Tuesday, April 12, 2011

बचपन

बचपन नहीं पहेली
दर्पण होता है मन का.
उसकी हरकतें हँसाती है,
मन को गुदगुदाती है,
हर तनाव से दूर ले जाती है.

हाँ,पहेली सी लगती है
युवा मन को उसकी बातें.
क्योंकि नहीं होता कोई फर्क
उसकी कथनी और करनी में,
उसकी खिलखिलाहट में होती है
ख़ुशी की धूप ,
क्रंदन में दुःख की छाया.
छिपाए नहीं छिपते
उसके मन के कोमल भाव,
चाहे गुस्सा हो या प्यार
चेहरे पर साफ उभर आते हैं

बचपन नहीं होता जवानी सा
जहाँ होता है भेद-भाव,
आडम्बर का अम्बार .
वह तो उठता है,गिरता है,
फिर उठता है, आगे चल पड़ता है
क्योंकि प्रकृति होती है उसके साथ.

हमारा दर्पण है
धुंधला-धुंधला,उदास-उदास,
गमजदा चेहरे पर रहता है
मुखौटा मुस्कान का,
गुस्से में भी
चेहरेसे छलकता है प्यार
जिसे कहा जाता है
सभ्य समाज में "व्यवहार".
कर्म और सोच में सदा ही रहता है भेद,
लेकिन पाखंड की चाहरदीवारी होती है अभेद

25 comments:

  1. आपकी कविता पढ़ती आई हूँ, हमेशा बहुत ही अच्छी होती है...आज भी बेहतर...

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  2. बचपन कि निश्छलता और मासूमियत को दर्शाती सुन्दर रचना ।

    फिर उठता है, आगे चल पड़ता है
    क्योंकि प्रकृति होती है उसके साथ.

    इसे यहीं समाप्त करना शायद और अच्छा लगे ।
    शुभकामनायें ।

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  3. भाव पद्य की तरह, लेकिन संरचना गद्य की तरह. और बचपन तो मधुर होता ही है.

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  4. उसकी कथनी और करनी में,
    उसकी खिलखिलाहट में होती है
    ख़ुशी की धूप ,
    क्रंदन में दुःख की छाया.
    छिपाए नहीं छिपते
    उसके मन के कोमल भाव

    बहुत ही प्यारी, भावपूर्ण और अर्थपूर्ण....

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  5. bachpan aisa hi hota hai tabhi tamaam umr sath rahta hai hamare.

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  6. बचपन नहीं होता जवानी सा
    जहाँ होता है भेद-भाव,
    आडम्बर का अम्बार .
    वह तो उठता है,गिरता है,
    फिर उठता है, आगे चल पड़ता है
    क्योंकि प्रकृति होती है उसके साथ.
    prakriti to hamesha saath hoti hai, hum hi use nakar dete hain , per bachpan to khud mein prakriti ka roop hai

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  7. युवा को हर पर संशय होता है, बचपन पर भी। पर सत्य समझ में आते आते प्रौढ़ता आ जाती है।

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  8. बचपन नहीं होता जवानी सा
    जहाँ होता है भेद-भाव,
    आडम्बर का अम्बार .
    वह तो उठता है,गिरता है,
    फिर उठता है, आगे चल पड़ता है
    क्योंकि प्रकृति होती है उसके साथ.
    waha bahut khub likha hai aapne
    aapki kavita padhne ke bad mujhe apn kavita ki kuch line yaad aa gayi bhaiya

    कोई लौटा दे मेरे बचपन के दिन ....
    दे मुझे वोह खुला आसमान
    जहाँ ना हो टेंशन का आगमन ..
    मै भी जी लू मस्त बन कर ....((anju...(anu..))

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  9. Mark Rai
    to me

    bahut hi achcha.

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  10. आदरणीय राजीव सर एक अमेरिकन कवि हुए डेविड बेट्स .. उनकी एक कविता है "चाइल्डहुड " उस कविता की अंतिम पंक्तियों और आपकी कविता में बहुत साम्य है संवेदनाओं के धरातल पर... देखिये...
    ""Tender twigs are bent and folded --
    Art to nature beauty lends;
    Childhood easily is moulded;
    Manhood breaks, but seldom bends. ""
    .. एक और उत्कृष्ट कविता के लिए आपको बधाई... नई ऊंचाई की कविता लिख रहे हैं आप !

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  11. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (14-4-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  12. हमारा दर्पण है
    धुंधला-धुंधला,उदास-उदास,
    गमजदा चेहरे पर रहता है
    मुखौटा मुस्कान का,
    गुस्से में भी
    चेहरेसे छलकता है प्यार
    जिसे कहा जाता है
    सभ्य समाज में "व्यवहार".
    कर्म और सोच में सदा ही रहता है भेद,
    लेकिन पाखंड की चाहरदीवारी होती है अभेद

    आइना दिखाया आपने राजीव भाई ...बहुत सुन्दर !
    http://anandkdwivedi.blogspot.com/

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  13. bachapan sa nishchhal man jeevan ki kisi bhi aur avastha me pana mushkil hai....sunder vishleshan ....jeevan ki vibhinn avasthao ka...

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  14. बचपन पर लिखी यह कविता बहुत अच्छी लगी।

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  15. बहुत बढ़िया कविता| धन्यवाद|

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  16. hai wo beeta bachpan.........!!

    bahut pyari si abhivyakti...sab kuchh to yaad kar liyaaa aapne:)

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  17. gyan chand
    to me
    सुन्दर प्रस्तुति !

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  18. अच्छे है आपके विचार, ओरो के ब्लॉग को follow करके या कमेन्ट देकर उनका होसला बढाए ....

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  19. बचपन नहीं होता जवानी सा
    जहाँ होता है भेद-भाव,
    आडम्बर का अम्बार .
    वह तो उठता है,गिरता है,
    फिर उठता है, आगे चल पड़ता है
    क्योंकि प्रकृति होती है उसके साथ.

    सच में बचपन यही होता है जहाँ पर किसी के लिए कोई भेदभाव नहीं बस प्यार ही प्यार है ....आपका आभार

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  20. कोमल भावों से सजी ..
    ..........दिल को छू लेने वाली प्रस्तुती

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  21. दिल का समंदर और विचारो का दरिया सूख गया है
    मन के भाव कही दूर अँधेरे में भटक रहे है ...
    तभी कोई भी स्थिर नहीं है

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