रिश्तों का मर्म समझना है
तो कवि हो जाओ.
फैलाना हो उजाला
अँधेरे के उसपार
तो रवि हो जाओ.
किसी बेचैन मन को
देना हो करार
तो शीतल शशि हो जाओ,
गर जानना चाहो
जल की जात
तो जलपरी हो जाओ.
रिश्तों का मर्म समझना है
तो कवि हो जाओ.
लाली देखनी हो
तो करो
उगते सूरज की बात,
गर देखना हो
हरियाली का असर
तो रेगिस्तान में
एक पौधा लगा आओ.
रिश्तों का मर्म समझना है
तो कवि हो जाओ.
समझाना चाहो
गति जीवन की
तो नदी हो जाओ,
समाना चाहो
सबको अपने भीतर
तो समंदर से अनंत हो जाओ,
रिश्तों का मर्म समझना है
तो कवि हो जाओ.
बसना है
किसी के दिल में
तो कोई दर्द-भरा गीत
बन जाओ.
रहना चाहो
किसी की आँखों में
तो एक सुदर सी छवि
बन जाओ.
रिश्तों का मर्म समझना है
तो कवि हो जाओ.
जो चाहो लेना
छांव का आनंद
तो छिप जाओ
मां के आँचल में,
जेठ की दोपहरी में
घने बरगद के तले
आ जाओ .
रिश्तों का मर्म समझना है
तो कवि हो जाओ.
गर लेना है
मौसम का मजा
तो मत घबराओ
कड़कती बिजलियों से,
गरजते मेघों से
सावन की झड़ी में
खो जाओ.
रिश्तों का मर्म समझना है
तो कवि हो जाओ.
महकना है तो महको
औरों केलिये
फूल बनकर,
जीना है तो जियो
जीवन-भर
बाग का माली बनकर
जीवन को दिशा,
एक नया अर्थ दे जाओ
रिश्तों का मर्म समझना है
तो कवि हो जाओ.
Dil Ka Aashiyana Where Every Relation has Its Relavance,Every Individual has his Place.Humanity Reigns Supreme.
Thursday, March 3, 2011
Monday, February 21, 2011
आने दो वसंत
आज
हर तरफ सूखा है,
भीतर-बाहर
सब कुछ रुखा-रुखा है
बादल भी हो रहे हैं सफ़ेद.
इंसानों की कौन कहे
बिगड़ी हुई है
प्रकृति की भी चाल
पेड़ों ने भी नहीं ओढ़ी है
अभीतक
हरे पत्तों की शाल,
उतरा हुआ है
खेतों का भी रंग,
कुछ ठीक सा नहीं लगता,
समय का रंग-ढंग.
एकबार फिर
आने दो वसंत
चारो ओर
चहकने दो चिड़ियों को
डाली-डाली,
नदियों को
कल-कल बह जाने दो,
झरनों को
झर-झर झर जाने दो,
खेतों में खिल जाने दो
सरसों के पीले फूल.
चुन लेने दो
तितलियों को
मनचाहे फूल,
भवरों को
झूम लेने दो
पीकर मकरंद,
बिछ जाने दो
हरियाली की चादर
चारो ओर
बह लेने दो
एकबार फिर
मंद-मंद
सिहरन भरा समीर,
घुल जाने
दो हवाओं में भंग,
छा जाने दो
चतुर्दिक उमंग.
शेमल के फूलों से
चुरा कर रंग लाल
बना लो गुलाल,
खेलो होली
एक-दूजे के संग.
रंग दो
मन का कोना-कोना,
अंग-अंग.
दो रिश्तों को
नया जीवन,
वसंत को आने दो
बार-बार,बार-बार,
लगातार,
सबकुछ
वासंती हो जाने दो.
हर तरफ सूखा है,
भीतर-बाहर
सब कुछ रुखा-रुखा है
बादल भी हो रहे हैं सफ़ेद.
इंसानों की कौन कहे
बिगड़ी हुई है
प्रकृति की भी चाल
पेड़ों ने भी नहीं ओढ़ी है
अभीतक
हरे पत्तों की शाल,
उतरा हुआ है
खेतों का भी रंग,
कुछ ठीक सा नहीं लगता,
समय का रंग-ढंग.
एकबार फिर
आने दो वसंत
चारो ओर
चहकने दो चिड़ियों को
डाली-डाली,
नदियों को
कल-कल बह जाने दो,
झरनों को
झर-झर झर जाने दो,
खेतों में खिल जाने दो
सरसों के पीले फूल.
चुन लेने दो
तितलियों को
मनचाहे फूल,
भवरों को
झूम लेने दो
पीकर मकरंद,
बिछ जाने दो
हरियाली की चादर
चारो ओर
बह लेने दो
एकबार फिर
मंद-मंद
सिहरन भरा समीर,
घुल जाने
दो हवाओं में भंग,
छा जाने दो
चतुर्दिक उमंग.
शेमल के फूलों से
चुरा कर रंग लाल
बना लो गुलाल,
खेलो होली
एक-दूजे के संग.
रंग दो
मन का कोना-कोना,
अंग-अंग.
दो रिश्तों को
नया जीवन,
वसंत को आने दो
बार-बार,बार-बार,
लगातार,
सबकुछ
वासंती हो जाने दो.
Tuesday, February 1, 2011
एक अनुभव
एकबार
जब तुम बहुत बीमार थे,
हम बिलकुल लाचार थे,
काटे नहीं कटता था
समय,
रातें लगती थी
सागर से गहरी,
दिन लगते थे
पहाड़ से.
तब हमने
हजार-हजार पलों में
बाँट लिए थे
अपने दिन,अपनी रातें,
हर पल में
निराशा एक वृत्त था,
आशा उसका केंद्र .
तुम्हारे लिए
क्रंदन और किलकारी
एक-दूसरे का
रहा होगा पर्याय,
रहे होंगे
जिंदगी और मौत
एक सिक्के को दो पहलू .
हमारे लिए तो यह
पल-पल जी गई मौत थी
आशंका और अवसाद भरी,
धडकनों की रफ़्तार में
हर कतरा खून था
सिहरा हुआ,
सिमटा हुआ.
पाकर तुम्हें
खोना नहीं चाहते थे हम,
असहाय से कभी तुम्हें ,
कभी आसमान की ओर.....
देखते थे हम.
हमारे पास
नदी के बीच डगमगाती
उम्मीद की नाव तो थी,
भरोसे की पतवार नहीं थी.
हमारी हर आस टिकी थी
उन अनजान थपेड़ों पर
जो मंझधार से बढ़ रही थी
किनारे की ओर.............
(हर किसी के जीवन में कभी न कभी ऐसा पल आता है)
जब तुम बहुत बीमार थे,
हम बिलकुल लाचार थे,
काटे नहीं कटता था
समय,
रातें लगती थी
सागर से गहरी,
दिन लगते थे
पहाड़ से.
तब हमने
हजार-हजार पलों में
बाँट लिए थे
अपने दिन,अपनी रातें,
हर पल में
निराशा एक वृत्त था,
आशा उसका केंद्र .
तुम्हारे लिए
क्रंदन और किलकारी
एक-दूसरे का
रहा होगा पर्याय,
रहे होंगे
जिंदगी और मौत
एक सिक्के को दो पहलू .
हमारे लिए तो यह
पल-पल जी गई मौत थी
आशंका और अवसाद भरी,
धडकनों की रफ़्तार में
हर कतरा खून था
सिहरा हुआ,
सिमटा हुआ.
पाकर तुम्हें
खोना नहीं चाहते थे हम,
असहाय से कभी तुम्हें ,
कभी आसमान की ओर.....
देखते थे हम.
हमारे पास
नदी के बीच डगमगाती
उम्मीद की नाव तो थी,
भरोसे की पतवार नहीं थी.
हमारी हर आस टिकी थी
उन अनजान थपेड़ों पर
जो मंझधार से बढ़ रही थी
किनारे की ओर.............
(हर किसी के जीवन में कभी न कभी ऐसा पल आता है)
Sunday, January 16, 2011
मैं कब क्या होता हूँ ?
मैं
कभी बुद्ध,
कभी ईसा ,
कभी गाँधी,
होता हूँ,
तो कभी
महज एक दंगाई,
एक आतंकवादी.
कभी
अपने चारो ओर
खड़ी करता हूँ
नफरत की दीवार,
कभी करता हूँ
शांति-पथ की तलाश.
मैं
एक ही पल में
कभी हिन्दू होता हूँ ,
कभी सिख,कभी ईसाई,
कभी जीता हूँ
मुसलमां बनकर.
एक-दूसरे को मारते हुए
हैवान बनकर,
एक-दूसरे को बचाते हुए
इन्सान बनकर.
मैं
अबतक
नहीं समझ पाया
कभी मानव,महा-मानव,
कभी दानव,महा-दानव
क्यों हो जाता हूँ,
कैसे हो जाता हूँ ?
कभी बुद्ध,
कभी ईसा ,
कभी गाँधी,
होता हूँ,
तो कभी
महज एक दंगाई,
एक आतंकवादी.
कभी
अपने चारो ओर
खड़ी करता हूँ
नफरत की दीवार,
कभी करता हूँ
शांति-पथ की तलाश.
मैं
एक ही पल में
कभी हिन्दू होता हूँ ,
कभी सिख,कभी ईसाई,
कभी जीता हूँ
मुसलमां बनकर.
एक-दूसरे को मारते हुए
हैवान बनकर,
एक-दूसरे को बचाते हुए
इन्सान बनकर.
मैं
अबतक
नहीं समझ पाया
कभी मानव,महा-मानव,
कभी दानव,महा-दानव
क्यों हो जाता हूँ,
कैसे हो जाता हूँ ?
Thursday, January 13, 2011
दूसरा किनारा
एक किनारा छोड़
दूसरे किनारे
आ गया हूँ मैं,
तुझे अपनाकर
किसी को पीछे
छोड़ आया हूँ मैं.
जुड़ गया हूँ
परम्पराओं से,
रश्मों-रिवाजों से
तुम्हें पाकर,
पर,आज भी
पूरी तरह
अतीत से नाता
नहीं तोड़ पाया हूँ मैं.
अब तो बस
तुम हो,मैं हूँ
हम बनकर
और साथ हैं
कुछ भूली-बिसरी बातें
परछाई बनकर .
नहीं कह सकता
क्यों चाहने लगा हूँ
तुम्हें इतना,
समझने लगा हूँ
हिस्सा अपना
धीरे-धीरे,
फ़िरभी
क्यों लगता है
कभी-कभी
मन का कोई कोना
सूना-सूना
उसके बिना.
जब-जब
देखता हूँ
पीछे मुड़कर ,
लगता है
पाकर भी
बहुत कुछ खोया है
मैंने अपना.
पहला सपना,
पहला प्यार
जो आज भी
यादों की लहर बनकर
लौटता है बार-बार,
तुम तक आकर
लौट जाता है,
मेरे भीतर
अजब सी
एक टीस छोड़कर.
सच कहूँ तो अब
मुश्किल लगता है
पल-भर भी जीना
तेरे बिना .
तुम साथ रहो,
मेरे पास रहो
अपना बनकर,
उसे रहने दो
दिल के किसी कोने में
मेरा अतीत,
मेरा सपना बनकर
और
देदो मुझे
मेरे द्वंद्व से मुक्ति.
दूसरे किनारे
आ गया हूँ मैं,
तुझे अपनाकर
किसी को पीछे
छोड़ आया हूँ मैं.
जुड़ गया हूँ
परम्पराओं से,
रश्मों-रिवाजों से
तुम्हें पाकर,
पर,आज भी
पूरी तरह
अतीत से नाता
नहीं तोड़ पाया हूँ मैं.
अब तो बस
तुम हो,मैं हूँ
हम बनकर
और साथ हैं
कुछ भूली-बिसरी बातें
परछाई बनकर .
नहीं कह सकता
क्यों चाहने लगा हूँ
तुम्हें इतना,
समझने लगा हूँ
हिस्सा अपना
धीरे-धीरे,
फ़िरभी
क्यों लगता है
कभी-कभी
मन का कोई कोना
सूना-सूना
उसके बिना.
जब-जब
देखता हूँ
पीछे मुड़कर ,
लगता है
पाकर भी
बहुत कुछ खोया है
मैंने अपना.
पहला सपना,
पहला प्यार
जो आज भी
यादों की लहर बनकर
लौटता है बार-बार,
तुम तक आकर
लौट जाता है,
मेरे भीतर
अजब सी
एक टीस छोड़कर.
सच कहूँ तो अब
मुश्किल लगता है
पल-भर भी जीना
तेरे बिना .
तुम साथ रहो,
मेरे पास रहो
अपना बनकर,
उसे रहने दो
दिल के किसी कोने में
मेरा अतीत,
मेरा सपना बनकर
और
देदो मुझे
मेरे द्वंद्व से मुक्ति.
Monday, January 10, 2011
ये तमन्ना है मेरी
सड़क तुम तक आये ,
तुम उसपर
अपने नाजुक पाँव धरो,
और वह तुम्हें
तुम्हारी मनचाही जगह
ले जाए
ये तमन्ना है मेरी .
पुरवैया बयार बहे,
तुम्हारे बालों को
हौले-हौले सहलाये ,
तुम्हें गुगुदाकर
चला जाए ,
ये तमन्ना है मेरी.
झूमकर आये
सावन की घटाएं
रिमझिम फुहार बरसाएं,
तेरे पैरों के नीचे की दूब
हरी मखमली हो जाये
ये तमन्ना है मेरी.
गाढ़ा नीला हो जाए
आसमान,
तेरे चेहरे पर सजे
उगते सूरज की लाली,
तू झिलमिलाए सदा
तारा बनकर
मेरे मन आँगन में
ये तमन्ना है मेरी.
तू जहाँ भी रहे
खुश रहे,
खुशहाली तेरे आस-पास
अपना घर बसाये,
तेरे चाँद से चेहरे पर
कभी कोई शिकन
न आये
ये तमन्ना है मेरी .
पापा नहीं हैं
कोई बात नहीं,
तेरे लिए
मेरे प्यार की सच्चाई पर
कभी कोई आंच न आये
ये तमन्ना है मेरी .
तू जैसी थी
वैसी ही बसी रहना
मेरे घायल मन में,
समय इसमें कोई बदलाव
न ला पाए
ये तमन्ना है मेरी.
मेरी मुहबोली बहन मीरा की प्यारी बिटिया की स्मृति में.
तुम उसपर
अपने नाजुक पाँव धरो,
और वह तुम्हें
तुम्हारी मनचाही जगह
ले जाए
ये तमन्ना है मेरी .
पुरवैया बयार बहे,
तुम्हारे बालों को
हौले-हौले सहलाये ,
तुम्हें गुगुदाकर
चला जाए ,
ये तमन्ना है मेरी.
झूमकर आये
सावन की घटाएं
रिमझिम फुहार बरसाएं,
तेरे पैरों के नीचे की दूब
हरी मखमली हो जाये
ये तमन्ना है मेरी.
गाढ़ा नीला हो जाए
आसमान,
तेरे चेहरे पर सजे
उगते सूरज की लाली,
तू झिलमिलाए सदा
तारा बनकर
मेरे मन आँगन में
ये तमन्ना है मेरी.
तू जहाँ भी रहे
खुश रहे,
खुशहाली तेरे आस-पास
अपना घर बसाये,
तेरे चाँद से चेहरे पर
कभी कोई शिकन
न आये
ये तमन्ना है मेरी .
पापा नहीं हैं
कोई बात नहीं,
तेरे लिए
मेरे प्यार की सच्चाई पर
कभी कोई आंच न आये
ये तमन्ना है मेरी .
तू जैसी थी
वैसी ही बसी रहना
मेरे घायल मन में,
समय इसमें कोई बदलाव
न ला पाए
ये तमन्ना है मेरी.
मेरी मुहबोली बहन मीरा की प्यारी बिटिया की स्मृति में.
Saturday, January 8, 2011
ठहरा हुआ बचपन
गाँव में
आज भी
निकलता है चाँद,
जगमगाती है
अमावस की रात
झिलमिलाते तारों से,
भर जाता है आँगन
चमकते जुगनुओं से.
पूरब की ओट से
झांकता है
शर्मीला सूरज
भोर में.
इन सबके बीच ही
कहीं ठहरा हुआ है
हमारा दौड़ लगाता
बचपन.
गाँव की गलियों में
उधम मचाता,
मेला जाने की रट लगाता
गुब्बारा लेने के लिए
मचलता बचपन. .
दादाजी की उंगली थामे
स्कूल जाता,
कच्चे फर्श पर
चटाई बिछाकर
पढाई करता,
मास्टर जी की मार खाता,
छड़ी छुपाता बचपन.
मेंड़ों पर दौड़ लगाता ,
खेतों की हरियाली में
घुलमिल जाता,
औरों के खेतों से
गन्ने और मटर
चुराता बचपन.
गाँव की गलियों में
उधम मचाता,
तालाब के पानी पर
पत्थर तिराता बचपन.
सावन की झपसी में
सिर उठाकर
बूंदों को चूमता,
घर के बरामदे बैठ
आँगन से निकलती धार में
कागज की नाव
बहाता बचपन,
डूबते सूरज के साये में
नदी की गीली रेत पर
घरौंदा बनाता,बिगाड़ता,
उन्हें बिगाड़कर
जोर-जोर से
खिलखिलाता बचपन.
ये बेफिक्र बचपन ही तो था
जो किसी की गोद में,
किसी के कंधे पर
चढ़ा होता था,
खौफ से बेख़ौफ़ होने के लिए
मां के आँचल में छिपा होता था .
ये बचपन ही तो है
जो आज भी हमारे मन को
बार-बार गुदगुदाता है ,
हमें यादों के पालने में झुलाता है.
बेशक !
आज हम बड़े हो गए हैं,
अपने पैरों पर खड़े हो गए हैं.
पर,आज भी
ठहरा हुआ है बचपन
हमारी यादों में
पूरी शिद्दत से.
आज भी
निकलता है चाँद,
जगमगाती है
अमावस की रात
झिलमिलाते तारों से,
भर जाता है आँगन
चमकते जुगनुओं से.
पूरब की ओट से
झांकता है
शर्मीला सूरज
भोर में.
इन सबके बीच ही
कहीं ठहरा हुआ है
हमारा दौड़ लगाता
बचपन.
गाँव की गलियों में
उधम मचाता,
मेला जाने की रट लगाता
गुब्बारा लेने के लिए
मचलता बचपन. .
दादाजी की उंगली थामे
स्कूल जाता,
कच्चे फर्श पर
चटाई बिछाकर
पढाई करता,
मास्टर जी की मार खाता,
छड़ी छुपाता बचपन.
मेंड़ों पर दौड़ लगाता ,
खेतों की हरियाली में
घुलमिल जाता,
औरों के खेतों से
गन्ने और मटर
चुराता बचपन.
गाँव की गलियों में
उधम मचाता,
तालाब के पानी पर
पत्थर तिराता बचपन.
सावन की झपसी में
सिर उठाकर
बूंदों को चूमता,
घर के बरामदे बैठ
आँगन से निकलती धार में
कागज की नाव
बहाता बचपन,
डूबते सूरज के साये में
नदी की गीली रेत पर
घरौंदा बनाता,बिगाड़ता,
उन्हें बिगाड़कर
जोर-जोर से
खिलखिलाता बचपन.
ये बेफिक्र बचपन ही तो था
जो किसी की गोद में,
किसी के कंधे पर
चढ़ा होता था,
खौफ से बेख़ौफ़ होने के लिए
मां के आँचल में छिपा होता था .
ये बचपन ही तो है
जो आज भी हमारे मन को
बार-बार गुदगुदाता है ,
हमें यादों के पालने में झुलाता है.
बेशक !
आज हम बड़े हो गए हैं,
अपने पैरों पर खड़े हो गए हैं.
पर,आज भी
ठहरा हुआ है बचपन
हमारी यादों में
पूरी शिद्दत से.
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