Monday, June 22, 2026

मेरा गाँव,मेरी बडुआ
श्रेष्ठा,
मन बहुत व्यथित है
एक अजीव सी बैचेनी है
आज 35 साल बाद....
एक बार फिर लौटा हूँ
अपने गांव
नए सपने संजोए
पुरानी यादों के साथ ।
देख रहा हूँ
घर सूने हैं
गांव खाली है।
 
जानता था
नहीं मिलेंगे
बहुत सारे जाने-पहचाने  
अपनापन जतानेवाले पुराने लोग
नहीं मिलेंगे बहुत सारे बचपन के साथी,
खेती और बाग़-बगीचों के अलावा
गांवों में कुछ था भी तो नहीं ।
 
हाँ, अपनेपन की भरमार थी,
रिश्तों का अंबार था
अपनी रेत पर बैठने को
बड़ुआ (नदी) भी रोज बुलाती थी,
अपनी गोद में बिठाती थी,
कलेजे में गीली रेत समेटे
बच्चों का करती थी इन्तजार
हम भी घरौंदे बनाने को रहते थे बेकरार ।
 
सूखी सी उस  पहाड़ी नदी के बीच से
बहती थी पतली सी पानी की धार
बिना डूबे जिसके आर-पार
बच्चे दौड़ लगाते थे
कभी उसके पानी को एक दूसरे पर उछालते,
कभी कच्छे-बनियान में 
उसके उथले पानी में उछल कूद मचाते
लोट-लोट कर नहाते थे हम,
 
हम वहां भेड़ा (केकड़े जैसा एक जीव) पकड़ते थे,
उसकी टांगों में सुतली बांध
बालू में उसकी दौड़ लगवाते थे
जब हम थक जाते
उसे आज़ाद कर देते थे
और वह तेजी से
अपने बिल में समा जाता था ।
 
फिर हम चाचा जी के साथ
रेत में मुश्किल से दौड़ लगाते
बालू पर पैर आगे नहीं
पीछे की ओर अधिक जाते थे
हम चाहकर भी दौड़ नहीं पाते थे,
 
बड़ुआ नदी नहीं थी
आसपास के गांवों की चौपाल थी
बड़े-बूढ़े और बच्चों की चौपाल
नदी हमें पाकर खुश होती थी
हम नदी को पाकर,
 
सुबह सबेरे
वह हमारी नित्यक्रिया का आधार थी,
डूबते सूरज के संग
 हमारा क्रीडागार थी,
पेड़ों से भरे दोनों किनारों संग  
एक सुखद  संसार थी।
 
नदी के किनारे बड़ा बरगद
छांव का भंडार था
साथ का पीपल हवादार था
चौपाल यहां भी लगती थी
लेकिन भरी दोपहरी में
जब सूरज सिर पर होता है,
गाय-बैल बकरियाँ और  दादा जी
और हम बच्चों की टोलियाँ 
होती थी आस-पास
गर्मियों की छुट्टियां जो होती थी हमारी।
 
स्वर्ग भी फीका था उस माहौल में
पूरा समाज बंधा था
रिश्तों की डोर में
ढेर सारे दादा जी थे, दादियाँ थी हमारे पास ,
चाचा , चाची , भैया, भाभी और दोस्तों की थी भरमार,
कहीं कोई नहीं अकेला नहीं था।
 
ऐसा था मेरे बचपन का गांव,
गांव में था काली  का मंदिर,
एक थी गांव की ठाकुरबाड़ी,
जहां सुबह सुबह नहा धोकर
मिश्री और तुलसी का प्रसाद लेने
जाया करते थे हम
घंटियां और शंख बजाया करते थे।
 
श्रेष्ठा,
इस बार ऐसा कुछ नहीं था
गांव वीरान
गलियां सुनसान
अपने-अपने दरवाजे पर बैठे
सूनी आंखों से किसी का इंतजार करते
इक्का-दूक्का लोग,
चुभ रहा था बाग-बगीचों में लगे पेड़ों का अकेलापन
चारों और फैला अजनबीपन,
सबसे अजीब था
बड़ुआ का चीरहरण
द्रौपदी के चीरहरण से भी विभस्त
और ह्रदय विदारक
एरबारगी तो लगा
बड़ुआ कहीं सीता की तरह
धरती में तो नहीं समा गयी
नहीं, नहीं  
धरती में नहीं समायी थी बेपर्दा बड़ुआ,
अपनी बाहों और घुटनों में अपनी इज्जत छिपाए
रसातल में बैठी थी बडुआ,
बड़ा ही भयावह दृश्य था,
अपने ऊंचे ऊंचे किनारों में
दुबकी सी बड़ुआ
त्रस्त थी, भयग्रस्त थी
 
अपने सगों ने ही किया था उसका ये हाल
उसके बालू का एक-एक कण ले गए थे अपने साथ
निरीह बड़ुआ को निस्सहाय छोड़ गए थे
कैसे सभ्य थे उसके अपने
बोली लगा-लगाकर दोहन किया था उसका
निवस्त्र करने का प्रयास किया
सोचकर भी रूह कांप जाती है
धन  के लिए कोई इतना भी गिरता है क्या?
मां जैसी बड़ुआ की अस्मिता भी बेच दी,
उसे द्रौपदी से भी बुरी हालत में छोड़ गए
 
सोचा नहीं था
अपने गांव, अपनी बड़ुआ की ये दुर्दशा देखूंगा
लोगों में अलगाव की लहर देखूंगा
परिवारों को बिखरते हुए देखूंगा
मेरी आत्मा दुखी है, मन बोझिल है
कुछ समझ नहीं आता
क्या यही विकास है ,
क्या यही बदलाव है?
राजीव
17.06.2026
 
 
 
 
 
 
 
 
 My Village,My Badua
                                           (19/06/2026) 
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