

आपका समाचार मिला मिला

सामने जो पाया था वो आप नहीं थे

शून्‍य को निहारता निस्‍तेज शरीर मात्र था। 

आपका अंतिम संस्‍कार कर

मैं लौट आया अपनी दुनिया में

इन पन्‍द्रह वर्षों में शायद ही कभी मैं रोयाI


आपकी अलमारियां साफ करते समय

एक दिन कविताओं से भरी आपकी डायरी मिली

समय के प्रभाव से जर्द होते,

बिखरते,

एक-एक पन्‍ने पर

आपकी मुस्‍कुराहट

आपकी उदासी की छाया

स्‍याही के उतरते रंगों में

आज भी पैबस्‍त हैं, पापा।

यह वसीयतनामा था

आपके जीवन

और जीने के सलीके का.


इन पन्‍द्रह सालों में

मैंने कुछ भी नहीं लिखा

कुछ भी तो नहीं।

अपने आपको संभालने में,

अपने दरम्‍यानेपन से उबरने में

मुझे इतने साल लग गए। 


Rajiv:10/08/2020

Wednesday, September 18, 2019

ON THE PATH OF GAIN

ON THE PATH OF GAIN
Dear Angel, 
I’m sorry for the earth & sky 
You shared alone. 
I’m sorry for the air 
You breathed alone. 
I’m sorry for the flowers you touched, 
And the games you played alone. 
I earned a lot, 
Achieved the goals  
Beyond my dreams, 
Touched the horizons of success, 
But all without you , my love. 
In a trance of trampling success 
I forgot you’re a part of me, 
I forgot you’re in me. 
Not only that, 
I forgot the days 
When I told you to brush your teeth, 
Helped you to get dressed, 
 And go to school. 
When we went to park 
You holding my finger & walked 
The green patches of our grassy lawn. 
I’m very sorry to say 
I have seen you grow 
All alone in my presence 
With your west-ward emotions 
Full of breezy lull. 
I missed your first day at school, 
First football match, 
Your Halloween Parade 
And many more. 
Now they are countless to write, 
Countless to read. 
Dear doll, 
In your suffering 
I too have suffered 
By allowing my priorities over my relationship 
All at the cost of globetrotting job. 
This I could know 
 A year ago 
When I asked you to remember 
What you missed 
When I was away. 
You asked me to wait, 
Went to your room 
 And came with a piece of paper, 
And handed me a list of 22 events 
Surely important one for you, 
Important one for me. 
 List of events & activities you compiled . 
Both you & I missed 
Due to my so called commitments. 
Surely it was a wake-up call! 
Excuses apart 
Each missing events 
Weighed heavy upon me, 
My tours , travels & meets. 
 But I was sure enough now 
By doing so I have missed 
A thread of life & love. 
It deeply hurts to know 
I allowed my relations 
 To ride on unruly waves 
Of misleading commitments. 
 Work may be worship 
But not at the cost of you. 
Now I’m with you 
Binding knot to knot 
And kissing every smile.
 (Rajiv kumar/29/09/2014)

पाने की चाह में

सुनो एंजेल,

मैं दिल से दुखी हूँ उन लम्हों के लिए

जो तुमने अकेलेपन में बिताए

जहाँ सूरज की जगमगाती रोशनी तो थी 

पर मैं नहीं था

जहाँ चाँदनी भरी रात तो थी 

पर मैं नहीं था

मुझे माफ कर देना बेटा

हर उस धड़कन के लिए 

जो मेरी भी थी पर अकेली थी

फूलों के उस छुअन के लिए

तितलियों के पीछे-पीछे भागने के लिए

वर्षों अकेले मैदान में दौड़ लगाने के लिए

जिसमें मेरा साथ न था

मुझे माफ कर देना (एंजेल)

उन लम्हों के लिए

जो तुमने अकेले बिताए,

फूलों के उस छुअन के लिए,

जिसमें मेरा साथ न था।

मुझे माफ करना

बागों में तितलियों के पीछे अकेले-अकेले भागने

मैदान में वर्षों अकेले दौड़ लगाने के लिए।

मैंने अकूत धन अर्जित किए,

आगे बढ़कर चाहत का क्षितिज छुआ,

सफलता के शिखर पर जा बैठा,

लेकिन सबकुछ बिना तुम्हारे,

अकेले-अकेले, बिलकुल अकेले।

सफलता के मद में चूर

मैं यह भूल गया कि तुम मेरा हिस्सा,

 

मेरा वर्तमान, मेरा भविष्य हो

मैं यह भी भूल गया कि तुम मुझमें हो

और मैं तुममें।

इतना ही नहीं,

मुझे तो यह भी याद नहीं कि मैंने कब,

आखिर कब पहली बार तुम्हें ब्रश करने को कहा था,

कब पहली बार मैंने तुम्हें ड्रेस पहनने में मदद की थी,

कब पहली बार तुम्हें स्कूल बस में चढ़ाया था,

कब पहली बार हम दोनों

साथ-साथ पार्क में घूमने गए थे

और मेरी उँगलियाँ पकड़

तुम हरी घास पर घूमी थी।

तुम्हें अकेले-अकेले बढ़ना पड़ा,

क्योंकि मैं और मेरी भावनाएँ,

मेरी संवेदनाएँ पश्चिमी हवाओं के असर में थी?

जहां कोलाहल में भी सन्नाटा था,

आज मैं इसे दिल की गहराईयों से स्वीकार करता हूँ।

स्कूल के पहले दिन भी मैं तुम्हारे साथ नहीं था,

तुम्हारे पहले फुटबाल मैच में,

तुम्हारी पहली हैलोवीन परेड में,

कहीं भी तो मैं तुम्हारे साथ नहीं था, बेटा।

कहानी बनती ऐसी घटनाएँ हजारों हैं।

अपनी प्राथमिकताओं को सम्बन्धों से आगे रखकर,

तुम्हारा दिल दुखाया,

स्वयं को भी दुःख दिया,

पर ये बात देर से समझ पाया।

सफलता और महत्वाकांक्षा की अंधी दौड़ में

 

मैंने क्या खोया?

यह एक वर्ष पहले ही समझ पाया,

जब मैंने तुमसे पूछा था,

याद करो, बेटा तुमने क्या-क्या खोया

जब मैं तुम्हारे पास नहीं था”

तुमने कहा, “पापा, रूको। अभी आती हूँ।”

तुम जब अपने कमरे से बाहर आई,

तुम्हारे हाथों में एक कागज था,

यह 22 घटनाओं की सूची थी।

यह मेरी तथाकथित प्रतिबद्धताओं में खोया

हम दोनों का अनमोल पल था।

निश्चय ही यह खतरे की घंटी थी

और प्रत्येक छूटा अवसर

मेरे भीतर तूफान का सबब था

सम्बन्धों के तार उलझकर रह गए थे,

प्यार का ताना-बाना बिखर गया था।

इसका दोषी मैं हूँ

क्योंकि महत्वाकांक्षा की अंधी दौड़ में

मैं पीछे मुड़कर देख ही नहीं पाया,

नहीं देख पाया

मैंने क्या खोया, क्या पाया।