Monday, May 16, 2011

रिश्तों का असर

आज
सत्तर से ऊपर के हैं बाबूजी,
पहले जैसा नहीं रहा है शरीर,
उन्हें होने लगी है जरूरत
सहारे की
चाहे लाठी की हो
या हमारे कन्धों की.

पर,
आज भी जब होती है
किसी अपने से मिलने जाने की बात
छोटे बच्चे की तरह
मचल उठते हैं बाबूजी,
व्यग्र हो उठता है उनका मन
क्योंकि रिश्तों में ही जिए,
रिश्तों के लिए ही जिए हैं
सब दिन बाबूजी.

लाठी के सहारे ही सही
आज भी रिश्तों के करीब तक
चलकर जाना चाहते है बाबूजी.
चढ़ लेना चाहते हैं ऊँची सीढियाँ
हमारे कन्धों का सहारा ले
बिना उफ़ किये ये सोचकर
"कोई अपना बैठा है
उन ऊँचाइयों पर".

आज भी याद आता है
बचपन का वो दिन
जब बाबूजी की ऊँगली पकड़,
उनके कंधे पर चढ़
जाया करते थे रिश्तेदारी में
पूरे उत्साह से,
हो जाते थे अभिभूत
उनके अपनेपन से ,
भर आती थी आँखें
पाकर ढेर सारा स्नेह,
ढेर सारा प्यार.

आज
वे हमारी उंगली पकड़,
कंधे का सहारा ले
जब थाम लेना चाहते हैं
रिश्तों की डोर,
तय कर लेना चाहते है
जीवन का सफ़र
तो समझ पा रहे है हम
जीवन में रिश्तों का महत्व,
जीवन पर उसका असर,
मंझधार में
पतवार के संग
कश्ती का सफ़र.

25 comments:

  1. भावुक कर गई आपकी यह रचना...

    ReplyDelete
  2. भावनाओं के गोते लगवाए आपनें

    मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति!!

    ReplyDelete
  3. बहुत सुंदर , ये रिश्तों का सफर क्या हम आज यों ही देख पा रहे हैं. वे बाबूजी जिन्होंने हमें अंगुली पकड़ कर चलना सिखाया और कंधे पर बिठा कर साथ ले जाना दिखाया. हम ऐसा कर पा रहे हैं. हम अपने ही खून के रिश्तों में कटुता का जहर घोल रहे हैं . अब बाबूजी नहीं हमें अपने बच्चे नजर आते हैं यह भूल कर कि वे भी अपने ही बच्चों को ही तो दुलराते थे और उनके बच्चे हम ही हैं न. जिनके पास दुलराने तो क्या उनके सुख और दुःख पूछने का वक्त नहीं है.

    ReplyDelete
  4. यही होती है चाह जिससे हर किसी को गुजरना है एक दिन्………रिश्तो का असर मन पर ही ज्यादा करता है।

    ReplyDelete
  5. लाठी के सहारे ही सही
    आज भी रिश्तों के करीब तक
    चलकर जाना चाहते है बाबूजी.
    चढ़ लेना चाहते हैं ऊँची सीढियाँ
    हमारे कन्धों का सहारा ले
    बिना उफ़ किये ये सोचकर
    "कोई अपना बैठा है
    उन ऊँचाइयों पर".
    yahi vishwaas ragon mein daud jijivisha banta hai

    ReplyDelete
  6. अपनों पर विश्वास की डोर से आगे बढते रिश्तो को बहुत खूबी से व्यक्त किया है आपने
    बहुत खूब...

    ReplyDelete
  7. बहुत ही भावपूर्ण रचना...बहुत कुछ याद दिला गई...

    ReplyDelete
  8. भावुक कर गई आपकी यह मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति|धन्यवाद|

    ReplyDelete
  9. bahut hi marmik parastuti.....thanks.

    ReplyDelete
  10. हृदयस्पर्शी रचना।

    ReplyDelete
  11. एक संवेदनशील कवि की संवेदनशील रचना...

    ReplyDelete
  12. jeevan darpan...bahut sundar rachna...

    ReplyDelete
  13. काश हम पुरानी बातें याद कर वर्तमान के साथ न्याय कर पायें।

    ReplyDelete
  14. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 17 - 05 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.blogspot.com/

    ReplyDelete
  15. एक हृदयस्पर्शी रचना।

    ReplyDelete
  16. अत्यंत कोमल भाव और हृदय को छू लेने वाली रचना

    ReplyDelete
  17. दिल को छू गयी आपकी रचना ... सच में रिश्तों का बहुत महत्व है जीवन में और इसे समझने की ज़रूरत है ...

    ReplyDelete
  18. दिल को छूने वाली एक हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति!!

    ReplyDelete
  19. संवेदनशील,मर्मस्पर्शी रचना. मनोभावों कि बेहतरीन अभिव्यक्ति.
    आभार

    ReplyDelete
  20. भावमय करते शब्‍द ...

    बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

    ReplyDelete
  21. "जीवन में रिश्तों का महत्व,
    जीवन पर उसका असर,
    मंझधार में
    पतवार के संग
    कश्ती का सफ़र. "

    बुजुर्गों का इतना भी संस्कार हम में आ जाए
    रिश्तों की कद्र,उनका महत्त्व उनकी मर्यादा...
    और शायद हम यही भूलते जा रहे हैं !!

    ReplyDelete
  22. तो समझ पा रहे है हम
    जीवन में रिश्तों का महत्व,
    जीवन पर उसका असर,
    मंझधार में
    पतवार के संग
    कश्ती का सफ़र.

    रिश्तों की अहमियत को ख़ूबसूरती से ब्यान किया है आपने.
    बहुत ही खूब.

    ReplyDelete
  23. दिल की गहराई से लिखी बहुत ही भावनात्मक प्रस्तुति |

    ReplyDelete
  24. आज
    वे हमारी उंगली पकड़,
    कंधे का सहारा ले
    जब थाम लेना चाहते हैं
    रिश्तों की डोर,
    तय कर लेना चाहते है
    जीवन का सफ़र
    तो समझ पा रहे है हम
    जीवन में रिश्तों का महत्व,
    जीवन पर उसका असर,
    मंझधार में
    पतवार के संग
    कश्ती का सफ़र.
    ..
    kam se kam aap samajh to paa rahe hain...adhikansh to in samvednaon tak pahunch hi nahi paate ....sundar chitran !

    ReplyDelete
  25. मृदुला हर्षवर्धन

    "bahut hi marmik abhivyakti hai Rajiv ji"

    ReplyDelete