Monday, April 19, 2010

कवि और कविता

कविता कवि की जान है,
उसका ईमान ,
उसकी कल्पना ,
उसके मन की उडान है ।

कविता ही उसका सच ,
कविता ही उसका मान ,
कविता ही उसकी पहचान है।

कविता ही उसका इष्ट ,
कविता ईश्वर साकार ,
कविता से ही वह,
कविता उसका पर्याय ।

कविता उसका जीवन-आधार,
कविता से उसका जनाधार
कविता कहीं गंगा ,
कहीं यमुन-धार ,
कहीं निर्झर अविराम ,
कहीं गगन निराकार ।

कविता पूरनमासी का चाँद ,
कवि उसका चातक,
कवि उसका चकोर ,
कविता उमड़ता बादल ,
कवि नर्तक मयूर ।

कविता फूलों की बगिया
कवि उस बगिया का माली ,
कविता क्षितिज की लाली ,
खेतों में फैली हरियाली ,
कवि उस खुशहाली का सूत्र-धार।

कवि हर-पल एक पात्र,
कविता उसके मन की बातें ,
कविता उसकी कहानी ,
उसी की जुबानी ।

Friday, April 16, 2010

शब्द

शब्द
शरीर ,
भाव
उसका मनप्राण ।

शब्द
समेट लेते हैं
भावों को
अपने-आप में ।
समयातीत
बना देते हैं उन्हें
स्वयं में सहेजकर ।

शब्द
हैं बाँध
जो भावनाओं के असीमित प्रवाह को
बाँध लेते हैं
अपनी सीमाओं में
और
मर्यादित कर उसे
यादगार बना जाते हैं ।

शब्द
है ताजमहल ,
एक प्रेम-कहानी है
जिसमें ठहरी हुई ।

Thursday, April 15, 2010

महानगर

यहाँ की सडकें चौड़ी-चौड़ी,
अट्टालिकाएं ऊँची-ऊँची,
यहाँ पर नाले नदियों जैसे,
नदियाँ सूखी- सूखी।
लोग चलते हैं यहाँ
मगर रवानी नहीं होती,
लोग पलते हैं
मगर बचपन नहीं होता,
लोग बढ़ते हैं
मगर जवानी नहीं होती ।
लोग सोते हैं यहाँ
मगर आँखों में नींद नहीं होती ।
यहाँ बस भूख होती है ,भूख ,
प्यास से गला सूखता है ,
क्योंकि यह महानगर है,
जहाँ सन्नाटा पसरा है भीड़ में
और
एक अजनबीपन छाया है
लोगों के बीच में ।

क्यों होता है ऐसा ....

जब कभी
आ बैठता हूँ तेरे साथ
तो दिन ,महीने ,साल
एक पल में गुजर जाते हैं ।

जब कभी रहता हूँ
तुमसे दूर
पल सदियों में बदल जाते हैं ।
क्यों होता है ऐसा
मेरे साथ
कोई तो बता दे ..........

Monday, April 12, 2010

एक किनारे की नदी

अचानक .........
छोड़ गई तुम मेरा साथ,
बुझा गयी अपना जीवन दीप,
बिना कुछ कहे,
बिना कुछ सुने
कर गयी मेरे जीवन में
कभी न ख़त्म होनेवाला
अँधियारा .........

जन्म-जन्मान्तर के लिए थामा था
तुमने मेरा हाथ ,
वेदी पर बैठ खाई थी कसमें
संग जीने ,संग मरने की ।

इतनी भी क्या जल्दी थी,
ऐसी भी क्या थी बात ,
जो मुझे छोड़ गयी -जीवन के दोराहे पर
यादों के अंतहीन सुरंग में
आखिरी सांस तक
भटकने के लिए ।

क्या करूंगा
ऐसा नीरस और निरर्थक जीवन
जिसमें तुम नहीं ,
तुम्हारा साथ नहीं ।
कैसे कटेगा दिन,
कैसे कटेंगी रातें
तेरे बिना!

हर पल-हर क्षण
याद आएगी तू,
तेरे साथ कटा जीवन,
तेरे साथ बटी बातें ,
घर के भीतर,घर के बाहर ,
हर जगह, हर- वक्त,
बस तू ही नजर आएगी ,

तेरा जाना
किसी भूचाल से कम नहीं
मेरे लिए ,
जिसने सारी आशाएं,
सारे अरमान धराशायी कर दिए मेरे ,
तोड़ दिए सपने सुहाने ,
जो देखे थे हमने साथ बिताने के ।

बेसहारा कर गयी मुझे
जब सहारे की जरूरत थी ।
तेरे बिन ठहर गई है रातें ,
ठहर गया है दिन ।

तेरा जाना........
सुनामी बन जायेगा
मेरे जीवन का
कभी सोचा ना था

और
मैं बनकर रह जाऊँगा
यादों की उछाल लेती लहरों पर

तैरती
जिन्दा लाश ।


दो किनारे थे हम - मैं और तुम ,
एक नदी के ।
एक किनारे की
नदी नहीं होती।

डंक मारते हैं बिच्छू की तरह ,
डसते हैं नाग सा ,
भर देते हैं जेहन
यादों के जहर से ।


तुम्हारी यादें
मुझे चैन से जीने नहीं देंगी ,
हर-पल झपट्टा मारती रहेंगी मुझपर,
चील-कौवों की तरह
और
नोंच -नोंचकर खाती रहेंगी
मेरे अस्तित्व को ,
खोखला करती रहेंगी
मेरा तन- मन ।

समय
ये घाव
कभी नहीं भर पायेगा ,
नहीं लगा पायेगा कोई मरहम,
मेरे जख्मों पर ।

कोई और नहीं ले पायेगा
तुम्हारी जगह
हर जगह
तुम-ही-तुम नजर आओगी मुझे,
हर-पल गूंजेगी मेरे कानों में
तेरी आवाज ,
हर-पल याद आएगा
तेरा साथ ।
कैसे भागूँगा
इस हकीकत से ,
उस हकीकत से ।

बच्चों में नहीं ढूंढ़ पाऊंगा
तेरा पर्याय ,
भीड़ में रह जाऊंगा,
बेहद अकेला।
रह जाएँगी मेरे साथ
ढेर सारी यादें
मेरे जाने तक
रुलाने के लिए , गुदगुदाने के लिए ...........








Friday, April 9, 2010

छोटी सी मस्ती

सुबह-सबेरे मम्मी आती,
मम्मी आती, मुझे जगाती।
जब न उठता आँख दिखाती ,
आँख दिखाकर डांट पिलाती।
झुंझलाकर वह वापस जाती , ,
पापा को संग लेकर आती।

पापा आते, मुझे जगाते
इधर-उधर मैं करवट लेता,
ऊ-ऊं करता फिर सो जाता ,
पापा फिर भी प्यार जताते।

मेरी हरकत न सह पाती ,
मम्मी गुस्से से भर जाती ,
फिर वो कहती-"मार पड़ेगी"
पापा कहते-"क्योंकर भाई" ।

राजा बेटा अभी उठेगा,
उठकर के स्कूल चलेगा,
पढ़-लिख कर कुछ बड़ा बनेगा ।

पड़ा-पड़ा मैं सुनता रहता,
पर उठने का नाम न लेता,
तब मम्मी भीतर से आती ,
मुझको अपने गोद उठाती ,
ब्रुश करवाती,
ब्रुश करवाती, फिर नहलाती,
बातें कह- कहकर बहलाती ।

मैं तो उनकी एक न सुनता,
रोता जाता और चिल्लाता,
और कहो मैं क्या कर पता ?
रो-रो कर मैं ड्रेस पहनता,
अपने मोज़े - शूज पहनता।

पापा आते, गोद उठाते ,
गोद में लेकर बस तक जाते,
बस कंडक्टर नीचे आता ,
हाथ पकड़ अंदर ले जाता,

पापा वापस घर को जाते ,
मैं गुम-सुम स्कूल को जाता।
वहां पहुँच मैं खुश हो जाता,
दौड़-दौड़ कर उधम मचाता ,
टीचर मैडम बाहर आती ,
हंसकर मुझको डांट पिलाती ,
कक्षा में वापस ले जाती ,
टाफी -चाकलेट खूब खिलाती ,
अच्छे -अच्छे गीत सुनाती ,

डेढ़ बजे जब छुट्टी होती ,
दौड़ सभी बस में चढ़ जाते ,
बस जब मेरे स्टैंड पर आती ,
धमा -चौकड़ी सी मच जाती ,
कूद-कूद हम नीचे आते ,
नीचे आकर दौड़ लगाते ।

मम्मी फिरसे आँख दिखाती ,
आँख दिखाती, डांट पिलाती ,
फिर जल्दी से गोद उठाती ,
चूम-चूम कर खुश हो जाती ।

ख़ुशी-ख़ुशी घर को ले आती ,
लड्डू- पेड़े मुझे मुझे खिलाती ,
बस्ता लेकर संग बिठाती ,
खुद पढ़-पढ़कर मुझे पढ़ाती ,
होमवर्क सारा करवाती ।

सूरज जब छिपने को आता ,
चुपके से मैं बाहर आता ,
बच्चों के संग रेस लगाता ।
खेल-खेलकर जब थक जाता ,
मैं घर जाता और सो जाता,
मीठे सपनों में खो जाता।












Monday, April 5, 2010

भीड़

भीड़ ,
निगल जाती है
सुरसा कि तरह
अवसरों को ,
बढ़ा देती है
मांगों को ,
लगा देती है
आवश्यकताओं का ढेर ।

भीड़
तोड़ देती है
उम्मीदों को ,
बिखेर देती है
संजोए सपनों को ।

भीड़
आंधी कि तरह
झकझोर कर रख देती है
जीवन मूल्यों
और
संस्कारों को ।

भीड़
अनदेखा कर गुजर जाती है
स्थापित मानदंडों को ,
मान्यतों को ।

भीड़
बढ़ जाती है आगे
ठुकरा कर
भावों को,
भावनाओं को ,
और
बना देती है
अपनों को बेगाना ।

भीड़
नहीं देखती
बचपन,
जवानी ,
बुढ़ापा
क्योंकि
भीड़ तो बस भीड़ है
कोई दिशा नहीं होती,
इसका कोई लक्ष्य नहीं होता ।