Thursday, May 26, 2011

"नई प्रथाएं"

आज अचानक
जब मेरे बेटे ने कहा
"पापा,एक बात कहना चाहता हूँ,
मैं अपने पसंद की लड़की से
शादी करना चाहता हूँ"-
एकबारगी तो लगा
जैसे आ गया हो भूचाल,
खिसक गई हो
पावों तले से जमीन,.
पत्नी के चेहरे पर भी
उड़ रही थी हवाई,
एक बार को तो मैं भी
आ गया था सकते में ,
विचारों की श्रंखला भी
हो गई थी छिन्न-भिन्न .

लेकिन जैसे-तैसे
मैं वर्तमान से बाहर आया,
अतीत का दरवाजा खटखटाया
तो यादों ने झट से खोल दिए द्वार.
दिखलाया 25 साल पहले का मंजर,
जब मेरी बातें बनी थी खंजर ,
मां के पैरों तले से
ऐसे ही खिसकी थी जमीन.

देकर प्रथाओं का वास्ता,
दिखाकर ज़माने का डर ,
खींचकर भविष्य की भयावह तस्वीर
मुझे डराया था,
सारा उंच-नीच समझाया था.
खा बैठी थी कसम
जीते जी ऐसा न होने देने की.

आज
एकबार फिर
मेरा अतीत
मेरे सामने खड़ा है.
एकबार फिर एक मां
पडी है उलझन में:
समाज की उंगली पकड़कर चले
या फिर थाम ले समय का हाथ
जो कहीं-न-कहीं बंधें हैं
कई-कई प्रथाओं से,
या फिर बनने दे
नई प्रथाएं....

27 comments:

  1. सुन्दर रचना .....सुलगता प्रश्न

    कुछ तो निर्णय लेना ही होगा .....बच्चों के पक्ष में फैसला हो तो अच्छा है क्योंकि हम जिस परम्परा से दो चार हो चुके हैं , उसका सही समाधान भी हमें ही तो करना है |

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  2. वक्त के साथ प्रथायें बदलती ही हैं और उन्हे बदलना भी चाहिये नही तो समाज से अलग थलग पड जाता है इंसान्।

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  3. आगे बढ़ती परम्‍पराएं, खुद को दुहराता इतिहास.

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  4. मुझे विश्वास है
    तुम ऐसा कुछ नहीं होने दोगे
    जिससे वही अतीत एक बार फिर
    आकर खड़ा हो
    तुम्हारे बेटे के सामने
    जिसने घोंपा था खंजर
    तुम्हारे सीने में
    डराया था तुम्हे
    अपनी खुशी से जीने में
    समझाई थी तुम्हे उंच -नीच
    खीच दी थी दरारे
    अपनो के बीच
    तुम सुलझाओगे
    इस माँ की उलझन
    समझोगे उसकी व्यथाएं और
    शुरू करोगे "नई प्रथाएं"

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  5. बहुत सुन्दर कविता.. मन के द्वन्द और पीढ़ियों के संक्रमण काल की बेहतरीन कविता है यह.. बहुत सुन्दर ....

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  6. पीढ़ियों का यह द्वंद्व हमेशा चलता रहता है ...
    राह भी निकलती है , नयी प्रथाएं भी बनती हैं ...कुछ उथल पुथल के बाद !

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  7. @ vani geet ji se sehmat hoon
    पीढ़ियों का यह द्वंद्व हमेशा चलता रहता है ...

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  8. दो पीढ़ियों के बीच सोच और विचारों का अंतर हमेशा चलता रहा है..गनीमत है कि उसने शादी से पहले अपने माता पिता को बताया तो सही, वरना आजकल बिना बताए शादी करने के बाद माता पिता से अपनी पत्नी का परिचय कराना भी नयी बात नहीं रही..बहुत सुन्दर प्रस्तुति..

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  9. mini seth to me

    bahut sahi chitran kiya hai apne......jaroot hai sahi sooch ki...age
    badhne ki

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  10. वक्त के साथ कदमताल करिये...बदलने दिजिये प्रथायें..आप भी तो खोजते ही...उसी ने खोज ली...कम से कम पसंद तो उसकी है.


    अच्छी रचना.

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  11. नयी प्रथा बने, बिना व्यथा बने।

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  12. अतीत की यही व्यथा है
    की ये लौट कर सामने आता जरुर है

    बहुत सुंदर कविता

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  13. समाज की उंगली पकड़कर चले
    या फिर थाम ले समय का हाथ
    जो कहीं-न-कहीं बंधें हैं
    कई-कई प्रथाओं से,
    या फिर बनने दे
    नई प्रथाएं....

    सुंदर सामाजिक सरोकार. यह द्विविधा सबको किसी ना किसी समय मुश्किल में जरूर डालती है.

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  14. बनने दे नई प्रथाएं.... :-) badi sunder rachna!

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  15. बहुत बहुत प्रभावशाली और सटीक ढंग से आपने विषय को रखा है आपनी इस कविता में...

    हर अभिभावक को लगता है उसका बच्चा नादाँ है,गलत कर रहा है और हर संतान सोचती है कि उसके अभिभावक उसे समझ नहीं पा रहे,समय से बहुत पीछे हैं...

    यह सिलसिला शायद ही कभी कभी टूटता है...

    बहुत सुन्दर मनोविश्लेषण किया है आपने...बहुत ही सुन्दर रचना....

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  16. ऐसे में फैसले बहुत सोच समझ कर लेने होते हैं.

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  17. Dr.Danda Lakhnavi to me

    yathart kaa sahee chitran kiyaa hai

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  18. archana thakur to me


    bahut bahut achhi lagi

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  19. Rekha Srivastava to me
    राजीव भाई ,
    (कमेन्ट बॉक्स नहीं खुल रहा है मेरा कमेन्ट अगर डाल दें तो बहुत अच्छा होगा.)
    'इन प्रथाओं को लड़ कर
    हम जीते रहे,
    कई बार रख कर पत्थर
    हम वक्त के साथ
    मन मार कर चलाते रहे.
    अब उस मजबूरी से
    इस पीढ़ी को
    मुक्त कर दें.
    उन्हें जीने दें
    अपनी खुशियों के साथ.
    जो हमने खोया
    उन्हें पाने दें.'

    प्रथाएं धेरे धीरे बदलती हैं और फिर वे समान्य मान ली जाती हैं. हम ने बचपन में साईकिल भी मांगी तो बड़े मुश्किल से मिली ,लेकिन आज बच्चों को बाइक और कार खरीद कर दे रहे हैं. फिर और बातों में पीछे क्यों?

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  20. समय के साथ बदलना चाहिए और समाज बदल भी रहा है तो क्यूं न हम भी बदलें...

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  21. बन जाने दो नई प्रथा ........कम से कम आने वाले वक़्त में उसकी यादे उसे आ आ कर परेशान नहीं करेगी

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  22. आपकी वर्तमान कविता तो पीढ़ियों के बीच 'संस्कार के संक्रमण' की कविता है.. सतह से तो मामूली दिख रही है लेकिन यदि कविता के अंतर्वस्तु में हम जाएँ तो कविता में जो द्वन्द उपज रहा है वह दो पीढ़ियों के समय, काल, परिवेश, संस्कृति, मान्यताओं और वैल्यू सिस्टम को परिभाषित कर रही है.. रेखांकित कर रही है.

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  23. Mark Rai to me

    very nice...........

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  24. artijha jha to me

    "....bahut achhi lagi apki kabita,ya kahani padhke....namaste".

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  25. Akshay Singh to me

    "Kavita to achhi hai par chhupe-rustam ye to bata,
    Kaun Thi wo?

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  26. nayee prathaye bana kar hi purani prathayon ko hataya ja sakta hai...jo takleef aapne sahi vo aapke bete ko prathaon ke nam par nahi milani chahiye....intajar par aapka comment yad aa gaya aaj....

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