Friday, July 15, 2011

उसके शाम की कहाँ होती है भोर.......

जब कभी देखता हूँ
अपने चारो ओर,
हर तरफ दिखाई देता है
जवानी का जलवा,
हर तरफ सुनाई देता है
जवानी का शोर.
समय के शिखर पर खड़ा
बुढ़ापा देखता रहता है चुप-चाप
जीवन में आता बदलाव,
स्वयं को पाता है
लेटा हुआ
शर-शैय्या पर
भीष्म सा.
चारो ओर होती
सिर्फ कौरवों-पांडवों की भीड़,
उसके शाम की
कहाँ होती है भोर......

22 comments:

  1. भारत में महाभारत.

    ReplyDelete
  2. उसकी शाम की भोर तो नव जीवन का प्रमाण है……………

    ReplyDelete
  3. संक्षिप्त किन्तु गंभीर रचना.. वास्तव में उम्र जो निकल जाती है उसकी भोर कहाँ आती है... जीवन से संध्या वेला का मनोवैज्ञानिक चित्रण !

    ReplyDelete
  4. यौवन की स्तुति होती है हर ओर।

    ReplyDelete
  5. कहते हैं दिल जवान होना चाहिए पर जब शरीर ही साथ छोड़ने लगे तो निराशा और दुविधा होती है । यथार्थपरक रचना ।

    ReplyDelete
  6. मेरे सपने आज भी मचलते हैं
    मेरे ज़ज्बात
    मुझसे अब
    रिहाई मांगते हैं|
    bahut hi badhiyaa

    ReplyDelete
  7. बढ़िया रचना....

    ReplyDelete
  8. बुढ़ापे की भोर नहीं होती
    पर फिर भी आने वाली रात और दिन ढलते सूरज से ही रौशनी पाते हैं

    उम्दा रचना

    ReplyDelete
  9. बेहतरीन रचना...

    ReplyDelete
  10. गया वक़्त लौट कर नहीं आता ..और यह मन जब उस वक़्त को याद करता है तो तब वह बदला हुआ नजर आता है ..एक गंभीर और सम्यक भाव को कविता के माध्यम से अभिव्यक्त किया है आपने ...आपका आभार

    ReplyDelete
  11. budhape ko bhism pitamah se tulna karna bha gaya......:)

    ReplyDelete
  12. दिल की कसक नज़र आती है ....ये वक़्त हर किसी पे आएगा ...मन के भावो की अभिव्यक्ति भा गई भैया

    ReplyDelete
  13. इस भीड़ से मौत आने पर ही छुटकारा मिलता है ...
    गंभीर रचना है ...

    ReplyDelete
  14. shyam kori 'uday' to me
    show details Jul 15

    ... प्रसंशनीय रचना, बधाई !!

    ReplyDelete
  15. अंग्रेजी के कवि हुए हैं एडवर्ड थामस ... उनकी एक कविता है ओल्ड मैन... उसको पढ़ कर देखिये राजीव सर आपको अपनी कविता सी लगेगी... जीवन के संध्या पक्ष को कौन रौशनी देता है... बढ़िया कविता है.... एडवर्ड थामस की कविता के कुछ अंश...
    " Where first I met the bitter scent is lost.
    I, too, often shrivel the grey shreds,
    Sniff them and think and sniff again and try
    Once more to think what it is I am remembering,
    Always in vain. I cannot like the scent,
    Yet I would rather give up others more sweet,
    With no meaning, than this bitter one.
    I have mislaid the key. I sniff the spray
    And think of nothing; I see and I hear nothing;
    Yet seem, too, to be listening, lying in wait
    For what I should, yet never can, remember; "

    ReplyDelete
  16. स्वयं को पाता है
    लेटा हुआ
    शर-शैय्या पर
    भीष्म सा.
    चारो ओर होती
    सिर्फ कौरवों-पांडवों की भीड़,
    उसके शाम की
    कहाँ होती है भोर......
    namaskaar !
    behad achchi panktiyaa hai , sadhwad .bhaav boh waali kavitaa . badhai .
    sadar

    ReplyDelete
  17. waah... aapki "budhapa hota hai" rachna padhee, aur ab ye... aisa lagta hai jiase life ki do stages ko padh rahi hu...
    bahut khoob...

    ReplyDelete