Wednesday, March 30, 2011

सागर से सागर तक

तेरी हुंकार भरती लहरें
तट से टकरा कर
लौटते हुए
खुद में समा रही हैं
क्षितिज के पार तक
विस्तार पा रही हैं
जीवन-सच बता रही है.

सूरज की किरणे
सागर जगा रही है,
बादल बना रही हैं,
धरती इशारे से
उन्हें
अपने घर
बुला रही है,
हरियाली का सबब
बन जाने को
उकसा रही है.

बादल गरज रहे हैं,
बिजली चमक रही है,
बरसात आ रही है,
रिमझिम के तराने,
जीवन-गीत गा रही है,
फैला रही है
उम्मीद का उजाला
हर दिल में
तमन्नाएं जगा रही है.

बाधाओं को पार कर
जल की धाराएं
नदियों का रूप ले
अविरल
बही जा रही है
अपने ईष्ट की ओर
बढ़ी जा रही हैं.
एकबार फिर
तेरी लहरों में समाकर
एकाकार होने जा रही हैं

एकबार फिर
लहरें हुंकार भरेंगी,
तट से लौटकर
अनंत में खो जायेंगी.

चलता रहेगा सदा
यह सर्जना चक्र
मेरे बाहर,
मेरे भीतर
एक अंतहीन द्वंद्व बनकर.

25 comments:

  1. hriday ki bahut gahri baato ko vayan kiya hai.

    ReplyDelete
  2. चलता रहेगा सदा
    यह सर्जना चक्र
    मेरे बाहर,
    मेरे भीतर
    एक अंतहीन द्वंद्व बनकर.

    दिल को छू गयीं कविता की पंक्तियाँ !
    आभार!

    ReplyDelete
  3. लहरों का बनना और लौट जाना सर्जना चक्र निरूपित करता है।

    ReplyDelete
  4. बाधाओं को पार कर
    जल की धाराएं
    नदियों का रूप ले
    अविरल
    बही जा रही है
    अपने ईष्ट की ओर
    बढ़ी जा रही हैं.
    एकबार फिर
    तेरी लहरों में समाकर
    एकाकार होने जा रही हैं
    aur anthin dwand ... bahut kuch kahti rachna

    ReplyDelete
  5. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (31-3-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

    ReplyDelete
  6. सागर, सूरज और बादल ... यानि कविता.

    ReplyDelete
  7. एकबार फिर
    लहरें हुंकार भरेंगी,
    तट से लौटकर
    अनंत में खो जायेंगी.

    चलता रहेगा सदा
    यह सर्जना चक्र
    मेरे बाहर,
    मेरे भीतर
    एक अंतहीन द्वंद्व बनकर.

    दिल को छू लेने वाली कविता. उम्मीद की किरण दिखाती हुई. हर शाम के बाद सबेरा है. बहुत अच्छा.

    ReplyDelete
  8. सूरज की किरणे
    सागर जगा रही है,
    बादल बना रही हैं,
    धरती इशारे से
    उन्हें
    अपने घर
    बुला रही है,
    हरियाली का सबब
    बन जाने को
    उकसा रही है.

    bahut umda rachna....man ke bahvo ko prakerti ke madhyam se aisa bandha hai ki bus sama dekhte hi ban gayi hai.....ek rakhchitra sa man me khich gaya hai ...badhai

    ReplyDelete
  9. प्रकृति का विवरण देकर अपनी बात को कहने का का एक सफल प्रयास |
    बहुत सुन्दर रचना |

    ReplyDelete
  10. चलता रहेगा सदा
    यह सर्जना चक्र
    मेरे बाहर,
    मेरे भीतर
    एक अंतहीन द्वंद्व बनकर.

    बहुत खूब ..

    ReplyDelete
  11. लहरो का विम्व ले अच्छी कविता बनायी है आपने...

    "तेरी हुंकार भरती लहरें
    तट से टकरा कर
    लौटते हुए
    खुद में समा रही हैं
    क्षितिज के पार तक
    विस्तार पा रही हैं
    जीवन-सच बता रही है."

    बहुत बहुत बधाई....

    ReplyDelete
  12. चलता रहेगा सदा
    यह सर्जना चक्र
    मेरे बाहर,
    मेरे भीतर
    एक अंतहीन द्वंद्व बनकर.

    climax बहुत सार्थक तथा भावनाओं से ओत प्रोत.

    ReplyDelete
  13. किन पंक्तिओं पर न लिक्खूँ
    भावमयी भावुकता से भरपूर

    ReplyDelete
  14. प्रकृति के चक्र के माध्यम से बेहद सुन्दर बात कह दी आपने ! सृजन का यही चक्र कवि के हृदय में भी चलता रहता है ! भावनाओं के सूर्य का ताप, उससे बनने वाले बादल, और कविता के रूप में उन भावों की वृष्टि सारी उसी प्रक्रिया की आवृत्ति है ! बहुत सुन्दर रचना ! बधाई स्वीकार करें !

    ReplyDelete
  15. mini seth to me

    bahut khoob....its always a pleasure to read u

    ReplyDelete
  16. जब खुद में समा जाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है तो खुदी पीछे छूट जाती है और मिल जाता है ख़ुदा....
    अन्दर से बाहर और फिर बाहर से अन्दर की ओर गति ...सदा गतिमान "ज..ग..त" की परम्परा ......एक बिम्ब से कई सन्देश देने का सफल प्रयास.

    ReplyDelete
  17. बहुत सुन्दर रचना... वाह...

    ReplyDelete
  18. चलता रहेगा सदा
    यह सर्जना चक्र
    मेरे बाहर,
    मेरे भीतर
    एक अंतहीन द्वंद्व बनकर.

    जीवन दर्शन से भरपूर रचना

    ReplyDelete
  19. बहुत अच्छी रचना.
    गहरी बात सागर जैसी.

    ReplyDelete
  20. तेरी हुंकार भरती लहरें
    तट से टकरा कर
    लौटते हुए
    खुद में समा रही हैं
    क्षितिज के पार तक
    विस्तार पा रही हैं
    जीवन-सच बता रही

    jeevan darshan aur prakriti ka combo...:)
    kahin andar chhoo gaya...:)
    badhai rajeev sir!

    ReplyDelete
  21. चलता रहेगा सदा
    यह सर्जना चक्र
    मेरे बाहर,
    मेरे भीतर
    एक अंतहीन द्वंद्व बनकर.
    बहुत ही अच्छा....

    ReplyDelete
  22. आदरणीय राजीव सर
    प्रणाम. काफी दिनों बाद इंटरनेट पर आना हुआ... आया तो आपकी कविता 'सागर से सागर तक' मिली... क्या सुन्दर कविता बनी है यह... जॉन मेस्फिल्ड का नाम तो सुना ही होगा आपने और पढ़ा भी होगा.. उनकी एक कविता है ''सी फीवर'' .. उसी कविता की दार्शनिक है आपकी कविता भी... पढ़िए कुछ पंक्तियाँ...
    "I must go down to the seas again, to the vagrant gypsy life,
    To the gull's way and the whale's way, where the wind's like a whetted knife;
    And all I ask is a merry yarn from a laughing fellow-rover,
    And quiet sleep and a sweet dream when the long trick's over....

    ReplyDelete
  23. बहुत सुन्दर रचना शेयर करने के लिये बहुत बहुत आभार

    ReplyDelete
  24. बहुत सुन्दर रचना.

    ReplyDelete