Sunday, January 16, 2011

मैं कब क्या होता हूँ ?

मैं
कभी बुद्ध,
कभी ईसा ,
कभी गाँधी,
होता हूँ,
तो कभी
महज एक दंगाई,
एक आतंकवादी.

कभी
अपने चारो ओर
खड़ी करता हूँ
नफरत की दीवार,
कभी करता हूँ
शांति-पथ की तलाश.

मैं
एक ही पल में
कभी हिन्दू होता हूँ ,
कभी सिख,कभी ईसाई,
कभी जीता हूँ
मुसलमां बनकर.

एक-दूसरे को मारते हुए
हैवान बनकर,
एक-दूसरे को बचाते हुए
इन्सान बनकर.

मैं
अबतक
नहीं समझ पाया
कभी मानव,महा-मानव,
कभी दानव,महा-दानव
क्यों हो जाता हूँ,
कैसे हो जाता हूँ ?

27 comments:

  1. मैं
    अबतक
    नहीं समझ पाया
    कभी मानव,महा-मानव,
    कभी दानव,महा-दानव
    क्यों हो जाता हूँ,
    कैसे हो जाता हूँ ?
    kaal ke niymon ko kahan jaan paate hain hum ... hum khud ko hi kahan jaan paate hain !

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  2. सच कह रहे हैं इंसान के ना जाने कितने रूप हैं…………वैसे भी एक ही रूप मे कितने ही चेहरे छुपे होते हैं।

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  3. अनंत, अकल्पित संभावनायुक्‍त मानव.

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  4. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (17/1/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
    http://charchamanch.uchcharan.com

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  5. 'मैं' को मारा 'हम' हुए, ऐसे ही ग़म दूर हुए,
    कल तक तो अंधियार मे थे अब हम अल्‍ला का नूर हुए।

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  6. एक ही पल में
    कभी हिन्दू होता हूँ ,
    कभी सिख,कभी ईसाई,
    कभी जीता हूँ
    मुसलमां बनकर.
    ...very nice

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  7. मन केअन्दर बहती रहती है व्यग्रता की धारा। बहुत ही सुन्दर कविता।

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  8. हर पल बदलता है हमारा चेहरा भावनाओं के साथ. अच्छी अभिव्यक्ति.

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  9. आपकी रचना पढकर एक शे’र याद आ गया,

    सब सा दिखना छोड़कर खुद सा दिखना सीख
    संभव है सब हो गलत, बस तू ही हो ठीक

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  10. आपने तो इन्सान के हर रूप का चित्रण बहुत खूबसूरती से कर दिया दोस्त !

    बहुत खबसुरत रचना !

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  11. बहुत ही सुन्दर कविता।

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  12. यही तो है जो समझ में नहीं आता..इंसान ही सब तरह के जानवर का रुप धर सकता है ..है न अजीब बात

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  13. आदरणीय राजीव सर हम्लेट ने एक्ट २, सीन २ में रोज़ेन्क्रन्त्ज़ और गिल्डस्टर्न को कहा था कि...
    " I have of late, but wherefore I know not, lost all my mirth, forgone all custom of exercises; and indeed, it goes so heavily with my disposition that this goodly frame, the earth, seems to me a sterile promontory; this most excellent canopy, the air, look you, this brave o’erhanging firmament, this majestical roof fretted with golden fire,—why, it appears no other thing to me than a foul and pestilent congregation of vapours. What a piece of work is man! How noble in reason! how infinite in faculties! in form and moving, how express and admirable! in action how like an angel! in apprehension, how like a god! the beauty of the world! the paragon of animals! And yet, to me, what is this quintessence of dust? Man delights not me."... मतलब.... "the world (and everything in it) used to बे incredibly beautiful and exciting to him but he has lost that feeling and it now looks rubbish and empty. People used to delight him but now they all appear false and ugly. He used to be full of life, curiosity and love. Now he is depressed, dissapointed and lonely."... आपकी कविता में यही छाप है.. एक संवेदनशील ह्रदय के स्वामी हैं आप..

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  14. wow... इंसां के इन दोनों पहलुओं को शब्द दे दिए आपने... बहुत खूब...

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  15. हरीश गुप्त to me

    इंसान की पल-पल बदलती फितरत को दर्शाती कविता का रस लाभ सुलभ कराने के लिए धन्यवाद ।

    - हरीश गुप्त

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  16. prajyanp pandepragya to me
    बहुत अच्छा प्रश्न उठाया , बहुत विचारणीय है.सुन्दर लेखन
    बधाई !
    प्रज्ञा

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  17. bahut gambheer prashan hai ye ek hi samay me itna sab hote hue bhi insan apni pahchan khojata rahta hai....

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  18. सब हमारे ही अंदर है... डॉ. जेकिल भी और मि. हाईड भी... यह हम पर निर्भर करता है कि हम किसे भोजन, समिधा देकर जीवित रखते हैं!!

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  19. daanish bhaarti to me

    "मैं कब क्या होता हूँ..."
    इंसान की फितरत को
    अर्थ पूर्ण लफ़्ज़ों में बाँधने की
    कामयाब कोशिश की है आपने.
    अच्छी कृति !

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  20. सही कहा...महामनाव और महादानव दोनों ही तो एक ही मन में बसे होते हैं..अब निर्भर करता है कि किसने किसे पराजित कर रखा है..

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  21. bahut saargarbhit rachna, yahi to samajh nahin aata yahi manushya kabhi manav banta kabhi danav...kabhi buddh to kabhi haivaan...bahut badhai uttkrisht rachna keliye.

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  22. कब क्या होता हूँ मैं ...
    मानसिक द्वंद्व ...अक्सर हम खुद को इस तरह ढूँढा करते हैं ..!
    दुआ है जीत मानव की ही होती रहे !

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  23. मेरी रचना "मैं कब क्या होता हूँ ? " को अपना बहुमूल्य समय और विचार देने के लिए मैं आप सबका ह्रदय से आभारी हूँ.आगे भी आप सबका मार्गदर्शन मिलता रहेगा इस उम्मीद के साथ .

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  24. :)...ek pyari abhivyakti...aapke iss post ko "aman ke paigam" pe hona chahiye tha...!!
    bade bhaiya bihari babu ne sach kaha...kash ham apne andar ke danav ko ta-janm sulane me safal rakh payen.......!!

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  25. मैं
    कभी बुद्ध,
    कभी ईसा ,
    कभी गाँधी,
    होता हूँ,
    तो कभी
    महज एक दंगाई,
    एक आतंकवादी.

    बड़ी सादगी और सलासत से आपने इन्सान से दोहरे चरित्र को उजागर किया है अपनी इस कविता में.
    मैं समझ नहीं पा रहा हूँ की आप की साफगोई की दाद दूँ या हिम्मत की.
    अगर सामने होते तो मैं आपकी पीठ थपथपाता.
    भगवान आपके इस जज़्बे को बरकरार रक्खे.

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