तुमसे मिलकर जाना
क्या होती है
मिलन की चाह,
विरह की आग.
तुमसे मिलकर जाना
क्यों मीठी लगती है
सूरज की आंच
जब तुम होते हो साथ,
क्यों जलाती है
चाँद की शीतल चाँदनी,
क्यों लग जाती है
सावन में आग
मेरे तन-मन में
जब तुम नहीं होते हो पास..
तुमसे मिलकर जाना
क्यों उठाती है मन में हूक
कोयल की मीठी कूक.
क्यों होता है
पपीहे की आवाज में
इतना दर्द
तुमसे मिलकर जाना
क्यों छा जाती हैं
काली घटाएं
क्यों बरसने लगते हैं मेघ,
क्यों छलक पड़ती हैं आँखें
तेरे आने के बाद,
तेरे जाने के बाद.
तुमसे मिलकर जाना
क्यों नहीं सताता सावन,
समय नहीं दे पाता
कोई संताप.
क्यों लहराता है
तेरी आँखों में
समंदर प्यार का .
तुमसे मिलकर जाना
कैसा है ये मर्ज,
क्या है इसकी दवा ?
Dil Ka Aashiyana Where Every Relation has Its Relavance,Every Individual has his Place.Humanity Reigns Supreme.
Sunday, May 15, 2011
Tuesday, May 10, 2011
समय करता था इन्तजार......
जब भी तुम
होती थी मेरे पास,
दरवाजे के बाहर खड़ा रहकर
समय करता था इंतजार
तुम्हारे बाहर आने का.
तुम्हारे बाहर आते ही
चला जाता था वह
मुस्कुराता हुआ
तुम्हारे साथ.
मैं करता रहता था
बेसब्री से इन्तजार
तेरे लौट आने का,
समय के ठहर जाने का.
जो तुम होती थी साथ
समय समा जाता था तुझमें.
घंटा गुजर जाता था
पल बनकर ,
बस तुम-ही-तुम होती थी
आस-पास,
कोई और नहीं होता था.
आज
मेरे पास नहीं हो तुम
साथ हैं बस तुम्हारी यादें
जिन्हें बांहों में भरकर
छू लेता हूँ तुम्हें,
कर लेता हूँ
तुमसे दो-चार बातें.
आज भी
समझ से परे है
क्यों पाकर तेरा साथ
सदियाँ बीतती रही
पल बनकर,
तुम्हारे न होने पर
समय पाता रहा
अनंत विस्तार.
क्या यही था
मिलन और जुदाई का खेल
जो समय खेलता रहा हमारे साथ,
और हम खेलते रहे
समय के साथ
सालों-साल.
होती थी मेरे पास,
दरवाजे के बाहर खड़ा रहकर
समय करता था इंतजार
तुम्हारे बाहर आने का.
तुम्हारे बाहर आते ही
चला जाता था वह
मुस्कुराता हुआ
तुम्हारे साथ.
मैं करता रहता था
बेसब्री से इन्तजार
तेरे लौट आने का,
समय के ठहर जाने का.
जो तुम होती थी साथ
समय समा जाता था तुझमें.
घंटा गुजर जाता था
पल बनकर ,
बस तुम-ही-तुम होती थी
आस-पास,
कोई और नहीं होता था.
आज
मेरे पास नहीं हो तुम
साथ हैं बस तुम्हारी यादें
जिन्हें बांहों में भरकर
छू लेता हूँ तुम्हें,
कर लेता हूँ
तुमसे दो-चार बातें.
आज भी
समझ से परे है
क्यों पाकर तेरा साथ
सदियाँ बीतती रही
पल बनकर,
तुम्हारे न होने पर
समय पाता रहा
अनंत विस्तार.
क्या यही था
मिलन और जुदाई का खेल
जो समय खेलता रहा हमारे साथ,
और हम खेलते रहे
समय के साथ
सालों-साल.
Saturday, April 30, 2011
सुमित्रानंदन पन्त
सुमित्रानंदन पंत
समय का सांसारिक आघात,
अपनेपन का आभाव,
जीवन का अकेलापन,
जब नहीं भाया उसे
मानव-संसार
जहाँ होता रहता था सदा
एक-दूसरे पर घात-प्रतिघात,
दर्द जब होने लगा
असह्य,अनंत
इन सबसे पाने को पार
चले गए तुम
प्रकृति के द्वार.
जहाँ
हरियाली ओढ़े जंगल था,
हिमाच्छादित पर्वतराज,
झरने झर-झर गाते रहते,
गीत मिलन के सारी रात.
फूलों में मकरंद भरा था,
जीवन में आनंद भरा था,
कांटे भी उगते थे वन में,
पर कोमलता होती थी मन.
जंगल का साम्यवादी संसार,
पादप-पुष्प,झरने,नदी,पहाड़,
सूरज,चाँद,सितारे
बसे हुए थे उनके उर में.
खग-वृन्द भी करते थे संवाद
तितलियाँ उड़-उड़ आती थी,
बैठकर उड़ जाती थी
मनचाहे फूलों पर,
भंवरे भी मंडराते थे,
लेकर पराग उड़ जाते थे.
जंगल के सब जीव भले थे
लगता था एक कोख पले थे.
सबसे सबका सरोकार यहाँ था
जीवन का आधार यहाँ था,
जीवन मूल्य यहाँ पलता था
जीवन-यज्ञ सदा चलता था.
यहाँ मिली
मातृत्व की छांव,
शाश्वत स्नेह,
निश्छल प्यार,
देवकी नहीं मिली तो क्या ?
प्रकृति रही सदा उनके साथ
यशोदा बनकर,
बांहों के हिंडोले पर
झुलाती रही उनका बालपन,
सहलाती रही उनके कोमल गात,
आहत मन को देती रही सहारा,
बहलाती रही उनका बालमन
दूर भगाती रही अकेलापन.
प्रकृति को तन-मन कर अर्पण
जिए सदा बन प्रकृति-दर्पण .
Tuesday, April 26, 2011
"खोखले हो रहे हैं शब्द"
खोखले हो रहे हैं शब्द,
इन्सान हो या शहर
सब खो रहे हैं अपना अर्थ,
अपना असर.
कोई नहीं दिखता है
अपने नाम सा,
कोई नहीं दिखता
किसी काम का.
शब्द हैं असहाय,
नहीं झांक पाते अपने भीतर
सूर और तुलसी बनकर,
नहीं दे पाते
प्रेम और भक्ति का सन्देश
राधा और मीरा बनकर.
शब्द
जो गढ़ा गया था कभी
जीवन के लिए,
प्यार के लिए,
नहीं रह गया है
भावों का,
विचारों का वाहक़ ,
नहीं रह गया है
अभिव्यक्ति की आजादी का प्रतीक,
हो गया है पर्याय
झूठ का,दहशत का, फरेब का,
खड़ा है आज चौराहे पर
प्रतिष्ठा का पहरुआ बनकर.
कभी खींची गई होगी
शब्दों से मर्यादा की रेखाएं
सफल ,सुखद जीवन के लिए,
पर, कहाँ बढ़ पाई
समय के साथ इसकी लम्बाई,
बनकर रह गई
प्रथाओं की लक्षमण-रेखा
जिसने भी लांघी
जलकर खाक हो गया.
आज शब्द नहीं है राम,
शब्द हो गया है रावण
शब्द हो गया है कंस,
कहीं जुए में हारता युधिष्ठिर,
कुटिल मुस्कान लिए शकुनी,
कहीं चीरहरण में व्यस्त दुशासन,
कहीं द्रौपदी की असहायता पर
ठहाके लगता दुर्योधन.
आज शब्द हो गया है
स्वतंत्र,
स्वछन्द और निरंकुश.
आज तो बस
हर तरफ शब्द है,शरीर है,
आत्माहीन,उद्देश्यहीन ...........,
चारो तरफ कोलाहल है,
महाभारत सी भीड़ है.
शब्दों में
कहीं नजर नहीं आती
उम्मीद की लाली
उगते सूरज की,
नहीं दिखती है इसमें
चाँद की शीतल चांदनी ,
बस दिखता है
घना अँधेरा चारो ओर....
अब
एकबार फिर
नए सिरे से जुटाएँगे
ढेर सारे खोखले शब्द,
भरेंगे उनमें नए भाव,नए अर्थ,
सींचेंगे उन्हें संस्कार जल से धीरे-धीरे
जीवन-मूल्य के नए पौधे उगाएंगे .
रिश्तों का सहारा देकर
बरगद सा बड़ा और छायादार बनायेंगे
इन्सान हो या शहर
सब खो रहे हैं अपना अर्थ,
अपना असर.
कोई नहीं दिखता है
अपने नाम सा,
कोई नहीं दिखता
किसी काम का.
शब्द हैं असहाय,
नहीं झांक पाते अपने भीतर
सूर और तुलसी बनकर,
नहीं दे पाते
प्रेम और भक्ति का सन्देश
राधा और मीरा बनकर.
शब्द
जो गढ़ा गया था कभी
जीवन के लिए,
प्यार के लिए,
नहीं रह गया है
भावों का,
विचारों का वाहक़ ,
नहीं रह गया है
अभिव्यक्ति की आजादी का प्रतीक,
हो गया है पर्याय
झूठ का,दहशत का, फरेब का,
खड़ा है आज चौराहे पर
प्रतिष्ठा का पहरुआ बनकर.
कभी खींची गई होगी
शब्दों से मर्यादा की रेखाएं
सफल ,सुखद जीवन के लिए,
पर, कहाँ बढ़ पाई
समय के साथ इसकी लम्बाई,
बनकर रह गई
प्रथाओं की लक्षमण-रेखा
जिसने भी लांघी
जलकर खाक हो गया.
आज शब्द नहीं है राम,
शब्द हो गया है रावण
शब्द हो गया है कंस,
कहीं जुए में हारता युधिष्ठिर,
कुटिल मुस्कान लिए शकुनी,
कहीं चीरहरण में व्यस्त दुशासन,
कहीं द्रौपदी की असहायता पर
ठहाके लगता दुर्योधन.
आज शब्द हो गया है
स्वतंत्र,
स्वछन्द और निरंकुश.
आज तो बस
हर तरफ शब्द है,शरीर है,
आत्माहीन,उद्देश्यहीन ...........,
चारो तरफ कोलाहल है,
महाभारत सी भीड़ है.
शब्दों में
कहीं नजर नहीं आती
उम्मीद की लाली
उगते सूरज की,
नहीं दिखती है इसमें
चाँद की शीतल चांदनी ,
बस दिखता है
घना अँधेरा चारो ओर....
अब
एकबार फिर
नए सिरे से जुटाएँगे
ढेर सारे खोखले शब्द,
भरेंगे उनमें नए भाव,नए अर्थ,
सींचेंगे उन्हें संस्कार जल से धीरे-धीरे
जीवन-मूल्य के नए पौधे उगाएंगे .
रिश्तों का सहारा देकर
बरगद सा बड़ा और छायादार बनायेंगे
Monday, April 18, 2011
"शब्दावली"
"मेली लानी बिटिया त्यों लोटी है,
त्या हुआ?भुखु लदी है?,
अभी तेले लिए दुधु लाती हूँ .
अब त्यों लोटी है,
मेली लानी बिटिया ?
अच्छा-अच्छा नीनी आई है,
तलो अभी तुलाती हूँ.
अच्छा तलो !
मैं तुम्हें लोली तुनाती हूँ
'चदा मामा दूल के .......' "
न जाने ऐसे ही और कितने बोल
बोलती रहती थी तुम,
कानों में मिसरी सी
घोलती रहती थी तुम,
मैं बस निहारती रहती थी
तुम्हारा चेहरा,
तुम्हारे फड़-फडाते होठ,
पढ़ती रहती थी
वहां तैरते भाव .
इन बोलों में
देखी है मैंने
छवि रचनाकार की
जिसने किया
मुझे साकार,
गढ़ लिए मेरे लिए
अनगिन शब्द,
उनमें भरे तोतले,
मीठे बोल,
दिया उन्हें नया अर्थ,
नया आयाम,
भरकर इसमें अपना स्नेह,
अपना प्यार
बना ली एक शब्दावली
अपने लिए,मेरे लिए.
सच कहूँ तो आज जब
बिटिया को लेकर गोद में
मैं स्वयं दुहरा रही हूँ
वही शब्द,
वही शब्दावली,
तो समझ पा रही हूँ
क्या होती है मां,
क्यों होती ????
मुझसे संवाद की चाहत में
रच लिया था तुमने
एक नया संसार
जहाँ बस मैं थी,तुम थी,
और था
तोतले बोलों में बसा
तुम्हारा सागर सा प्यार.
त्या हुआ?भुखु लदी है?,
अभी तेले लिए दुधु लाती हूँ .
अब त्यों लोटी है,
मेली लानी बिटिया ?
अच्छा-अच्छा नीनी आई है,
तलो अभी तुलाती हूँ.
अच्छा तलो !
मैं तुम्हें लोली तुनाती हूँ
'चदा मामा दूल के .......' "
न जाने ऐसे ही और कितने बोल
बोलती रहती थी तुम,
कानों में मिसरी सी
घोलती रहती थी तुम,
मैं बस निहारती रहती थी
तुम्हारा चेहरा,
तुम्हारे फड़-फडाते होठ,
पढ़ती रहती थी
वहां तैरते भाव .
इन बोलों में
देखी है मैंने
छवि रचनाकार की
जिसने किया
मुझे साकार,
गढ़ लिए मेरे लिए
अनगिन शब्द,
उनमें भरे तोतले,
मीठे बोल,
दिया उन्हें नया अर्थ,
नया आयाम,
भरकर इसमें अपना स्नेह,
अपना प्यार
बना ली एक शब्दावली
अपने लिए,मेरे लिए.
सच कहूँ तो आज जब
बिटिया को लेकर गोद में
मैं स्वयं दुहरा रही हूँ
वही शब्द,
वही शब्दावली,
तो समझ पा रही हूँ
क्या होती है मां,
क्यों होती ????
मुझसे संवाद की चाहत में
रच लिया था तुमने
एक नया संसार
जहाँ बस मैं थी,तुम थी,
और था
तोतले बोलों में बसा
तुम्हारा सागर सा प्यार.
Tuesday, April 12, 2011
बचपन
बचपन नहीं पहेली
दर्पण होता है मन का.
उसकी हरकतें हँसाती है,
मन को गुदगुदाती है,
हर तनाव से दूर ले जाती है.
हाँ,पहेली सी लगती है
युवा मन को उसकी बातें.
क्योंकि नहीं होता कोई फर्क
उसकी कथनी और करनी में,
उसकी खिलखिलाहट में होती है
ख़ुशी की धूप ,
क्रंदन में दुःख की छाया.
छिपाए नहीं छिपते
उसके मन के कोमल भाव,
चाहे गुस्सा हो या प्यार
चेहरे पर साफ उभर आते हैं
बचपन नहीं होता जवानी सा
जहाँ होता है भेद-भाव,
आडम्बर का अम्बार .
वह तो उठता है,गिरता है,
फिर उठता है, आगे चल पड़ता है
क्योंकि प्रकृति होती है उसके साथ.
हमारा दर्पण है
धुंधला-धुंधला,उदास-उदास,
गमजदा चेहरे पर रहता है
मुखौटा मुस्कान का,
गुस्से में भी
चेहरेसे छलकता है प्यार
जिसे कहा जाता है
सभ्य समाज में "व्यवहार".
कर्म और सोच में सदा ही रहता है भेद,
लेकिन पाखंड की चाहरदीवारी होती है अभेद
दर्पण होता है मन का.
उसकी हरकतें हँसाती है,
मन को गुदगुदाती है,
हर तनाव से दूर ले जाती है.
हाँ,पहेली सी लगती है
युवा मन को उसकी बातें.
क्योंकि नहीं होता कोई फर्क
उसकी कथनी और करनी में,
उसकी खिलखिलाहट में होती है
ख़ुशी की धूप ,
क्रंदन में दुःख की छाया.
छिपाए नहीं छिपते
उसके मन के कोमल भाव,
चाहे गुस्सा हो या प्यार
चेहरे पर साफ उभर आते हैं
बचपन नहीं होता जवानी सा
जहाँ होता है भेद-भाव,
आडम्बर का अम्बार .
वह तो उठता है,गिरता है,
फिर उठता है, आगे चल पड़ता है
क्योंकि प्रकृति होती है उसके साथ.
हमारा दर्पण है
धुंधला-धुंधला,उदास-उदास,
गमजदा चेहरे पर रहता है
मुखौटा मुस्कान का,
गुस्से में भी
चेहरेसे छलकता है प्यार
जिसे कहा जाता है
सभ्य समाज में "व्यवहार".
कर्म और सोच में सदा ही रहता है भेद,
लेकिन पाखंड की चाहरदीवारी होती है अभेद
Tuesday, April 5, 2011
"काश ! मैं बच्चा ही रहता"
काश!मैं बच्चा ही रहता
तो कितना अच्छा होता भगवान,
कम-से-कम
बना तो रहता
जिसे सब कहते हैं इन्सान,
होता सुख-दुःख के बेहद करीब
आंसू और किलकारी बनकर.
काश ! कोई कर पाता
मेरे बाल-मन से संवाद
तो समझ पाता
अपने-आपको ,
अपनी चाहत ,
अपनी परेशानी में
देख पाता
औरों की चाहत,
औरों की परेशानी.
पर
तुम कहाँ समझ पाओगे,
कहाँ देख पाओगे
मेरा पारदर्शी मन
अपने सपनों को
हमारे सपनों पर थोपकर,
कहाँ समझ पाओगे
सामाजिक सरोकारों से
दूर होते जाने का कारण .
मैं तो पूरी तरह निर्द्वंद्व,निष्कपट,
सखा-भाव का वाहक हूँ,
मां के आँचल में पलता
एक सुंदर सा स्वप्न हूँ.
कितने विवश थे
अपनी खुदी के सामने तुम ,
नहीं देख पाए
प्रकृति के संग
मेरा तारतम्य.
बस खेलते रहे चौपड़
जीवन की बिसात पर ,
चलते रहे अपनी चाल
कभी शकुनी
तो कभी युधिष्ठिर बनकर,
तैयार करते रहे
महाभारत की पृष्ठभूमि.
तो कितना अच्छा होता भगवान,
कम-से-कम
बना तो रहता
जिसे सब कहते हैं इन्सान,
होता सुख-दुःख के बेहद करीब
आंसू और किलकारी बनकर.
काश ! कोई कर पाता
मेरे बाल-मन से संवाद
तो समझ पाता
अपने-आपको ,
अपनी चाहत ,
अपनी परेशानी में
देख पाता
औरों की चाहत,
औरों की परेशानी.
पर
तुम कहाँ समझ पाओगे,
कहाँ देख पाओगे
मेरा पारदर्शी मन
अपने सपनों को
हमारे सपनों पर थोपकर,
कहाँ समझ पाओगे
सामाजिक सरोकारों से
दूर होते जाने का कारण .
मैं तो पूरी तरह निर्द्वंद्व,निष्कपट,
सखा-भाव का वाहक हूँ,
मां के आँचल में पलता
एक सुंदर सा स्वप्न हूँ.
कितने विवश थे
अपनी खुदी के सामने तुम ,
नहीं देख पाए
प्रकृति के संग
मेरा तारतम्य.
बस खेलते रहे चौपड़
जीवन की बिसात पर ,
चलते रहे अपनी चाल
कभी शकुनी
तो कभी युधिष्ठिर बनकर,
तैयार करते रहे
महाभारत की पृष्ठभूमि.
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