Thursday, March 18, 2010

यमुना

मृत्यु शैया पर लेटी यमुना
जीवन मांग रही , जीवन
ताकि जीवनदान दे सके ,
गौरव और अभिमान दे सके ,
पर कोई उसे "संजीवनी " नहीं देता,
नहीं देता उसे उसकी "धार"
सोचते सब हैं, मैं भी और तुम भी
पर कर कुछ नहीं पाते
कुछ करना चाहते भी नहीं
बस सोचते रहते हैं ,सोचते रहते हैं........
उसकी विशालता से सब घबराते हैं
शरीर माँ का हो या नदी का
विशाल तो होता ही है
तभी तो पलती हैं जिंदगियां
उनकी कोख में
अठखेलियाँ करती है
उसकी गोद में ।
पर कब तक !
आखिर कब तक
कलकल करती यमुना की तस्वीर निहारेंगे ?
कबतक उसकी विशाल काया से घबरायेंगे ?
कब तक करेंगे इन्तजार
उसके स्वयं ठीक हो जाने का
मृत्यु शैया से उठ आने का ।
आओ , कुछ करें की यमुना बच जाए
और मिल जाये हम सबको नया जीवन .......

3 comments:

  1. "शरीर माँ का हो या नदी का
    विशाल तो होता ही है
    तभी तो पलती हैं जिंदगियां
    उनकी कोख में
    अठखेलियाँ करती है
    उसकी गोद में । "
    बहुत उमदा सोच... यमुना के बहाने आपने तमाम मरती नादियो ... बुजुर्गो अपनी संस्कृती से दूर होते लोगो को प्रेरित करने कि कोशिश की है

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  2. बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए.... खूबसूरत रचना......

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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