Wednesday, March 30, 2011

सागर से सागर तक

सागर से सागर तक


तेरी हुंकार भरती लहरें 
तट से टकरा कर लौटते हुए 
खुद में समा रही हैं 
क्षितिज के पार तक विस्तार पा रही हैं 
जीवन-सच बता रही है. 
सूरज की किरणे सागर जगा रही है, 
बादल बना रही हैं, 
धरती इशारे से 
उन्हें अपने घर बुला रही है, 
हरियाली का सबब बन जाने को उकसा रही है. 

बादल गरज रहे हैं, 
बिजली चमक रही है, 
बरसात आ रही है, 
रिमझिम के तराने, 
 जीवन-गीत गा रही है, 
फैला रही है उम्मीद का उजाला,
हर दिल में तमन्नाएं जगा रही है. 
 
बाधाओं को पार कर 
 जल की धाराएं नदियों का रूप ले 
अविरल बही जा रही है 
अपने ईष्ट की ओर बढ़ी जा रही हैं. 
एकबार फिर तेरी लहरों में समाकर 
एकाकार होने जा रही हैं 
 एकबार फिर लहरें हुंकार भरेंगी, 
तट से लौटकर अनंत में खो जायेंगी. 

चलता रहेगा सदा 
यह सर्जना चक्र मेरे बाहर, 
 मेरे भीतर 
 एक अंतहीन द्वंद्व बनकर.

Wednesday, March 23, 2011

दुपट्टे की लाली

तुम्हारे दुपट्टे की लाली मे
सुबह का सूर्य बिम्बित है
उजाले का प्रथम सन्देश लेकर .

तुम्हारे रक्तिम ओठों का
मूक आमंत्रण
मेरे जीवन का सार ,
प्रगति का आधार है.

सूरज सा लगता है
तुम्हारा साथ,
निराशा में भी करती है
आशा का संचार.

तुम्हारे होने मात्र से ही
रौशन है
हमारा दिन,
हमारी रात,
तुममें ही समाया है
हमारा पूरा संसार.

तुम हो
तो दिन हमारा है,
रात हमारी है,
आसमान में टंगा सूरज,
चाँद हमारा है,
सारी दिशाएं,
हमारी है .

जरूरत है तो बस
उन्हें उगते-डूबते,
डूबते-उगते
देखते रहने की,
समझते रहने का
उनसे आता पैगाम
तुम्हारे सहारे .

Thursday, March 3, 2011

रिश्तों का मर्म समझना है तो ..........

रिश्तों का मर्म समझना है
तो कवि हो जाओ.
फैलाना हो उजाला
अँधेरे के उसपार
तो रवि हो जाओ.
किसी बेचैन मन को
देना हो करार
तो शीतल शशि हो जाओ,
गर जानना चाहो
जल की जात
तो जलपरी हो जाओ.
रिश्तों का मर्म समझना है
तो कवि हो जाओ.

लाली देखनी हो
तो करो
उगते सूरज की बात,
गर देखना हो
हरियाली का असर
तो रेगिस्तान में
एक पौधा लगा आओ.
रिश्तों का मर्म समझना है
तो कवि हो जाओ.

समझाना चाहो
गति जीवन की
तो नदी हो जाओ,
समाना चाहो
सबको अपने भीतर
तो समंदर से अनंत हो जाओ,
रिश्तों का मर्म समझना है
तो कवि हो जाओ.

बसना है
किसी के दिल में
तो कोई दर्द-भरा गीत
बन जाओ.
रहना चाहो
किसी की आँखों में
तो एक सुदर सी छवि
बन जाओ.
रिश्तों का मर्म समझना है
तो कवि हो जाओ.

जो चाहो लेना
छांव का आनंद
तो छिप जाओ
मां के आँचल में,
जेठ की दोपहरी में
घने बरगद के तले
आ जाओ .
रिश्तों का मर्म समझना है
तो कवि हो जाओ.

गर लेना है
मौसम का मजा
तो मत घबराओ
कड़कती बिजलियों से,
गरजते मेघों से
सावन की झड़ी में
खो जाओ.
रिश्तों का मर्म समझना है
तो कवि हो जाओ.

महकना है तो महको
औरों केलिये
फूल बनकर,
जीना है तो जियो
जीवन-भर
बाग का माली बनकर
जीवन को दिशा,
एक नया अर्थ दे जाओ
रिश्तों का मर्म समझना है
तो कवि हो जाओ.

Monday, February 21, 2011

आने दो वसंत

आज
हर तरफ सूखा है,
भीतर-बाहर
सब कुछ रुखा-रुखा है
बादल भी हो रहे हैं सफ़ेद.

इंसानों की कौन कहे
बिगड़ी हुई है
प्रकृति की भी चाल
पेड़ों ने भी नहीं ओढ़ी है
अभीतक
हरे पत्तों की शाल,
उतरा हुआ है
खेतों का भी रंग,
कुछ ठीक सा नहीं लगता,
समय का रंग-ढंग.

एकबार फिर
आने दो वसंत
चारो ओर
चहकने दो चिड़ियों को
डाली-डाली,
नदियों को
कल-कल बह जाने दो,
झरनों को
झर-झर झर जाने दो,
खेतों में खिल जाने दो
सरसों के पीले फूल.

चुन लेने दो
तितलियों को
मनचाहे फूल,
भवरों को
झूम लेने दो
पीकर मकरंद,
बिछ जाने दो
हरियाली की चादर
चारो ओर
बह लेने दो
एकबार फिर
मंद-मंद
सिहरन भरा समीर,
घुल जाने
दो हवाओं में भंग,
छा जाने दो
चतुर्दिक उमंग.

शेमल के फूलों से
चुरा कर रंग लाल
बना लो गुलाल,
खेलो होली
एक-दूजे के संग.
रंग दो
मन का कोना-कोना,
अंग-अंग.

दो रिश्तों को
नया जीवन,
वसंत को आने दो
बार-बार,बार-बार,
लगातार,
सबकुछ
वासंती हो जाने दो.

Tuesday, February 1, 2011

एक अनुभव

एकबार
जब तुम बहुत बीमार थे,
हम बिलकुल लाचार थे,
काटे नहीं कटता था
समय,
रातें लगती थी
सागर से गहरी,
दिन लगते थे
पहाड़ से.

तब हमने
हजार-हजार पलों में
बाँट लिए थे
अपने दिन,अपनी रातें,
हर पल में
निराशा एक वृत्त था,
आशा उसका केंद्र .

तुम्हारे लिए
क्रंदन और किलकारी
एक-दूसरे का
रहा होगा पर्याय,
रहे होंगे
जिंदगी और मौत
एक सिक्के को दो पहलू .

हमारे लिए तो यह
पल-पल जी गई मौत थी
आशंका और अवसाद भरी,
धडकनों की रफ़्तार में
हर कतरा खून था
सिहरा हुआ,
सिमटा हुआ.

पाकर तुम्हें
खोना नहीं चाहते थे हम,
असहाय से कभी तुम्हें ,
कभी आसमान की ओर.....
देखते थे हम.

हमारे पास
नदी के बीच डगमगाती
उम्मीद की नाव तो थी,
भरोसे की पतवार नहीं थी.

हमारी हर आस टिकी थी
उन अनजान थपेड़ों पर
जो मंझधार से बढ़ रही थी
किनारे की ओर.............

(हर किसी के जीवन में कभी न कभी ऐसा पल आता है)

Sunday, January 16, 2011

मैं कब क्या होता हूँ ?

मैं
कभी बुद्ध,
कभी ईसा ,
कभी गाँधी,
होता हूँ,
तो कभी
महज एक दंगाई,
एक आतंकवादी.

कभी
अपने चारो ओर
खड़ी करता हूँ
नफरत की दीवार,
कभी करता हूँ
शांति-पथ की तलाश.

मैं
एक ही पल में
कभी हिन्दू होता हूँ ,
कभी सिख,कभी ईसाई,
कभी जीता हूँ
मुसलमां बनकर.

एक-दूसरे को मारते हुए
हैवान बनकर,
एक-दूसरे को बचाते हुए
इन्सान बनकर.

मैं
अबतक
नहीं समझ पाया
कभी मानव,महा-मानव,
कभी दानव,महा-दानव
क्यों हो जाता हूँ,
कैसे हो जाता हूँ ?

Thursday, January 13, 2011

दूसरा किनारा

एक किनारा छोड़
दूसरे किनारे
आ गया हूँ मैं,
तुझे अपनाकर
किसी को पीछे
छोड़ आया हूँ मैं.

जुड़ गया हूँ
परम्पराओं से,
रश्मों-रिवाजों से
तुम्हें पाकर,

पर,आज भी
पूरी तरह
अतीत से नाता
नहीं तोड़ पाया हूँ मैं.

अब तो बस
तुम हो,मैं हूँ
हम बनकर
और साथ हैं
कुछ भूली-बिसरी बातें
परछाई बनकर .

नहीं कह सकता
क्यों चाहने लगा हूँ
तुम्हें इतना,
समझने लगा हूँ
हिस्सा अपना
धीरे-धीरे,

फ़िरभी
क्यों लगता है
कभी-कभी
मन का कोई कोना
सूना-सूना
उसके बिना.

जब-जब
देखता हूँ
पीछे मुड़कर ,
लगता है
पाकर भी
बहुत कुछ खोया है
मैंने अपना.

पहला सपना,
पहला प्यार
जो आज भी
यादों की लहर बनकर
लौटता है बार-बार,
तुम तक आकर
लौट जाता है,
मेरे भीतर
अजब सी
एक टीस छोड़कर.

सच कहूँ तो अब
मुश्किल लगता है
पल-भर भी जीना
तेरे बिना .

तुम साथ रहो,
मेरे पास रहो
अपना बनकर,
उसे रहने दो
दिल के किसी कोने में
मेरा अतीत,
मेरा सपना बनकर
और
देदो मुझे
मेरे द्वंद्व से मुक्ति.