Monday, May 10, 2010

एक सिपाही का निवेदन

साहब जी
सेंसिटिव जगहों पर
कैमरा मत
लगवाना,
अगर भूल से
लगवा भी दिया
सुरक्षा कारणों
का हवाला देकर
तो ऐसे संवेदनशील
जगहों पर
हमारी ड्यूटी
मत लगाना.
कैमरा लगा नहीं की
क्रिमिनलों की
शामत आ जाएगी.
सारी चोरियां ,
हमारी सीनाजोरियां
पकड़ी जाएँगी ,
सारे गुंडे
पकड़े जायेंगे ,
हमारा धंधा
चौपट हो जायेगा ,
हम बर्बाद हो जायेंगे ,
हमारे बच्चे
सड़कों पर आ जायेंगे.
साहब,
एक बार फिर सोच लो
हफ्ते की मार से
आप भी
उबर नहीं पाओगे .
इसलिए कहता हूँ
जैसे चल रहा है
चलने दो ,
अपने पेट पर लात
और पैरों पर
कुल्हाड़ी मत मारो
भूलकर भी
कैमरा मत लगवाओ ,
ये मेरा निवेदन है .

Thursday, May 6, 2010

दिल्ली

आते-जाते
रोज
मैं देखा करता था
एक नन्ही सी बच्ची को
अपने झोपड़े के आगे
खेलते हुए
गली के बच्चों के साथ.
प्लाट में बहते
नालों की तरह
बहती रहती थी
उसकी नाक,
सर के बाल
थे बेहद उलझे-उलझे से ,
उनींदी आखों में
भरी होती थी कीच
और
मेमने की तरह
लगा रही होती थी
वह दौड़
आस-पास के खेतों में,
खलिहानों में,
कच्ची-पक्की,
धूलभरी सडकों पर
बिना किसी चिंता,
बिना किसी भय.

बहुत दिनों बाद
आज जब मैं
एकबार फिर
गुजरा उधर से
तो
झोपड़े की जगह
एक भव्य मकान
खड़ा पाया.
हर तरफ
पक्की सड़कें,
पक्की नालियाँ,
बिजली के खम्भे
और
घर के बाहर
एक बेहद खूबसूरत
युवती को खड़ा पाया .
उसे देखकर
मैं सोच में पड़ गया ......
वह बच्ची कहाँ है?
कहाँ है वह झोपड़ा ?
तभी एक सुरीली आवाज से
मेरी तन्द्रा टूटी:
"मुझे पहचाना नहीं,अंकल,
मैं वही झोपड़ेवाली दिल्ली"

Wednesday, May 5, 2010

प्रदूषण (बचपन के नाम )

तन भी दूषित,
मन भी दूषित 
 दूषित ये जग सारा है 
 भोजन-पानी हवा भी दूषित 
 दूषित स्वास्थ्य हमारा है 

 किया-धरा यह नहीं और का 
सारा दोष हमारा है 
 अगर आज भी हम ना संभले 
 समय हाथ से जाएगा 
 हो जायेगा नष्ट यहाँ सब \
कुछ भी ना बच पायेगा 

 आओ मिल संकल्प करें अब 
 कचरा नहीं फैलायेंगे 
 प्रदूषण दूर भगायेंगे 
 स्वस्थ समाज बनायेंगे

कवि

मछुआरा
बन
बुनता हूँ जाल
पूरी तन्मयता से
शब्दों के
मजबूत धागों से
ताकि जा सकूँ
अपनी छोटी सी नाव ले
गहरे समुद्र में
मुंह अँधेरे
सुबह-सबेरे
और
पकड़ सकूँ
स्वतंत्र विचरण करती
ढेर सारी
मछलियाँ ,
देख सकूँ
जाल में
अपने
उनकी तड़प,
या फिर
बन जाऊं
बागबां
बागों से
चुनूं फूल
गूंथ-गूंथ कर
बनाऊं
एक माला
अदृश्य खुशबुओं
से भरी
और
जान लूं
काव्य सृजन का
राज
और
सहेज कर रख लूं
उन्हें
अपने मन-आँगन में.

आनंद की अनुभूति

जब
हम मिले
पहली बार
संबंधों की नीवं पड़ी ,
रोपा गया
प्रेम-बीज
आँगन में
और
होने लगी
आनंद की बरसात.

समय
आगे बढ़ा
बीज
पौधा बना ,
बढ़ता गया,बढ़ता गया
और
एकदिन
बन बैठा
हरा-भरा
बटवृक्ष
प्रेम का
फिर
बह चली
आनंद-धार
सागर की ओर
क्षितिज के पार
जहाँ मिलते हैं
धरती और आकाश
और
पा गयी
एक अंतहीन विस्तार
जीवन सा .

गाँव की सड़क

बचपन में
जब पिताजी की
उँगलियाँ पकड़े
जाता था अपने गावं
तो देखता था
टूटी सी खाट पर
लेटे हुए
बुढिया दादी की तरह
अपनी
जानी-पहचानी
सड़क को
पूरी तरह जीर्ण-शीर्ण
कृशकाय ,
कातर निगाहों से
निहारते
अपने शरीर में पड़े
अनगिन
छालों को
जो समय ने
दिए थे उसे ।

आज भी मैं
अपने बच्चों की बाहें थामे
जाता हूँ
अपने गावं
उसी सड़क पर चलकर ।
आज भी वह
वैसे ही पड़ी है
छालों से बने
अपने घावों को
सहलाती

और
कर रही है
इन्तजार
किसी के आने का
जो
उसकी जवानी
भले ही न लौटाए
पर उसके घावों पर
मरहम तो लगा जाये,
उसकी साँसों को
कुछ उम्र तो दे जाए ।

Tuesday, May 4, 2010

सबेरा होनेवाला है

जब
मस्जिदों में होती
पहली अजान
समझ लेती मैं कि सबेरा होनेवाला है ।

जब वातावरण में
मंदिर के घंटे का स्वर
होता गुंजायमान
समझ लेती मैं कि सबेरा होनेवाला है ।

जब सुनाई देती
कोयल कि कूक
पक्षियों के कलरव के बीच
समझ लेती मैं कि सबेरा होनेवाला है ।

जब कानों तक आती
मां की
ममता-भरी आवाज
समझ लेती मैं कि सबेरा होनेवाला है ।

कुछ पल बाद जब गालों पर होता
पापा के स्नेहिल हाथों का स्पर्श
समझ लेती मैं कि सबेरा होनेवाला है ।

जब रसोई से आने लगती
बर्तनों के खड़कने की आवाज
समझ लेती मैं कि सबेरा होनेवाला है ।

जब पूरब हो जाता सिन्दूरी लाल
और धरती पर फैलने लगता प्रकाश
समझ लेती मैं कि सबेरा होनेवाला है ।